छोटे से छोटा ड्रोन भी ट्रैक कर लेंगे सेना के ये नए रडार, बड़े पैमाने पर खरीद की तैयारी, जानिए क्यों जरूरी है सीमा पर ये अभेद्य सुरक्षा कवच

पारंपरिक रडार, आधुनिक ड्रोन जैसी छोटी, कम ऊंचाई वाली हवाई वस्तुओं को पहचानने, ट्रैक करने और उन्हें प्राथमिकता देने में कठिनाई महसूस करते हैं, खासकर अव्यवस्थित या जटिल हवाई क्षेत्र में.

Published date india.com Updated: September 20, 2025 8:59 AM IST
(प्रतीकात्मक तस्वीर)
(प्रतीकात्मक तस्वीर)

Drone detector radars: मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना अपनी वायु रक्षा के प्रति पूर्व की अपेक्षा ज्यादा सजग हुई है. और शायद यही वो कारण है, जिसके चलते इंडियन आर्मी अपनी वायु रक्षा को आधुनिक बनाने और ड्रोन तथा अन्य हवाई घुसपैठों से बढ़ते खतरे का त्वरित जवाब देने के लिए नए रडारों की खरीदारी में जुट गई है.

नए रडारों की खरीद फरोख्त में इतनी जल्दबाजी क्यों कर रही भारतीय सेना?

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, पाकिस्तान से आए ड्रोनों के झुंड जिनमें कुछ का उद्देश्य निगरानी करना था तो कुछ हमले के लिए प्रयोग हुए थे,बड़ी संख्या में भारतीय हवाई क्षेत्र में घुसपैठ करने में कामयाब रहे, जिससे उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर मौजूदा वायु रक्षा नेटवर्क की कमजोरियां उजागर हुईं.ध्यान रहे कि इन ड्रोनों के रडार क्रॉस-सेक्शन (आरसीएस) छोटे होते हैं, जिससे पुराने सिस्टम के साथ इनका पता लगाना और ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है.

क्यों अपर्याप्त हैं वर्तमान रडार?

पारंपरिक रडार, आधुनिक ड्रोन जैसी छोटी, कम ऊंचाई वाली हवाई वस्तुओं को पहचानने, ट्रैक करने और उन्हें प्राथमिकता देने में कठिनाई महसूस करते हैं, खासकर अव्यवस्थित या जटिल हवाई क्षेत्र में. बता दें कि सेना के कई रडार पुराने हो रहे हैं. वहीं कहा ये भी जा रहा है कि उनमें नई पीढ़ी के ऐसे खतरों का मुकाबला करने के लिए आवश्यक सटीकता और गति का अभाव है.

क्या खूबी लिए होंगे नए रडार

इस बार सेना ने जिन रडारों को खरीदने की बात की है, उनके विषय में जो जानकारी आई है, यदि उस पर यकीन किया जाए तो इस बार सेना 45 तक निम्न स्तरीय हल्के रडार (उन्नत), 48 तक वायु रक्षा अग्नि नियंत्रण रडार-ड्रोन डिटेक्टर (ADFCR-DD) और 10 निम्न स्तरीय हल्के रडार (उन्नत) खरीदने जा रही है.

ये उन्नत रडार सबसे छोटे और सबसे तेज़ गति से चलने वाले ड्रोन का भी पता लगाने, उन पर नज़र रखने और उन्हें निशाना बनाने में सक्षम हैं. कुछ में 3D AESA तकनीक, निष्क्रिय रेडियो-फ़्रीक्वेंसी डिटेक्शन और वास्तविक समय में युद्धक्षेत्र की जानकारी और तेज़ ख़तरे की प्रतिक्रिया के लिए कमांड और नियंत्रण प्रणालियों के साथ एकीकरण की क्षमता है.

लक्ष्य और एकीकृत रक्षा

नई प्रणालियों को सेना के आकाशतीर वायु रक्षा नेटवर्क से जोड़ा जाएगा, जिससे समग्र स्थितिजन्य जागरूकता बढ़ेगी और युद्धक्षेत्र कमांडरों को तेज़, सटीक लक्ष्य पहचान और संलग्नता में सहायता मिलेगी. ड्रोनों के झुंड और अन्य जटिल, आधुनिक हवाई ख़तरों से निपटने के लिए यह एकीकृत दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है.

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स्वदेशी पर है पूरा फोकस

इन रडारों का एक बड़ा हिस्सा जैसे कि ADFCRभारतीय कंपनियों द्वारा आपूर्ति किया जाएगा, जिससे स्वदेशी विनिर्माण और तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा. यह आधुनिकीकरण वैश्विक रुझानों को भी दर्शाता है क्योंकि दुनिया भर की सेनाएं उभरते हवाई खतरों के विरुद्ध बेहतर पहचान, ट्रैकिंग और प्रतिक्रिया क्षमताओं के लिए रडारों को उन्नत कर रही हैं.

बहरहाल नए रडार खरीदने में सेना की तत्परता हाल ही में ड्रोन घुसपैठ से मिले संचालन संबंधी सबक, हवाई युद्ध में तेज़ी से हो रहे विकास और संवेदनशील सीमाओं पर सुरक्षा को मज़बूत करने की रणनीतिक अनिवार्यता से प्रेरित है. उन्नत रडार प्रणालियां अब यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं कि भारत का हवाई क्षेत्र समकालीन और भविष्य के खतरों से सुरक्षित रहे.

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