
Pooja Batra
पत्रकारिता में 20 साल से अधिक का अनुभव. 2001 में दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद, गुरु जंभेश्वर यूनिवर्सिटी से M.A किया. फिर भारतीय विद्या भवन के फिल्म एंड टीवी ... और पढ़ें
गज़ल सम्राट जगजीत सिंह आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके फसाने अब भी सुनते हैं तो रगो में दौड़ जाते हैं. एक अजीब सा जादू था उनकी मखमली आवाज़ में. करीबन 150 से ज्यादा एलबम बनाने वाले इस गज़ल गायक ने ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए’ अपनी आवाज में गाकर सबको रुला दिया था. उस दिन वो किसी प्रोग्राम में गा रहे थे ‘दर्द से मेरा दामन भर दे’ और गाते-गाते रोते जा रहे थे. कहते हैं ना अगर आप किसी से दिल से जुड़े हैं तो उससे जुड़ी खुशी और गम का अहसास आपको पहले ही हो जाता है. जैसे ही वो कार्यक्रम खत्म हुआ. उनके इकलौते जवान बेटे की मौत की खबर आई.
किसी भी बाप के इससे बड़ा सदमा क्या होगा. उनकी पत्नी चित्रा सिंह को तो बेटे की मौत का ऐसा सदमा पहुंचा कि उन्होंने गाना ही छोड़ दिया. दोनों ने अपना आखिरी बार एल्बम ‘समवन समवेयर’ में गाया था. इसके बाद जगजीत अकेले गाते रहे.
राजस्थान के श्रीगंगानगर में जन्मे इस महान गायक ने अपनी मखमली आवाज और भावनाओं की गहराई से गजल को न केवल एक नया मुकाम दिया, बल्कि इसे हर दिल तक पहुंचाया. ‘गजल किंग’ के तौर पर मशहूर जगजीत सिंह ने संगीत की दुनिया में ऐसी छाप छोड़ी, जो समय की सीमाओं को पार कर आज भी उतनी ही ताजा है.
उनका सफर शुरू हुआ राजस्थान की मिट्टी से, जहां संगीत उनके लिए सिर्फ शौक नहीं, बल्कि आत्मा की आवाज थी. कम उम्र में ही उन्होंने शास्त्रीय संगीत की तालीम ली और जल्द ही उनकी प्रतिभा ने मुंबई की चकाचौंध तक पहुंचा दिया. 1970 के दशक में जब गजल को एक खास वर्ग का संगीत माना जाता था, जगजीत और उनकी पत्नी चित्रा सिंह ने इसे आम जनमानस की जुबान बना दिया.
उनकी जोड़ी ने ‘द अनफॉरगेटेबल्स’ जैसे एल्बम के साथ गजल को नई पहचान दी, जिसमें ‘बात निकलेगी तो’ और ‘रात भी नींद भी’ जैसे गीतों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया.
जगजीत सिंह की खासियत थी उनकी सादगी और गीतों में छिपी गहरी भावनाएं. चाहे प्रेम का उत्सव हो, जुदाई का दर्द हो, या जिंदगी की नश्वरता का अहसास, उनके गीत हर रंग को बखूबी बयां करते थे. ‘तुमको देखा तो ये खयाल आया’ से लेकर ‘चिठ्ठी न कोई संदेश’ और ‘होश वालों को खबर क्या’ तक, हर गीत एक कहानी कहती थी. हिंदी सिनेमा में भी उनकी आवाज ने जादू बिखेरा. उनकी गजलें कई फिल्मों को यादगार बनाती दिखीं.
10 अक्टूबर 2011 को जगजीत सिंह ने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी गजलें आज भी हर दिल में जिंदा हैं. बहुत कम लोग जानते हैं कि गजल की तरफ रुख उन्होंने बॉलीवुड में अपनी आवाज खारिज होने के बाद किया था. इस किस्से का जिक्र लेखिका सत्या सरन की किताब ‘बात निकलेगी तो फिर’ में किया गया है.
बॉलीवुड के बहिष्कार को जगजीत सिंह ने अपनी कला की दिशा बदलने का अवसर बना लिया. उन्होंने तय किया कि अगर फिल्म इंडस्ट्री उन्हें जगह नहीं देगी, तो वह अपनी गजलों को आम जनता के बीच ले जाएंगे. उन्होंने और चित्रा सिंह ने गजल को शास्त्रीय और कठिन सीमाओं से निकालकर, सरल धुनें दीं.
इसके बाद 1976 में आई एलबम ‘द अनफॉरगेटेबल्स’ इतनी बड़ी व्यावसायिक सफलता बनी कि यह भारत में गजल के इतिहास में एक ‘परिवर्तनकारी मील का पत्थर’ बन गई. इसके बाद जगजीत सिंह ने बॉलीवुड के दरवाजों पर दस्तक देना छोड़ दिया और जब वह ‘गजल सम्राट’ बन चुके थे, तभी फिल्म जगत ने उन्हें न केवल स्वीकार किया, बल्कि उनकी शैली को सम्मान दिया.
(इनपुट एजेंसी)
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