आखिर टूट गई ममता की TMC, विधायकों के बाद अब 20 सांसदों ने बनाया अलग गुट, NDA को करेंगे सपोर्ट

Written By: Anjali Karmakar Updated by: Anjali Karmakar
Updated Date:June 8, 2026 6:04 PM IST

TMC Spilt Explainer: लोकसभा में TMC के अभी 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं. इससे पहले 3 जून को बंगाल के 80 में से 58 विधायक अलग गुट बना चुके हैं. इस गुट ने ऋतब्रत बनर्जी लीड कर रहे हैं.

  • बंगाल चुनाव में भबानीपुर से हार गई थीं ममता.
  • TMC को सिर्फ 80 सीटों पर मिली थी जीत.
  • 58 विधायकों और कुछ सांसद हो गए बागी.
  • टूट के बाद भी ममता के हाथ में TMC की कमान.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस में घमासान मचा है. एक के बाद एक पार्टी के नेता साथ छोड़ रहे हैं. पहले 58 विधायकों ने अलग गुट बना लिया. अब  TMC के 20 सांसद भी 'ममता की छांव' से निकल चुके हैं.  न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी से नाराज चल रहे TMC के 20 सांसदों ने अलग गुट बना लिया है. सोमवार (8 जून 2026) को उन्होंने केंद्रीय मंत्री और BJP के बंगाल प्रभारी भूपेंद्र यादव के घर पर मीटिंग की. इस दौरान सुबह TMC के राज्यसभा सांसद पद से इस्तीफा दे चुके सुखेंदु शेखर रे भी मौजूद रहे. उधर, बंगाल CM शुभेंदु अधिकारी भी इनसे मिलने पहुंचे. इसके बाद सभी 20 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात करके उन्हें एक लेटर सौंपा है. इसमें BJP की अगुवाई वाले NDA (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) को समर्थन देने की बात कही गई है.

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राजनीतिक गलियारों में ऐसी सुगबुगाहट तेज हो गई है कि महाराष्ट्र में जो हाल शिवसेना और NCP का हुआ था, ठीक वैसा ही हाल तृणमूल कांग्रेस का हो सकता है. आइए जानते हैं क्या ममता से छिन सकता है पार्टी का नाम और निशान? आखिर कहां तक जाएगा बंगाल का सियासी संग्राम? ममता के पास क्या रास्ते बचे हुए हैं:-

बगावत करने वाले कौन-कौन से सांसद?

TMC के किन सांसदों ने अलग गुट बनाया, इसकी पूरी लिस्ट तो सामने नहीं आई. लेकिन, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पर बैठक करने वाले सांसदों की एक फोटो जरूरत सर्कुलेट हुई है. इसमें सुखेंदु शेखर रॉय के अलावा शताब्दी रॉय, काकोली घोष, अबू ताहिर, खलीलुर रहमान, असित मल, अरूप चक्रवर्ती, कालीपद सोरेन, जगदीश बसुनिया, प्रसून बनर्जी और शर्मिला सरकार शामिल हैं.

काकोली घोष ने किया कंफर्म

सांसद और TMC की पूर्व नेता काकोली घोष दस्तीदार ने न्यूज एजेंसी ANI को बताया कि 20 सांसदों ने NDA को समर्थन देने का फैसला किया है. इस बारे में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को लेटर भेजा गया है. लोकसभा में TMC के अभी 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं. इससे पहले 3 जून को बंगाल के 80 में से 58 विधायक अलग गुट बना चुके हैं. इस गुट ने ऋतब्रत बनर्जी लीड कर रहे हैं.अब 21 बागी सांसदों के अलग गुट बनाने से जाहिर तौर पर संसद में TMC के नंबर घटेंगे

कैसे बनी TMC?

  • ममता बनर्जी लंबे समय तक कांग्रेस में रहीं, लेकिन पश्चिम बंगाल में लेफ्ट के खिलाफ कांग्रेस की रणनीति से असंतुष्ट थीं.
  • 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की.
  • पार्टी का मुख्य लक्ष्य पश्चिम बंगाल में 34 साल से सत्ता में मौजूद वाम मोर्चे को चुनौती देना था.
  • शुरुआती दौर में ममता बनर्जी ने BJP के नेतृत्व वाले NDA का साथ दिया और केंद्र सरकार में मंत्री भी बनीं.
  • ग्रामीण इलाकों और महिलाओं के बीच ममता की लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई.
  • सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन उनके लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुए.
  • भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलनों ने ममता बनर्जी को राज्यव्यापी नेता के रूप में स्थापित कर दिया.
  • फिर 2011 में बंगाल में विधानसभा चुनाव हुए. इसमें TMC ने वाम मोर्चे को हराकर 34 साल पुराना शासन खत्म कर दिया.
  • 20 मई 2011 को ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.
  • आज TMC सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं है. पार्टी ने गोवा, त्रिपुरा और अन्य राज्यों में भी विस्तार की कोशिश की है. ये राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी खेमे की प्रमुख आवाज़ों में शामिल भी शामिल है.

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चुनाव के नतीजे आने के बाद TMC में क्या-क्या हुआ?

  • बंगाल की 294 सीटों पर दो फेज में 23 और 29 अप्रैल को वोटिंग हुई. 4 मई को नतीजे आए. BJP ने 206 सीटें जीती. TMC को सिर्फ 80 सीटें मिलीं. 9 मई को बंगाल में पहली बार BJP की सरकार बनी.
  • चुनाव के नतीजे आने के एक दिन बाद से ही बंगाल के कई जगहों पर हिंसा की घटनाएं होने लगी. BJP कार्यकर्ताओं ने TMC के अस्थायी ऑफिस को तोड़ दिया. कई जगहों पर हिंसक प्रदर्शन हुए.इस दौरान दोनों पार्टियों के कई कार्यकर्ताओं की हत्या भी हुई.
  • फिर ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी पर अटैक हुआ. 30 मई को अभिषेक बनर्जी पर पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के सोनारपुर इलाके में स्थानीय लोगों की भीड़ ने हिंसक हमला किया था. यह घटना चुनाव बाद हुई हिंसा के पीड़ित परिवारों से मिलने के दौरान हुई थी.
  • अब ममता की TMC में भी फूट पड़ चुकी है. ममता ने ऋतुब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निकाल दिया. सोमवार को पार्टी से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि उनके साथ पार्टी के 58 विधायक हैं. स्पीकर ने भी ऋतब्रत बनर्जी के गुट को मान्यता दे दी है. उन्हें विपक्ष का नेता भी बना दिया गया है.
  • इसके बाद TMC के कई सांसदों की ओर से भी बगावत की बात सामने आई है. इस बीच अभिषेक बनर्जी को शिक्षक भर्ती घोटाला मामले में ED ने समन भेजा है. 15 जून को उनसे ED की टीम पूछताछ करेगी.

TMC पर कब्जा, नई पार्टी बनाएंगे या BJP में जाएंगे बागी सांसद?

  • अब बागी 20 सांसदों और विधायकों के सामने 3 ऑप्शन हैं. पहला- वो शिवसेना-NCP की तरह TMC के नाम और निशान पर कब्जा करें. दूसरा- वो नई पार्टी बना लें. तीसरा- BJP में शामिल हो जाएं.
  • भारत के संविधान की 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत किसी भी पार्टी को कानूनी रूप से तोड़ने के लिए दो-तिहाई (2/3) सांसदों का एक साथ आना जरूरी है. अगर पहले ऑप्शन को समझने की कोशिश करें, तो ऐसा होना फिलहाल नामुमकिन लग रहा है.
  • संसद में TMC के 28 लोकसभा सांसद हैं. ऐसे में 21 लोकसभा सांसदों की यह संख्या दो-तिहाई के आंकड़े को छूने के लिए नाकाफी है. यानी फिलहाल इन बागी सांसदों का पार्टी तोड़ना या नया गुट बनाना सियासी तौर पर जोखिम भरा कदम माना जा रहा है.अगर ये सांसद बिना दो-तिहाई बहुमत के अलग गुट बनाने का दावा करते हैं, तो लोकसभा अध्यक्ष उन्हें अयोग्य घोषित कर देंगे.
  • अगर ये सांसद BJP में शामिल होते हैं, तो उन्हें बहुत सोच-समझकर रणनीति अपनानी होगी. क्योंकि उनकी सदस्यता जा सकती है. बागी गुट के नेता फिलहाल कानूनी जानकारों से सलाह ले रहे हैं, ताकि उनकी सदस्यता तुरंत न जाए.
  • कानूनी रूप से TMC के बागी सांसद नई पार्टी बना सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की शर्तें पूरी करनी होंगी. लोकसभा या राज्यसभा में किसी पार्टी के सांसद अगर अलग होकर नया समूह बनाना चाहते हैं, तो उन्हें दो-तिहाई (2/3) सांसदों का समर्थन दिखाना होगा.मगर मौजूदा समय में बागी सांसदों के पास अलग पार्टी बनाने के लिए पर्याप्त नंबर नहीं हैं.

फूट के बाद TMC का क्या होगा?

  • बंगाल का सोशल स्ट्रक्चर दो हिस्सों में बंटा है. पहला- भद्रलोक यानी जमींदार और शिक्षित मध्यवर्ग. दूसरा- सर्वहारा यानी भूमिहीन किसान और मजदूर.
  • कांग्रेस ने भद्रलोक के जरिए पकड़ बनाई. लेफ्ट की सरकार के दौरान बंगाल में कैडर राज’ शुरू हुआ. 2011 में आई ममता की TMC ने लेफ्ट की इसी मशीनरी को हथिया लिया और लेफ्ट के 1000 से ज्यादा दफ्तरों पर कब्जा कर लिया.
  • TMC की हार और पार्टी में फूट के बाद कैडर बेस BJP की तरफ शिफ्ट हो सकता है.

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पार्टी को बचाने के लिए क्या कर रहीं ममता?

  • विधानसभा चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी दो तरह की स्ट्रैटेजी पर काम कर रही हैं. एक तरफ वो मजबूत और जुझारू की इमेज दिखा रही हैं. दूसरी ओर, विपक्षी दलों को भी साथ लेकर चलने पर जोर दे रही हैं.
  • चुनाव में हार के बाद पहली बार किसी CM ने इस्तीफा देने से मना कर दिया. ये ममता का अपने कैडर के लिए मैं नहीं झुकूंगी’ वाला मैसेज था, ताकि वो एकजुट रहे.
  • हाल के समय में अभिषेक बनर्जी समेत TMC के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हमले हुए. ममता ने इन मामलों को आक्रामक तरीके से उठाया.
  • लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान और विधानसभा चुनाव 2026 से पहले ममता बनर्जी का कॉन्फिडेंस अलग लेवल पर था. वो एकला चलो रे’ की पॉलिसी पर चल रही थीं.
  • विधानसभा चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों के गठबंधन INDIA ब्लॉक को फिर से साथ लेकर चलने की बात कर रही हैं.
  • चुनाव हारते ही 5 मई को ममता ने कहा, मेरा टारगेट बहुत क्लियर है. मैं INDIA टीम को मजबूत करूंगी… सोनिया जी, राहुल, अरविंद केजरीवाल, हेमंत सोरेन…सभी ने मुझे फोन किया. सभी INDIA गठबंधन के सहयोगी मेरे साथ हैं.’

क्या सत्ता में दोबारा लौट पाएगी TMC?

इसका जवाब ठीक-ठीक कहा नहीं दिया जा सकता. लेकिन, गुंजाइश बहुत कम है. पश्चिम बंगाल के इतिहास में झांककर देखें, तो ऐसा होता दिख नहीं रहा. 1977 तक बंगाल में कांग्रेस 25 साल शासन में रही. बीच में 1967 से 1972 तक यूनाइटेड फ्रंट भी सत्ता में आई. इसके बाद 34 साल तक लेफ्ट फ्रंट की सरकार चली. 2011 में ममता बनर्जी ने लेफ्ट के शासन पर फुल स्टॉप लगाया. वो 2011 से 2026 तक बंगाल की सत्ता में काबिज रहीं. इसी पैटर्न को फॉलो करें, तो अब BJP भी लंबे समय तक बंगाल में रहेगी.

विधानसभा में असली दल कौन है, यह कैसे तय होगा?

विधायक दल और राजनीतिक पार्टी अलग-अलग चीजें हैं. विधानसभा के स्पीकर केवल विधानसभा के भीतर विधायक दल के नेता और व्हिप को मान्यता देते हैं. जबकि, वो राजनीतिक पार्टी पर कोई फैसला नहीं ले सकते है. चुनाव आयोग और कोर्ट इसे तय करता है.

ऐसे में संगठन पर किसका कंट्रोल होगा?

जब तक चुनाव आयोग कुछ और फैसला न करे तब तक ममता बनर्जी पार्टी अध्यक्ष बनी रहेंगी. यानी पार्टी का संविधान, संगठन और केंद्रीय नेतृत्व उनके नियंत्रण में रहेगा. वे नए प्रदेश अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष और संगठनात्मक समितियां बना सकती हैं.

क्या ममता से छिन सकता है TMC का नाम और निशान?

'असली TMC कौन?' का मामला अगर चुनाव आयोग के पास जाएगा, तो चुनाव चिन्ह और पार्टी पर अधिकार का विवाद खड़ा हो सकता है. यही रास्ता शिवसेना और NCP के मामलों में अपनाया गया था. ऐसे में ममता बनर्जी गुट और ऋतुब्रत बनर्जी गुट को बहुमत साबित करना होगा. चुनाव आयोग इसी के आधार पर फैसला लेगी. अगर फैसला ऋतुब्रत बनर्जी गुट के पक्ष में जाता है, तो उद्धव ठाकरे (अटूट शिवसेना) और शरद पवार (अटूट NCP) की तरह ममता बनर्जी से भी पार्टी का नाम और निशान छिन सकता है.

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शिवसेना में कैसे हुई थी टूट?

  • महाराष्ट्र में 2019 में विधानसभा के चुनाव हुए. शिवसेना और BJP ने मिलकर चुनाव लड़ा और बड़ी जीत दर्ज की. लेकिन, मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों दलों में विवाद हो गया. उद्धव ठाकरे CM बनना चाहते थे. BJP इसके लिए तैयार नहीं थी. मामला बढ़ता गया और शिवसेना-BJP के रास्ते जुदा हो गए.
  • इसी बीच NCP के अजित पवार (दिवंगत) ने बगावत कर दी. वो चुपके से BJP के साथ हो लिए. सुबह 5 बजे देवेंद्र फडणवीस ने CM और अजित पवार ने डिप्टी CM की शपथ भी ले ली. लेकिन, मामला कोर्ट में पहुंच गया. इसके बाद 2 दिन के अंदर दोनों को इस्तीफा देना पड़ा.
  • फिर उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस, NCP के साथ मिलकर महाविकास अघाड़ी की सरकार बना ली. हालांकि, शिवसेना के कई विधायक कांग्रेस-NCP के साथ गठबंधन को लेकर नाराज थे. BJP ने इस नाराजगी को कैश किया.
  • जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने 40 से ज्यादा विधायकों के साथ बगावत कर दी. इससे उद्धव सरकार अल्पमत में आ गई और गिर गई.
  • आखिरकार उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. फिर देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर एकनाथ शिंदे ने सरकार बना ली. शिंदे CM बने. फडणवीस ने डिप्टी बनना स्वीकार किया.
  • इसके बाद असली शिवसेना को लेकर शिंदे गुट और उद्धव गुट में लंबी लड़ाई चली. आखिरकार बहुमत के आधार पर चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को असली शिवसेना माना. पार्टी का नाम और निशान भी उसे दे दिया गया.
  • सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसले को बरकरार रखा. इसके बाद शिवसेना के दोनों गुटों को नया नाम और नया चुनाव चिह्न मिला. उद्धव गुट को शिवसेना (UBT) कहा गया. इसे मशाल चुनाव चिह्न दिया गया. जबकि असली शिवसेना का दर्जा शिंदे गुट को मिला. उसे तीर-कमान चिह्न भी मिल गया.

NCP में कैसे हुई थी टूट?

  • NCP में बड़ी टूट 2023 में हुई. अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार के खिलाफ बगावत कर दी थी. 2 जुलाई 2023 को अजित पवार महाराष्ट्र की तत्कालीन शिंदे-फडणवीस सरकार में शामिल हो गए. उन्होंने डिप्टी CM की शपथ ले ली.
  • अजित पवार के साथ NCP के कई विधायक और नेता भी चले गए. इससे पार्टी दो गुटों में बंट गई. शरद पवार गुट ने कहा कि असली NCP उनके पास है, क्योंकि पार्टी उन्होंने बनाई थी. अजित पवार गुट ने दावा किया कि ज्यादातर विधायक और संगठन उनके साथ हैं, इसलिए वही असली NCP हैं.
  • फरवरी 2024 में चुनाव आयोग ने विधायकों और संगठनात्मक समर्थन को आधार मानते हुए अजित पवार गुट को NCP का आधिकारिक नाम और घड़ी’ चुनाव चिन्ह दे दिया. इसके बाद शरद पवार के गुट को नया नाम मिला.

बागी विधायकों के लिए क्या कहता है संविधान?

संविधान की 10वीं अनुसूची में दिए गए दलबदल कानून के मुताबिक, अगर किसी राष्ट्रीय/राज्य स्तर की पार्टी के विधायक बागी हो जाएं, तो वे सीधे पार्टी पर दावा नहीं कर सकते. यह मामला दलबदल कानून, पार्टी संगठन के संविधान और निर्वाचन आयोग के नियमों से तय होता है. हालांकि, 91वें संविधान संशोधन (2003) के बाद अगर कम से कम दो-तिहाई विधायक मूल पार्टी से अलग होने का फैसला लेते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से छूट मिल सकती है. इसके बाद चुनाव आयोग यह जांच करता है कि पार्टी पर असली नियंत्रण किसका होगा.

ममता से TMC का नाम और निशान छिना जाना कितना मुमकिन?

  • राजनीतिक जानकार बताते हैं कि TMC के बागी विधायक नेता विपक्ष, चीफ व्हिप जैसे पद तो ले सकते हैं, लेकिन
  • शिवसेना और NCP की तरह पार्टी पर अधिकार अभी नहीं ले पाएंगे.
  • अगर ऐसा होता है, तो बड़े गुट के दावे पर चुनाव आयोग फैसला लेगा. चुनाव आयोग के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.
  • इसके लिए दो-तिहाई यानी 28 में से 19 लोकसभा सांसदों की भी जरूरत भी होगी.

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