रोमांस के बादशाह यश चोपड़ा के परिवार वाले चाहते थे कि वो इंजीनियर बनें, जैसा की हर माता-पिता अपने बच्चे के सुरक्षित भविष्य की कामना करते हैं. लेकिन यश चोपड़ा का मन कुछ और ही कहता था. एक दिन उनके बड़े भाई ने यश साहब से कहा, मुंबई जाओ.  पासपोर्ट बनवाओ. इंग्लैंड जाओ, और इंजीनियर बनकर आओ. जैसा कहा गया था वैसा ही मैं करने लगा. लेकिन मन में कहीं न कहीं एक उलझन थी. इंजीनियर बनकर मैं करूंगा क्या? बनूंगा कैसे? मुझे तो एबीसीडी भी नहीं आती इंजीनियर की. फिर मैंने तय किया की मन की बात ही सुनी जाए तो अच्छा, मैंने अपने भाई साहब बी.आर चोपड़ा से कहा, मैं इंजीनियर नहीं बनूंगा. मेरी बात सुनकर वो हैरान हो गए. सब तैयारी हो चुकी है. तुम्हें लंदन जाना है. और तुम कह रहे हो तुम्हें इंजीनियर नहीं बनना है. क्या है ये? क्या बनना चाहते हो? डायरेक्टर बनोगे कैसे? इल्म क्या है?

मैंने भी कहा, डायरेक्टर बनने के लिए कोई कोर्स नहीं किया जाता. जिंदगी सब सिखा देती है. आप ही सिखाइए. मैं आपका असिसटेंट बन जाता हूं. वे इस बात के लिए तैयार नहीं हुए, और मुझे किसी और के पास काम सीखने के लिए भेज दिया. मैं वहां गया. बीआर चोपड़ा का भाई था तो मेरा स्वागत अच्छे से हुआ. मैंने देखा, वो डायरेक्टर अपनी टीम को बोल रहे हैं. कल तक शूट नहीं होगा. आज ही सेट हटाना होगा. मैंने अपने दोस्त को बोला, यार! मैं यहां काम नहीं कर पाउंगा. जो कल का शूट आज ही खत्म कर रहे हों. वहां मुझे सीखने को क्या मिलेगा. तुम मेरे लिए भइया से बात करो. बात हुई. और बात बन गई. मैं भाई साहब के साथ काम करने लगा. सीखने लगा.

मैं (यश चोपड़ा) एक रुढ़िवादी परिवार से ताल्लुक रखता था. मेरे परिवार वाले नहीं चाहते थे कि मैं फिल्में देखूं. लेकिन मुझे बहुत शौक था. छुप-छुपकर फिल्में देखता था. उस वक्त फिल्म देखने के लिए पैसे भी नहीं होते. कभी किसी को मसका लगाकर, कभी किसी को मसका लगाकर पैसे का जुगाड़ करता था. फिल्में देखकर मेरा डायरेक्टर बनने का शौक और बढ़ता गया. इसी दौरान मेरे पिता का देहांत हो गया. अब परिवार में मुझे आदेश देने वाला कोई नहीं था. मेरे भाई साहब ने मेरे इस जुनून को समझा. लेकिन बाकी परिवार वाले इससे खुश नहीं थे. सबका कहना था, ‘ये अपनी जिंदगी खराब करेगा और कुछ नहीं.’ लेकिन मेरी मां मेरे साथ थी. उन्होंने कहा, जो तुम्हारा दिल कहता है वही करो’. मां ने अपनी चुन्नी से 200 रुपए निकाल कर दिए, और कहा, मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है. जाओ. जो अच्छा लगता है, वहीं करो.

मुझे कविता लिखने का बहुत शौक था. मीना कुमारी को भी कविता लिखने का बहुत शौक था. दोनों अच्छा लिखने वाले लोग एक जगह इकट्ठा हो गए. मीना उस वक्त फिल्म ‘चांदनी चौक’ की शूटिंग कर रही थी. हम दोनों कविता लिखने वाले दोस्त बन गए. एक दिन मीना ने डायरेक्टर से कहा, यश, गबरु जवान है. हैंडसम है, इसे हीरो क्यों नहीं बना देते. यश साहब ने मजाकिया अंदाज में कहा, उस वक्त मेरे सिर पर बाल भी थे. बस मैं जल्दी-जल्दी बोलता था. यही कमी थी. मैंने और मीना ने कई फिल्मों के लिए एक साथ काम किया.

वैजयंती माला से मेरी अच्छी बात होती थी. मैं जब भी उनके घर जाता था. उनकी मां मुझे बहुत प्यार करती थी. मुझे अच्छा खाना बनाकर खिलाती थी. मुझे भी बचपन से ही खाने का शौक था. सबकुछ अच्छा चल रहा था. लेकिन मेरी आंख मछली पर नहीं बल्कि उसकी आंख पर थी. बनना तो डायरेक्टर ही था.

एक दिन भाईसाहब ने मुझे बुलाया, और कहा, मैं चाहता हूं ये एक फिल्म है जिसे मैं चाहता हूं तुम दोनों (ओमी बेदी) और यश असिस्टेंट डायरेक्टर इसे डायरेक्ट करो. उसे सुनकर मुझे समझ नहीं आया, कैसे रिएक्ट करूं. खुश हूं. उदास हूं. फिर मैंने सोचा, चलो मौका तो मिला यही सोचकर खुश होना चाहिए. पिक्चर बनाने की तैयारी शुरू हुई. उसी बीच ओमी बेदी को एक अलग फिल्म बनाने का ऑफर कहीं से मिला. वो चले गए. मेरा रास्ता साफ हो गया. मैं डायरेक्टर बन गया. फिल्म थी ‘धूल का फूल’

जब कुछ कठिन दिन आते है असल में तब आपको पता चलता है चीजें कितनी मुश्किल होती हैं. एक्टर को फिल्म के लिए राजी करना. फीस की बातें करना. सब बहुत मुश्किल सा था. लेकिन हुआ. फिल्म हिट साबित हुई.

यश जी ने कहा, मेरी फिल्में रोमांटिक नहीं होती थी बल्कि मानवीय रिश्तों पर आधारित होती थी. इंसान….,रिश्ते एक उलझी हुई सी चीज हैं. मेरी फिल्मों में विलेन वैंपायर नहीं होता. क्योंकि मेरा मानना है. एक इंसान खुद ही अपने आप में हीरो होता है, और खुद ही विलेन. मैंने खुद सोच लिया मैं डायरेक्टर बनूंगा. ये मेरा फैसला है. ये सही है या गलत ये मैंने तय किया. सही होगा तो हीरो. गलत हुआ तो विलेन. मेरा मानना है, प्यार को परिभाषित करना बेहद मुश्किल है.

फिल्म ‘सिलसिला’ (1981) कैसे बनी, इसके बारे में बात करते हुए चोपड़ा ने बताया, मैंने फिल्म के लिए परवीन बॉबी और स्मिता पाटिल को कास्ट किया था और हम सब कश्मीर पहुंच गए थे. स्क्रिप्ट अमिताभ के पास भी थी. कुछ वक्त बाद हम दोनों बैठे थे और अचानक मैंने अमिताभ से पूछा कि तुमने स्क्रिप्ट पढ़ ली, क्या मैंने फिल्म के लिए परवीन और स्मिता को लेकर सही किया?

अमिताभ ने एक लंबी सांस ली और मुझसे पूछा क्या आप इन दोनों को लेकर खुद संतुष्ट हैं? मैंने जवाब दिया नहीं. तब अमिताभ ने कहा कि इनकी जगह जया और रेखा होना चाहिए. फिर हम दोनों मुंबई आए और मैंने ही जया और रेखा से बात की और अगले दिन श्रीनगर रवाना होने के लिए मना लिया. यही नहीं फोन पर मेरे सहायक को कहा कि तुम किसी तरह परवीन और स्मिता को समझा देना, चाहो तो माफी भी मांग लेना.

संयोग से जब हमारा जहाज श्रीनगर हवाई अड्‍डे पर उतरा तो वहां पर परवीन बॉबी मुंबई आने के लिए खड़ी थीं. मुझे देखते ही दौड़कर आईं और कहा कि आपने रेखा और जया को लेकर जो फैसला किया है वह बिलकुल सही है. इस फिल्म के लिए यही जोड़ी परफेक्ट है. इसके बाद एक बार मुंबई में मैं अपने ऑफिस में बैठा था, तभी स्मिता पाटिल मेरे पास आई और उन्होंने कहा कि सिलसिला से हटने का फैसला आप मुझे खुद बताते तो मुझे ज्यादा बुरा नहीं लगता. किसी और ने मुझे फिल्म में हट जाने को कहा, इसका मुझे बहुत बुरा लगा. मैं भी बोला, मुझे न कहना बहुत बुरा लगता है, लेकिन फिल्म के लिए यही अच्छा था.

शाहरुख के बारे में बात करते हुए यश जी ने कहा, खान, कभी भी  फिल्म और पैसे के बारे में बात करने के लिए मेरे पास नहीं आता था. मुझसे पूछता भी नहीं था. फिल्म की स्क्रिप्ट की क्या है. एक भरोसा था. तभी दोनों ने एक साथ सात फिल्मों में काम किया.

यश जी की आखिरी फिल्म थी ‘जब तक है जान’. शाहरुख को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, इस फिल्म के बाद वो आराम करेंगे. अपने परिवार के साथ वक्त बिताएंगे.  स्वास्थ्य खराब होने के कारण फिल्म की शूटिंग के कुछ हिस्सों की शूटिंग को रोक दिया गया था. लेकिन किसी को क्या पता था. वो उनकी आखिरी फिल्म होगी. 80 वर्ष की उम्र में 21 अक्टूबर को सबके दिलों में प्यार, मोहब्बत, इश्क, छोड़कर वे हमेशा के लिए इस दुनिया से विदा हो गए.