अगले साल 7 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी नेशनल टीम में बड़े बदलाव किए. BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने सोमवार (17 अगस्त) को अपनी टीम का ऐलान किया. पहली नजर में यह बदलाव संगठन में नए चेहरों की एंट्री और अनुभवी नेताओं की वापसी के तौर पर दिखाई देता है, लेकिन इसके भीतर कई बड़े राजनीतिक संदेश छिपे हैं, खास तौर पर महिलाओं को मिली बड़ी जिम्मेदारी इस पूरी कवायद का सबसे अहम पहलू है, नई टीम में 10 महिलाओं को जगह मिली है. 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्षों में से 6 महिलाएं हैं, जबकि स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव और वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है.
आइए समझते हैं BJP ने अपनी कोर टीम में महिलाओं पर फोकस क्यों किया है? क्या इसका आने वाले विधानसभा चुनावों में वोट पर्सेंटेज पर असर पड़ेगा?
BJP की कोर टीम में 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व बताया गया है. साथ ही 65 पदाधिकारियों में 51 नए चेहरे हैं. इसके साथ ही 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, 8 राष्ट्रीय महामंत्री और 16 राष्ट्रीय सचिव शामिल हैं. इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनावों की बड़ी तैयारी साफ नजर आती है. खासतौर पर उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों में होने वाले चुनावों को देखते हुए BJP ने संगठन में अनुभव, युवा नेतृत्व, महिला प्रतिनिधित्व, सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय संतुलन को एक साथ साधने की कोशिश की है. यानी BJP ने सिर्फ पुराने नेताओं की टीम को दोहराने के बजाय संगठन में बड़े स्तर पर बदलाव किया है.
BJP अध्यक्ष नितिन नवीन की नई राष्ट्रीय टीम में 12 महिलाओं को जिम्मेदारी दी गई है. इनमें वसुंधरा राजे, डी. पुरंदेश्वरी, रेखा वर्मा, वर्षाबेन दोशी, डॉ. भारती पवार और डॉ. मधुचंद्र कर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है.
वहीं, स्मृति ईरानी को महासचिव बनाया गया है. कविता पाटीदार, फांग्नोन कोन्यक और संगीता यादव को मंत्री बनाया गया है. रूप कुमारी चौधरी को महिला मोर्चा अध्यक्ष और प्रीति गांधी को सोशल मीडिया सह-संयोजक की जिम्मेदारी मिली है. नवीन की टीम में यूपी से 3, महाराष्ट्र से 2 और बाकी राज्यों की 1-1 महिला को जगह मिली है.
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BJP की नई टीम में महिलाओं की बढ़ी मौजूदगी को सिर्फ संगठनात्मक बदलाव मानना मुश्किल है. इसके पीछे राजनीतिक और चुनावी दोनों तरह के कारण दिखाई देते हैं. एक तरफ महिला आरक्षण कानून के जरिए लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का रास्ता तैयार हो चुका है. इसके लिए सीटों के परिसीमन (De-Limitation) जरूरी है. इससे जुड़ा प्रस्ताव सरकार फिर से संसद में ला सकती है. अप्रैल में जरूरी नंबर नहीं होने के चलते ये बिल संसद में पास नहीं हो पाया था. वहीं, पिछले कुछ चुनावों में महिला मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हुई है. ऐसे में पार्टी के लिए संगठन में महिला नेतृत्व तैयार करना भविष्य की चुनावी जरूरत भी है और राजनीतिक रणनीति भी.
नई टीम में महिलाओं को सिर्फ महिला मोर्चा तक सीमित रखने के बजाय मुख्य संगठनात्मक पदों पर जगह दी गई है. स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव बनाना और 6 महिलाओं को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी देना इस लिहाज से महत्वपूर्ण है. इससे यह मैसेज देने की कोशिश दिखाई देती है कि महिला नेता सिर्फ महिला मतदाताओं से संवाद करने वाली चेहरा नहीं, बल्कि पार्टी की मुख्य रणनीति और संगठनात्मक फैसलों का हिस्सा भी हैं. असली बदलाव का पैमाना यह होगा कि महिलाओं की मौजूदगी उन संस्थाओं में कितनी बढ़ती है जहां उम्मीदवारों और चुनावी फैसलों पर अंतिम मुहर लगती है.
13 राष्ट्रीय उपाध्यक्षों में छह महिलाओं की मौजूदगी संख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण है. वसुंधरा राजे, डी. पुरंदेश्वरी, रेखा वर्मा, वरशाबेन दोशी, डॉ. भारती प्रवीन पवार और डॉ. मधुचंद्रा कर जैसी नेताओं को इस स्तर पर जगह मिली है. यह BJP के शीर्ष संगठन में महिलाओं की दृश्यता को काफी बढ़ाता है.
फिर भी सवाल यही रहेगा कि इन पदों की राजनीतिक ताकत कितनी होगी. अगर महिला नेता केवल संगठन के औपचारिक पदों तक सीमित रहती हैं तो बदलाव प्रतीकात्मक माना जाएगा. लेकिन अगर उन्हें राज्यों की जिम्मेदारी, चुनाव प्रबंधन, उम्मीदवार चयन, अभियान संचालन और संगठन विस्तार में वास्तविक भूमिका मिलती है, तब यह BJP के भीतर महिला नेतृत्व के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकता है.
नई टीम में सबसे ज्यादा चर्चा स्मृति ईरानी की वापसी की है. 2024 के लोकसभा चुनाव में अमेठी से हार के बाद उन्हें अब राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी मिली है. इससे BJP ने उन्हें एक बार फिर राष्ट्रीय संगठन की अहम भूमिका में ला दिया है. वह लंबे समय से पार्टी की आक्रामक और प्रभावी प्रचारक के तौर पर पहचानी जाती रही हैं. नई भूमिका उन्हें संगठन और चुनावी अभियान दोनों में इस्तेमाल करने का अवसर देती है.

इस नियुक्ति का एक बड़ा पहलू उत्तर प्रदेश है. 2027 में यूपी विधानसभा चुनाव होने हैं और नई राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश से 8 नेताओं को जगह मिली है. इनमें 3 महिलाएं—स्मृति ईरानी, रेखा वर्मा और संगीता यादव शामिल हैं. ऐसे में स्मृति ईरानी की राष्ट्रीय जिम्मेदारी का इस्तेमाल यूपी के राजनीतिक और संगठनात्मक समीकरणों में भी किया जा सकता है.
राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए रखना भी अहम है. स्मृति की राजनीतिक शैली और वसुंधरा राजे की राजनीतिक पहचान अलग है. स्मृति को अपेक्षाकृत युवा, आक्रामक और राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय प्रचारक के रूप में देखा जाता है, जबकि वसुंधरा राजे लंबे प्रशासनिक और चुनावी अनुभव वाली क्षेत्रीय दिग्गज हैं. यानी BJP ने महिला नेतृत्व के दो अलग-अलग मॉडल को एक साथ जगह दी है. वसुंधरा राजे का राजस्थान में लंबा राजनीतिक अनुभव और संगठन के भीतर स्थापित पहचान है.
अगले साल उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और गोवा में विधानसभा चुनाव होने हैं. इन सात राज्यों में महिला वोटर कोई छोटा वोट बैंक नहीं हैं. अकेले UP में करीब 6.09 करोड़ महिला मतदाता हैं. गुजरात में करीब 2.38 करोड़, पंजाब में करीब 1.02 करोड़ और उत्तराखंड में करीब 33.5 लाख महिलाएं मतदाता सूची में हैं. यानी राजनीतिक दलों के लिए महिला वोटर्स को नजरअंदाज करना चुनावी रूप से महंगा पड़ सकता है. UP में 2026 SIR के बाद 18-19 आयु वर्ग के 17.63 लाख नए युवा मतदाता भी मौजूद हैं.
यह सबसे बड़ा सवाल है. BJP के लिए महिला वोटर अब केवल एक सामाजिक समूह नहीं रह गई हैं, बल्कि कई चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाने वाली मतदाता बन चुकी हैं. महिला मतदाताओं की भागीदारी बढ़ी है. कई राज्यों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत महत्वपूर्ण रहा है. ऐसे में महिला नेतृत्व को संगठन में प्रमुखता देने से पार्टी के महिला-केंद्रित राजनीतिक संदेश को भी मजबूती मिलती है.
BJP की राजनीति में महिलाओं के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं का प्रचार भी महत्वपूर्ण रहा है. उज्ज्वला जैसी योजनाओं से लेकर राज्यों में महिलाओं को केंद्रित करके चलाए गए कल्याणकारी कार्यक्रमों तक, पार्टी महिला मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती रही है. ऐसे में संगठन के शीर्ष पदों पर महिला नेताओं की मौजूदगी सरकार की महिला-केंद्रित राजनीति और पार्टी संगठन के बीच एक राजनीतिक पुल तैयार कर सकती है.
हालांकि, इसे सिर्फ चुनावी मजबूरी कहना भी अधूरा होगा. चुनावी जरूरत संगठनात्मक बदलाव को तेज कर सकती है, लेकिन अगर इससे पार्टी के भीतर महिला नेतृत्व की नई पाइपलाइन तैयार होती है तो इसका असर लंबे समय तक रह सकता है. महिला आरक्षण लागू होने की स्थिति में राजनीतिक दलों को बड़ी संख्या में सक्षम महिला नेताओं की जरूरत होगी. इसलिए संगठन में अभी से महिला नेतृत्व तैयार करना भविष्य की तैयारी भी हो सकती है.
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