अमेरिका या इजरायल... ईरान की तबाही से किसे मिलेगा कितना फायदा? क्या है ट्रंप और नेतन्याहू की विशलिस्ट

ईरान के खिलाफ इजरायल और अमेरिका ने महीनों की घेराबंदी के बाद आखिरकार 28 फरवरी को हमला कर दिया. इजरायल-अमेरिका ने ईरान के 31 प्रांतों में 1200 ठिकानों को निशाना बनाया. इस दौरान ईरान में सुप्रीम लीडर खामेनेई, रक्षा मंत्री और IRGC चीफ समेत कम से कम 760 लोगों की मौत हो गई.

Published date india.com Published: March 4, 2026 1:37 AM IST
अमेरिका या इजरायल... ईरान की तबाही से किसे मिलेगा कितना फायदा? क्या है ट्रंप और नेतन्याहू की विशलिस्ट
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 28 फरवरी को ईरान के लिए जंग छेड़ दिया था. (AP)

इजरायल-अमेरिका के जॉइंट ऑपरेशन में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद ईरान अपनी इस्लामिक सत्ता के अस्तित्व के लिए लड़ रही है. ईरान ने बेशक पूरी ताकत से पलटवार किया है. ईरानी सेना ने न सिर्फ इजरायल बल्कि, पूरे मिडिल ईस्ट में अमेरिका के ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन बरसाए हैं. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन का कहना है कि खामेनेई की हत्या का बदला लेना देश के बच्चे-बच्चे का हक है.

1979 से पहले ईरान के अमेरिका से लेकर इजरायल तक तमाम देशों के साथ रिश्ते बड़े अच्छे हुआ करते थे. आज इस जंग में ईरान एक तरफ है. कभी उसके दोस्त रहे इजरायल और अमेरिका उसके खिलाफ बम बरसा रहे हैं. सवाल उठता है कि इजरायल और अमेरिका को ईरान से क्या दिक्कत है? ईरान की तबाही से इजरायल या अमेरिका… किसे ज्यादा फायदा होगा? ईरान के पास ऐसा क्या है, जिसके लिए अमेरिका और इजरायल जंग लड़ रहे हैं. डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू की विशलिस्ट क्या है:-

मिडिल ईस्ट में ईरान की जगह?
मिडिल ईस्ट में 17 देश हैं. इनमें सऊदी अरब, ईरान, इराक, तुर्किये, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, इजरायल, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान, ओमान, यमन, कतर, कुवैत, बहरीन, साइप्रस और फिलिस्तीन शामिल हैं. इनमें से ईरान देश प्राकृतिक गैस भंडार के मामले में दुनियाभर में तीसरे और तेल उत्पादन में नौवें स्थान पर है. ईरान की अर्थव्यवस्था पेट्रोलियम निर्यात पर बहुत ज्यादा निर्भर है.

ईरान के पास कौन-कौन से नेचुरल रिसोर्सेज हैं?
ईरान के पास दुनिया का कुल सिद्ध तेल भंडारों का करीब 10% हिस्सा है. यहां का मुख्य तेल क्षेत्र ज़ाग्रोस बेसिन और फारस की खाड़ी में स्थित है. रूस के बाद ईरान के पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार है. इसका प्रमुख क्षेत्र ‘साउथ पार्स’ (South Pars) है. ईरान की धरती में यूरेनियम, तांबा, लौह अयस्क, जस्ता, सोना, कोयला, लेड, और क्रोमियम के व्यापक भंडार मौजूद हैं. ये देश अपने उच्च गुणवत्ता वाले केसर (saffron) उत्पादन के लिए विश्व प्रसिद्ध है, जो मुख्य रूप से खुरासान रजावी प्रांत में उगाया जाता है. इसके साथ ही इस देश में फास्फेट, सिलिका रेत, चूना पत्थर और भारी खनिज भी पाए जाते हैं.

इस जंग से इजरायल या अमेरिका… किसे ज्यादा फायदा?
इंडियन मिलिट्री एक्सपर्ट डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा, “अभी तक की जंग को देखें, तो अमेरिका के मुकाबले इजरायल, ईरान से ज्यादा आर्थिक और सैन्य फायदा पाने वाला देश दिख रहा है. अगर ईरान से अमेरिका के संबंध बेहतर हो जाते, तो इजरायल को मिडिल ईस्ट में एक मजबूत टक्कर मिल सकती थी. इसलिए इजरायल के PM बेंजामिन नेतन्याहू इस जंग में अमेरिका को भी खींच लाए हैं. लेकिन, अमेरिका बड़ी सोच रखता है और अपना बड़ा फायदा देख रहा है.”

चेलानी कहते हैं, “खामेनेई के बाद ईरान में नई सत्ता आने से अमेरिका को बड़ा फायदा है. मिडिल ईस्ट में कतर, इराक, सीरिया, जॉर्डन, कुवैत और सऊदी अरब जैसे देशों में अमेरिका ने अपने मिलिट्री बेस बनाए हुए हैं. एकमात्र ईरान में अमेरिका का कोई आर्मी बेस नहीं है.”

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उनके मुताबिक, ईरान के कब्जे वाले लाल सागर के रूट्स के जरिए अमेरिका का तेल और बाकी चीजों का ट्रेड भी चलता है. ऐसे में अगर खामनेई की मौत के बाद ईरान की बागडोर अमेरिका की पसंद के किसी शख्स को मिलती है, तो अमेरिका का एक तरह से पूरे मिडिल ईस्ट पर उसका कंट्रोल हो जाएगा. इसलिए लॉन्ग टर्म में ईरान से फायदा तो अमेरिका को ही है.

ईरान के खिलाफ ऑपरेशन से इजरायल को अब तक क्या-क्या मिला?

  • काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस यानी CFR की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1948 में इजरायल बनने के बाद से अब तक अमेरिका उसे 300 बिलियन डॉलर यानी 25 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा दे चुका है.
  • 2019 में साइन किए गए एक MoU के तहत इजरायल को अमेरिका से सालाना 3।8 बिलियन डॉलर यानी करीब 32 हजार करोड़ रुपये की सैन्य मदद मिलती है
  • ईरान समर्थित हमास संगठन के इजरायल पर हमले के बाद अमेरिका एक कानून बनाकर अप्रैल 2024 तक उसे 1719 बिलियन डॉलर यानी करीब 115 लाख करोड़ रुपये दे चुका है.

ईरान को लेकर क्या है नेतन्याहू की विशलिस्ट?

डॉ. चेलानी बताते हैं कि ईरान की न्यूक्लियर साइट्स को तबाह करना इजरायल और नेतन्याहू का अकेला इरादा नहीं है. इस जंग में बेंजामिन नेतन्याहू की विशलिस्ट बड़ी है:-

  • बेंजामिन नेतन्याहू की पहली विश ईरान को कमजोर करना है. नेतन्याहू ये चाहते हैं कि ईरान की सत्ता पर इस्लामिक नेताओं की जगह इजरायल से अच्छे रिश्ते रखने वाली या कम से कम उसे दुश्मन न मानने वाली सरकार आ जाए.
  • नेतन्याहू की दूसरी विश अमेरिका को ईरान से दूर रखने की है. इजरायल नहीं चाहता कि अमेरिका और ईरान के बीच रिश्ते बेहतर हों. अगर ईरान और अमेरिका के बीच डील होती, तो ये बैन हटाए जाते, साथ ही ईरान को कई कॉमर्शियल फायदे मिल सकते थे.
  • नेतन्याहू की तीसरी विश ईरान के नेचुरल रिसोर्सेज पर कब्जा जमाने की है. अगर ईरान के ऑयल और गैस रिजर्व पर इजरायल का कब्जा हो गया, तो मिडिल ईस्ट में वो और भी ताकतवर हो जाएगा.

ईरान को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की विशलिस्ट?

  • मिडिल ईस्ट में कतर, इराक, सीरिया, जॉर्डन, कुवैत और सऊदी अरब जैसे देशों में अमेरिका ने अपने मिलिट्री बेस बनाए हुए हैं. सिर्फ ईरान में ही अमेरिका का कोई आर्मी बेस नहीं है. ऐसे में ट्रंप ईरान पर भी आर्मी बेस बनाकर मिडिल ईस्ट पर कंट्रोल हासिल करना चाहते हैं.
  • ईरान के कब्जे वाले लाल सागर के रूट्स के जरिए अमेरिका का तेल और बाकी चीजों का ट्रेड भी चलता है. ऐसे में अगर ईरान में अमेरिका के मन मुताबिक सरकार आती है, तो वह तेलों के दाम और टैरिफ को खुद कंट्रोल कर सकेंगे.
  • मिडिल ईस्ट में सऊदी अरब और ईरान के बीच इस्लामिक देशों की लीडरशिप को लेकर वर्चस्व की पुरानी लड़ाई है. अमेरिका सऊदी अरब के साथ मजबूत आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते रखता है. ईरान और सऊदी पहले दोस्त थे. अब दुश्मन बन चुके हैं. ऐसे में ट्रंप को उम्मीद है कि ईरान को कमजोर करके सऊदी अरब से और फायदा लिया जा सकता है.
  • ईरान को तबाह करके ट्रंप इजरायल-अमेरिका की दोस्ती को और मजबूत बनाने की कोशिश करेंगे. ईरान के कमजोर होने से इजरायल, अमेरिकी सहयोग का सबसे बड़ा दावेदार बना रहेगा.

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