Explainer: US के टोकने के बाद भी ईरान पर क्यों हमले कर रहा इजरायल? ट्रंप के खिलाफ जाकर नेतन्याहू को क्या फायदा, 7 सवालों के जवाब
1979 से पहले ईरान के अमेरिका से लेकर इजरायल तक तमाम देशों के साथ रिश्ते बड़े अच्छे हुआ करते थे. आज इस जंग में ईरान एक तरफ है. दूसरी ओर, कभी उसके दोस्त रहे इजरायल और अमेरिका उसके खिलाफ बम बरसा रहे हैं. सवाल उठता है कि इजरायल और अमेरिका को ईरान से क्या दिक्कत है?
- 28 फरवरी से चल रही US-इजरायल और ईरान की जंग.
- इजरायल के पास इंटरसेप्टर्स और हथियारों की भारी कमी.
- इजरायल में PM नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के 3 मामले दर्ज.
- ईरान जंग में अब तक 7 हजार से ज्यादा मौतें, 55000 घायल.
मिडिल ईस्ट में अनिश्चतता का माहौल बढ़ता जा रहा है. 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ जंग छेड़ दी. ईरान की टॉप लीडरशिप इस जंग में खत्म हो गई. फिर भी ईरान पूरी ताकत के साथ पलटवार कर रहा है. इस दौरान होर्मुज स्ट्रेट को ठीक समय पर बंद करके ईरान ने अमेरिका समेत वर्ल्ड ऑर्डर पर दबाव बनाया. आखिरकार सीजफायर का ऐलान हुआ. अब डील को लेकर बात चल रही है. पहले अमेरिका ने ईरान के साथ सीजफायर का ऐलान किया. फिर इजरायल को भी इसमें साथ देना पड़ा. लेकिन, जंग शुरू होने के 100वें दिन यानी 7 जून 2026 को ईरान और इजरायल फिर भिड़ गए. जबकि ट्रंप अब डील को आगे बढ़ाने के मूड में हैं.
आइए जानते हैं आखिर 2 महीने से जारी सीजफायर अचानक क्यों टूटा? इजरायल को इस जंग से अब तक क्या-क्या मिला? ट्रंप के रोकने के बाद भी नेतन्याहू ईरान से जंग क्यों जारी रखना चाहते हैं? जंग से भारत पर कितना असर पड़ेगा:-
ईरान और इजरायल में कैसे शुरू हुई दोबारा जंग?
इजरायल ने 7 जून (रविवार) को ईरान के सहयोगी देश लेबनान की राजधानी बेरूत पर हमला कर दिया. इसमें 2 लोगों की जान गई और 20 घायल हुए. ईरान ने इसके जवाब में इजरायल के रमत डेविड एयरबेस को बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाया. ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स यानी IRGC ने कहा कि अमेरिका से सीजफायर इस शर्त पर हुआ था कि जंग के सभी मोर्चों पर शांति होगी. लेबनान पर हमले करके इजरायल शर्त तोड़ रहा है. जवाब में इजरायल ने भी 8 जून की सुबह ईरान तेहरान, तबरीज और इस्फहान शहर में धमाके किए. खुजेस्तान शहर के एक पेट्रोकेमिकल प्लांट को भी निशाना बनाया. हालांकि, अमेरिका के दखल के बाद ईरान ने हमले रोकने की बात कही है. इजरायल ने भी शांति के लिए हामी भरी है.
ईरान के खिलाफ ऑपरेशन से इजरायल को अब तक क्या-क्या मिला?
- काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस यानी CFR की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1948 में इजरायल बनने के बाद से अब तक अमेरिका उसे 300 बिलियन डॉलर यानी 25 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा दे चुका है.
- 2019 में साइन किए गए एक MoU के तहत इजरायल को अमेरिका से सालाना 3।8 बिलियन डॉलर यानी करीब 32 हजार करोड़ रुपये की सैन्य मदद मिलती है.
- ईरान समर्थित हमास संगठन के इजरायल पर हमले के बाद अमेरिका एक कानून बनाकर अप्रैल 2024 तक उसे 1719 बिलियन डॉलर यानी करीब 115 लाख करोड़ रुपये दे चुका है.
अमेरिका के बगैर इजरायल जीत पाएगा ईरान से जंग?
इसका जवाब है- नहीं. क्योंकि, इजरायल और ईरान आपस में कोई सीमा साझा नहीं करते. हवा और पानी के जरिए जंग लड़ने के लिए इजरायल को अमेरिका से लॉजिस्टिक सपोर्ट चाहिए.इजरायल से ईरान की दूरी लगभग 1500 किमी है. इतनी दूरी पर अटैक करने के लिए इजरायल को अमेरिका से लंबी दूरी तक मार करने वाले फाइटर जेट और मिसाइलों की जरूरत है. साथ में जंग लड़ने के लिए फंड भी बहुत जरूरी है.
इजराइल करीब 3 साल से लगातार जंग में उलझा हुआ है. पहले गाजा और अब ईरान के साथ जंग चल रही है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में इजरायल सरकार ने 112 बिलियन इजरायली शेकेल का रक्षा बजट मंजूर किया था. ईरान जंग शुरू होने के बाद इसे बढ़ाकर 144 बिलियन शेकेल कर दिया. लेकिन, ये मंजूरी नहीं मिली. ऐसे में अब इजरायल जंग लड़ने के लिए अमेरिका पर निर्भर है.
इस जंग से इजरायल या अमेरिका… किसे ज्यादा फायदा?
इंडियन मिलिट्री एक्सपर्ट डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा, “अभी तक की जंग को देखें, तो अमेरिका के मुकाबले इजरायल, ईरान से ज्यादा आर्थिक और सैन्य फायदा पाने वाला देश दिख रहा है. अगर ईरान से अमेरिका के संबंध बेहतर हो जाते, तो इजरायल को मिडिल ईस्ट में एक मजबूत टक्कर मिल सकती थी. इसलिए इजरायल के PM बेंजामिन नेतन्याहू इस जंग में अमेरिका को भी खींच लाए हैं. लेकिन, अमेरिका बड़ी सोच रखता है और अपना बड़ा फायदा देख रहा है.”
चेलानी कहते हैं, “खामेनेई के बाद ईरान में नई सत्ता आने से अमेरिका को बड़ा फायदा है. मिडिल ईस्ट में कतर, इराक, सीरिया, जॉर्डन, कुवैत और सऊदी अरब जैसे देशों में अमेरिका ने अपने मिलिट्री बेस बनाए हुए हैं. एकमात्र ईरान में अमेरिका का कोई आर्मी बेस नहीं है.”
क्या है नेतन्याहू की विशलिस्ट?
ईरान की न्यूक्लियर साइट्स को तबाह करना इजरायल और नेतन्याहू का अकेला इरादा नहीं है. इस जंग में बेंजामिन नेतन्याहू की विशलिस्ट बड़ी है:-
- इंडियन मिलिट्री एक्सपर्ट डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने कहा कि बेंजामिन नेतन्याहू की पहली विश ईरान को कमजोर करना है. नेतन्याहू ये चाहते हैं कि ईरान की सत्ता पर इस्लामिक नेताओं की जगह इजरायल से अच्छे रिश्ते रखने वाली या कम से कम उसे दुश्मन न मानने वाली सरकार आ जाए.
- नेतन्याहू की दूसरी विश अमेरिका को ईरान से दूर रखने की है. इजरायल नहीं चाहता कि अमेरिका और ईरान के बीच रिश्ते बेहतर हों. अगर ईरान और अमेरिका के बीच डील होती, तो ये बैन हटाए जाते, साथ ही ईरान को कई कॉमर्शियल फायदे मिल सकते थे.
- नेतन्याहू की तीसरी विश ईरान के नेचुरल रिसोर्सेज पर कब्जा जमाने की है. अगर ईरान के ऑयल और गैस रिजर्व पर इजरायल का कब्जा हो गया, तो मिडिल ईस्ट में वो और भी ताकतवर हो जाएगा.
ट्रंप की बात क्यों नहीं मान रहे नेतन्याहू?
- इसके पीछे नेतन्याहू के अपने मोटिव्स हो सकते हैं. इजरायल में अगला राष्ट्रीय संसदीय चुनाव आधिकारिक तौर पर 27 अक्टूबर 2026 तक निर्धारित है. वर्तमान संसद (नेसेट) ने खुद को भंग करने के लिए मतदान किया है. ऐसे में इजरायल पर दोबारा चुनकर आने का प्रेशर है. इसके लिए वो जनमत बनाने की कोशिश में हैं.
- बीते दिनों इजरायल की हिब्रू यूनिवर्सिटी ने उत्तरी इजरायल में लेबनान से जुड़ा एक सर्वे किया था. इसके मुताबिक, यहां के लोगों का नेतन्याहू को समर्थन कम हो रहा है. ये लोग ऐसी सरकार चाहते हैं, जो जंग खत्म करने के अमेरिकी दबाव में न आए. इसलिए नेतन्याहू पर प्रेशर तो है.
- रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, बेंजामिन नेतन्याहू पर इजरायल में भ्रष्टाचार के 3 मामले दर्ज हैं. वो जंग के नाजुक हालातों का हवाला देकर, कोर्ट में पेशी से बच रहे हैं. जंग रुकने से उन पर कानूनी कार्यवाही शुरू होगी और जेल भी जाना पड़ सकता है. इसलिए नेतन्याहू के पास अपने दुश्मन को खत्म करने का आखिरी मौका भी है.
दोबारा जंग शुरू होने से भारत को कैसी चिंता?
रॉयटर्स की रिपोर्ट बताती है कि ईरान जंग में दुनिया की GDP को 339 लाख करोड़ रुपये के नुकसान होने का अनुमान है. जाहिर तौर पर इसका असर भारत पर भी पड़ेगा. कच्चे तेल के दाम बढ़ेंगे. इससे कमोडिटी पर असर पड़ेगा. जंग शुरू होने के बाद और होर्मुज बंद होने से पेट्रोल-डीजल, LPG और CNG के दाम कई बार बढ़ चुके हैं.भारत का इम्पोर्ट बिल का करीब 22% हिस्सा कच्चे तेल पर खर्च होता है. ऐसे में अगर जंग ज्यादा दिन तक जारी रही, तो हमारी इकोनॉमी पर इसका असर पड़ेगा.
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