
Anjali Karmakar
अंजलि कर्मकार 12 साल से जर्नलिज्म की फील्ड में एक्टिव हैं. उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया है. यहीं से मास कॉम में मास्टर्स की डिग्री ली ... और पढ़ें
भारत में अब तक हीटवेव की पहचान ज्यादातर तापमान की सीमा से होती रही है, लेकिन साल 2026 की गर्मी सिर्फ तापमान की कहानी नहीं है. यह Heat + Humidity यानी नमी और तापमान का खतरनाक मेल बन चुकी है. स्टडी कहती है कि ज्यादा नमी में पसीना जल्दी नहीं सूखता, शरीर का कूलिंग सिस्टम फेल होने लगता है, कोर बॉडी टेम्परेचर बढ़ता है और कुछ मामलों में कुछ देर में हीटस्ट्रोक तक हो सकता है. ऐसे में ज्यादा नमी में मध्यम तापमान भी जानलेवा बन सकता है. जर्नल क्लाइमेट डायनैमिक्स में छपी नई स्टडी के मुताबिक केरल में इसका सबसे ज्यादा खतरा है.
Wet Bulb Temperature को समझिए
पहले लोग गर्मी को सिर्फ डिग्री सेल्सियस में मापते थे. जैसे-40°C या 45°C. लेकिन, हीटवेव और ह्यूमिडी की वजह से अब नया पैमाना इस्तेमाल होता है. इसे Wet Bulb Temperature (वेट-बल्ब तापमान) कहते हैं. यह पैमाना बताता है कि आपका शरीर पसीने के जरिए खुद को कितना ठंडा कर सकता है. अगर हवा में नमी ज्यादा हो, तो पसीना सूखता नहीं. ऐसे में शरीर ठंडा नहीं हो पाता. फिर धीरे-धीरे शरीर का तापमान बढ़ता जाता है.
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एक्सपर्ट के मुताबिक, 31°C वेट-बल्ब तापमान भी खतरनाक हो सकता है, जबकि 35°C के आसपास यह इंसानों के लिए जानलेवा माना जाता है. यानी वेट-बल्ब तापमान 35° सेल्सियस हो जाए, तो छाया में बैठा स्वस्थ इंसान भी 6 घंटे में खतरे में आ सकता है. क्योंकि, ऐसे में शरीर खुद को ठंडा करने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है.
2026 में क्यों बढ़ा खतरा?
केरल में सबसे ज्यादा हालत खराब
दिल्ली-NCR में तापमान ज्यादा होता है, जबकि मुंबई और केरल जैसे इलाकों में नमी ज्यादा होती है. लेकिन जब दोनों चीजें मिलती हैं, तब खतरा कई गुना बढ़ जाता है. इसी वजह से वैज्ञानिक कह रहे हैं कि ह्यूमिड हीटवेव सबसे खतरनाक होती है. रिपोर्ट के मुताबिक, केरल में अब दिन गर्म होने के साथ रातें भी गर्म हो रही हैं. इससे शरीर को रिकवरी का समय कम मिलता है. शहरों में गर्मी ज्यादा देर तक फंस रही है और समुद्री हवाएं भी पहले जैसी नहीं रहीं। इससे हीट स्ट्रेस बढ़ रहा है.
इतनी गर्मी में शरीर पर क्या असर पड़ता है?
जब तापमान और नमी दोनों बढ़ते हैं, तो शरीर का कूलिंग सिस्टम फेल होने लगता है. दिल, किडनी और दिमाग पर सबसे ज्यादा असर होता है. डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रोक से बेहोशी या मौत तक का खतरा बना रहता है. ऐसे में डॉक्टरों का कहना है कि हीटवेव अब सिर्फ असहज नहीं, बल्कि मल्टी-ऑर्गन फेल्योर का खतरा बन चुकी है.
सबसे ज्यादा जोखिम किसे?
कुछ लोग इस खतरे के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं. जैसे-मजदूर और बाहर काम करने वाले लोग. बुजुर्ग और बच्चे. गरीब तबका. एक्सपर्ट के मुताबिक, लगातार गर्मी और नमी शरीर को थका देती है, जिससे मौत का खतरा बढ़ जाता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, भविष्य में स्थिति और बिगड़ सकती है. 70% भारतीय आबादी 32°C वेट-बल्ब तापमान के जोखिम में आ सकती है. करोड़ों लोग 35°C के करीब स्थितियों का सामना कर सकते हैं. यानी आने वाले समय में गर्मी सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि जीवन के लिए सीधा खतरा बन सकती है.
कहीं ये क्लाइमेट चेंज का असर है?
वैज्ञानिक साफ कह रहे हैं कि यह सब जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का नतीजा है. गर्मी जल्दी शुरू हो रही है और ज्यादा समय तक रह रही है. ठंड सिमटकर एक या डेढ़ महीने तक आ गई है. यही स्थिति ज्यादा खतरनाक होती है. कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत उन देशों में है, जहां भविष्य में मानव-जीवन की सीमा पार करने वाली गर्मी देखने को मिल सकती है.
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