
Brijnandan Dubey
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नीतीश कुमार. बिहार के मुख्यमंत्री हैं. मुख्यमंत्री का पद सम्मानजनक होता है. पद की मर्यादा होती है. लेकिन क्या सदन में नीतीश (CM Nitish Kumar) के एक बयान ने मुख्यमंत्री के पद की सारी गरिमा खो दी? क्या उन्होंने महिलाओं का अपमान किया है? अगर कोई महिला का अपमान करता है तो उसे क्या सजा हो सकती है? क्या सदन में इस तरह के बयान देने को लेकर नीतीश पर मुकदमा चलाया जा सकता है? कई सवाल हैं. इडिया डॉट कॉम हिंदी (India.com Hindi) एक्सप्लेनर सभी सवालों का जवाब दिया जाएगा. लेकिन बारी-बारी से. आइए सबसे पहले नीतीश कुमार ने क्या कहा, वो जान लेते हैं.
नीतीश कुमार ने क्या कहा?
नीतीश कुमार मंगलवार को बिहार में जाति आधारित जनगमा रिपोर्ट को लेकर सदन को संबोधित कर रहे थे. इस दौरान जनसंख्या नियंत्रण को लेकर उन्होंने कहा,
‘लड़की पढ़ लेगी अगर, तो जब शादी होगा. तब पुरुष रोज रात में करता है ना. उसी में और (बच्चे) पैदा हो जाता है. लड़की अगर पढ़ लेगी तो उसको भीतर मत …,…, उसको …. कर दो. इसी में संख्या घट रही है.’
ये था पूरा बयान, जिसके बाद से बीजेपी हो या फिर सोशल मीडिया पर जनता, सबने जमकर नीतीश कुमार पर हमला बोलना शुरू कर दिया. नीतीश कुमार की विधानसभा में महिलाओं पर कई की टिप्पणी पर केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने भी आपत्ति जाहिर की. वहीं दूसरी ओर बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने बेशक नीतीश के बयान का समर्थन किया है. इसके कानूनी पहलू को समझने के लिए इंडिया डॉट कॉम हिंदी ने सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्विनी कुमार दुबे (Advocate Ashwani Kumar Dubey) से बात की.
सवाल- क्या नीतीश कुमार का बयान किसी महिला का अपमान है?
जवाब- सदन के अंदर हर किसी को बोलने की आजादी है. नीतीश कुमार ने सदन में जो कहा वो कॉमन स्टेटमेंट है. किसी एक महिला का नाम लेकर नहीं कहा गया है. ऐसे में कानूनी रूप से कोई एक्शन नहीं लिया जा सकता. उन पर विशेषाधिकार हनन का मामला नहीं बनता. हालांकि, नौतिक तौर पर नीतीश का बयान गलत है.
सवाल- क्या होता है विशेषाधिकार हनन?
जवाब- जब कोई व्यक्ति या प्राधिकरण व्यक्तिगत रूप से संसद में सदस्यों और सामूहिक रूप से सभा के किसी विशेषाधिकार और अधिकार की अवहेलना करता है या उन्हें चोट पहुंचाता है तो इसे विशेषाधिकार का उल्लंघन कहा जाएगा. सदन के दौरान अगर कोई सदस्य ऐसी टिप्पणी करता है जो संसद की गरिमा को ठेस पहुंचाती हो तो ऐसी स्थिति में उस सदस्य पर संसद की अवमानना और विशेषाधिकार हनन के तहत कार्रवाई की जा सकती है.
सवाल- क्या सदन में दिए गए बयान को लेकर मुकदमा हो सकता है?
जवाब- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 (2) के तहत भारत में संसद में कही गई किसी भी बात के लिए कोई सांसद किसी कोर्ट के प्रति उत्तरदायी नहीं होता. यानी सदन में कही गई किसी भी बात को कोर्ट में चैलेंज नहीं किया जा सकता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सांसदों को संसद में कुछ भी बोलने की छूट मिली हुई है. अगर कोई सदन सदस्य असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करता है, तो उस पर स्पीकर को ही एक्शन लेने का अधिकार है.
वहीं सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में साफ कहा है कि संसद या राज्य विधानसभाओं के अंदर दिए गए अपमानजनक बयान आपराधिक कृत्य नहीं हैं.
सवाल- अगर कोई सदन के बाहर महिला का अपमान करता है तो क्या?
जवाब- किसी महिला का अपमान करने पर सजा का प्रावधान है. IPC की धारा 509 उन लोगों पर लगाई जाती है जो किसी औरत के शील या सम्मान को चोट पहुंचाने वाली बात कहते हैं या हरकत करते हैं. इसमें दोषी को तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है.
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