Explainer: सिंधु जल संधि ठंडे बस्ते में रही तो आगे क्या? भारत और पाकिस्तान के पास कौन-कौन से कानूनी रास्ते

Indus Waters Treaty Explained: सिंधु जल संधि अगर लंबे समय तक अटकी रहती है, तो भारत और पाकिस्तान के पास कौन-कौन से कानूनी और रणनीतिक विकल्प होंगे? जानिए विश्व बैंक की भूमिका, विवाद समाधान प्रक्रिया और आगे की संभावनाएं.

Written by: Anjali Karmakar
Updated: July 7, 2026, 11:52 PM IST
  • 6 नदियों से मिलकर बनी है सिंधु जल संधि
  • 80:20 के रेशियो से हुआ था पानी का बंटवारा
  • पहलगाम अटैक के बाद भारत ने संधि कर दी स्थगित
  • इस संधि से पाकिस्तान के पंजाब प्रांत को मिलता है पानी

भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को दुनिया की सबसे सफल जल-साझाकरण संधियों में गिना जाता है. तीन युद्धों, सीमाई तनाव और लंबे राजनीतिक विवादों के बावजूद यह संधि दशकों तक लागू रही. 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम अटैक के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ इस संधि को स्थगित यानी ‘Abeyance’कर रखा है. सिंधु नदी का पानी भी रोका गया है. आइए समझते हैं कि अगर लंबे समय तक सिंधु संधि ‘Abeyance’ यानी ठंडे बस्ते में रहती है, तो दोनों देशों के सामने आगे क्या विकल्प होंगे? क्या भारत एकतरफा फैसले ले सकता है? क्या पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है? इस मामले में विश्व बैंक की भूमिका कितनी अहम होगी?

सिंधु जल समझौता क्या है?

  • सिंधु नदी सिस्टम कुल 6 नदियों से मिलकर बना है-सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज. इनके किनारे का इलाका करीब 11.2 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है. भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के पहले से ही भारत के पंजाब और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच नदियों के पानी के बंटवारे का झगड़ा शुरू हो गया था.
  • 1947 में भारत और पाकिस्तान के इंजीनियरों के बीच ‘स्टैंडस्टिल समझौता’ हुआ. इसके तहत दो मुख्य नहरों से पाकिस्तान को पानी मिलता रहा. ये समझौता 31 मार्च 1948 तक चला. इसके बाद भारत ने दोनों नहरों का पानी रोक दिया. इससे पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की 17 लाख एकड़ जमीन पर खेती बर्बाद हो गई. दोबारा हुए समझौते में भारत पानी देने को राजी हो गया.
  • फिर 1951 से लेकर 1960 तक वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में भारत पाकिस्तान में पानी के बंटवारे को लेकर बातचीत चली. 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के PM जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच दस्तखत हुए. इसे ही इंडस वॉटर ट्रीटी या सिंधु जल संधि कहा जाता है.
  • इस समझौते के तहत पाकिस्तान और भारत के बीच पानी का बंटवारा 80:20 के रेशियो से हुआ. पाकिस्तान को सिंधु, झेलम और चिनाब नदी का 80% पानी मिला. भारत के पास रावी, व्यास और सतलुज नदी रहे.

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‘अबेयंस’ का मतलब क्या होता है?

‘Abeyance’ का अर्थ होता है कि कोई व्यवस्था या समझौता औपचारिक रूप से समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन उसका सामान्य संचालन फिलहाल रुका हुआ है. यानी संधि कागज पर मौजूद रहती है, लेकिन उसका व्यावहारिक क्रियान्वयन प्रभावित हो सकता है. यह स्थिति संधि को समाप्त करने यानी टर्मिनेशन से अलग होती है. किसी संधि को औपचारिक रूप से खत्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अलग प्रक्रियाएं और आधार होते हैं.

समझौता स्थगित करने का पाकिस्तान पर क्या असर?

BBC की रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान में खेती की 90% जमीन यानी 4.7 करोड़ एकड़ एरिया में सिंचाई के लिए पानी सिंधु नदी प्रणाली से मिलता है. पाकिस्तान की नेशनल इनकम में एग्रीकल्चर सेक्टर की हिस्सेदारी 23% है. सिंधु समझौता स्थगित होने से एग्रीकल्चर सेक्टर डैमेज हो रहा है. पाकिस्तान के मंगल और तारबेला हाइड्रोपावर डैम को पानी नहीं मिल पा रहा है. इससे पाकिस्तान के बिजली उत्पादन में 30% से 50% तक की कमी आ सकती है. साथ ही औद्योगिक उत्पादन और रोजगार पर भी असर पड़ रहा है.

भारत के पास कौन-कौन से विकल्प हैं?

  1. सिंधु जल संधि के तहत सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों का अधिकांश पानी पाकिस्तान को आवंटित है. भारत को इन नदियों पर सीमित सिंचाई, हाइड्रो-पावर प्रोजेक्ट , घरेलू उपयोग और कुछ मात्रा में जल भंडारण का अधिकार भी दिया गया है.
  2. अगर संधि व्यावहारिक रूप से रुकी रहती है, तो भारत अपने इन अधिकारों का अधिकतम उपयोग करने की दिशा में तेजी ला सकता है. इसमें नए रन-ऑफ-द-रिवर हाइड्रो प्रोजेक्ट, स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर और सिंचाई योजनाओं को गति देना शामिल हो सकता है, बशर्ते वे संधि की तकनीकी शर्तों के अनुरूप हों.
  3. भारत पहले भी बदलते हालात का हवाला देते हुए संधि की समीक्षा या संशोधन की जरूरत जताता रहा है. जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी, ऊर्जा जरूरतें और नई तकनीकें ऐसे मुद्दे हैं; जिन्हें आधार बनाकर भारत संधि में बदलाव का प्रस्ताव रख सकता है. हालांकि, किसी भी संशोधन के लिए दोनों देशों की सहमति जरूरी होगी. इसलिए यह रास्ता कानूनी रूप से संभव तो है, लेकिन राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण माना जाता है.
  4. भले ही तनाव बना रहे, लेकिन बातचीत का विकल्प पूरी तरह खत्म नहीं होता. दोनों देश स्थायी सिंधु आयोग जैसी व्यवस्थाओं को फिर से सक्रिय कर सकते हैं या नई वार्ता प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं. ऐसा समाधान अक्सर सबसे व्यावहारिक माना जाता है, क्योंकि इससे विवाद को तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर सुलझाने की संभावना बनी रहती है.
  5. अगर भारत यह तर्क देता है कि परिस्थितियां मूल रूप से बदल चुकी हैं, तो वह अंतरराष्ट्रीय संधि कानून के कुछ सिद्धांतों का हवाला दे सकता है. उदाहरण के लिए, 1969 की Vienna Convention on the Law of Treaties में कुछ परिस्थितियों में संधियों की व्याख्या, संशोधन या उनके प्रभावों पर चर्चा की गई है. हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी देश द्वारा ऐसे सिद्धांतों का उपयोग करना स्वतः ही उसकी कानूनी स्थिति को मजबूत नहीं बना देता. इसका मूल्यांकन मामले के तथ्यों, संबंधित संधि और अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर किया जाता है.

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पाकिस्तान के पास क्या विकल्प हैं?

  1.  सिंधु जल संधि में विवादों के समाधान के लिए बहु-स्तरीय व्यवस्था बनाई गई है. सबसे पहले मामला स्थायी सिंधु आयोग के स्तर पर उठाया जाता है. अगर समाधान नहीं निकलता तो तकनीकी मामलों के लिए न्यूट्रल एक्सपर्ट नियुक्त किए जा सकते हैं. जटिल कानूनी विवादों के लिए कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का प्रावधान भी मौजूद है. अगर संधि पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, तो पाकिस्तान इन प्रावधानों के इस्तेमाल पर जोर दे सकता है.
  2. पाकिस्तान द्विपक्षीय वार्ता को फिर से शुरू करने की कोशिश कर सकता है. इसके अलावा मित्र देशों, क्षेत्रीय संगठनों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के माध्यम से भी राजनीतिक समर्थन जुटाने की रणनीति अपनाई जा सकती है.
  3. अगर पाकिस्तान को लगता है कि संधि की भावना का उल्लंघन हो रहा है, तो वह संयुक्त राष्ट्र या अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठा सकता है. हालांकि, यह समझना जरूरी है कि सिंधु जल संधि का औपचारिक गारंटर संयुक्त राष्ट्र नहीं, बल्कि विश्व बैंक है. इसलिए किसी भी कानूनी प्रक्रिया में संधि के अपने प्रावधान सबसे पहले महत्व रखते हैं.
  4. विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान को केवल कानूनी लड़ाई पर निर्भर रहने के बजाय अपनी जल प्रबंधन प्रणाली को भी मजबूत करना होगा. देश में जल भंडारण क्षमता बढ़ाना, नहरों में होने वाली पानी की बर्बादी कम करना, आधुनिक सिंचाई तकनीक अपनाना और भूजल संरक्षण जैसे कदम लंबे समय में अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं.

सिंधु जल संधि पर सेमिनार करेगा पाकिस्तान

पाकिस्तानी मंत्रियों ने बताया कि इस्लामाबाद में सिंधु जल संधि पर पहला अंतरराष्ट्रीय सेमिनार करेगा. इसमें कानूनी एक्सपर्ट, जल एक्सपर्ट्स और विदेशी प्रतिनिधि शामिल होंगे. इस सेमिनार में संधि के कानूनी और तकनीकी पहलुओं पर चर्चा होगी. पाकिस्तान के अखबार ‘डॉन’ के मुताबिक, शहबाज सरकार में सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत पाकिस्तान के अधिकार सुरक्षित हैं. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पहले भी साफ कर चुके हैं कि पानी हमारी जीवनरेखा है और यह हमारी रेड लाइन भी है. इसलिए हम पीछे नहीं हटेंगे.

इस संधि में विश्व बैंक की भूमिका क्या है?

विश्व बैंक इस संधि का पक्षकार नहीं है, लेकिन उसने 1960 में दोनों देशों के बीच समझौता कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. बाद के वर्षों में जब भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ परियोजनाओं को लेकर विवाद पैदा हुए. फिर विश्व बैंक ने संधि के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई. 2022 में विश्व बैंक ने Neutral Expert और Court of Arbitration से जुड़ी समानांतर प्रक्रियाओं को फिर से शुरू करने की घोषणा भी की थी. हालांकि, विश्व बैंक खुद विवाद का फैसला नहीं करता, बल्कि संधि में निर्धारित प्रक्रियाओं को संचालित करने में सहयोग करता है.

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क्या संधि पूरी तरह खत्म हो सकती है?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सिंधु जल संधि में एकतरफा समाप्ति का स्पष्ट प्रावधान नहीं है. इसलिए अगर कोई पक्ष संधि से अलग होने की कोशिश करता है, तो उसकी वैधता पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर कानूनी बहस हो सकती है. इसी वजह से अधिकांश विशेषज्ञ मानते हैं कि बातचीत, संशोधन या विवाद समाधान तंत्र का उपयोग, पूर्ण समाप्ति की तुलना में अधिक व्यावहारिक विकल्प हैं.

आगे क्या हो सकता है?

अगर संधि लंबे समय तक अबेयंस की स्थिति में रहती है, तो भारत अपने जल उपयोग और बुनियादी ढांचे को अधिक आक्रामक तरीके से विकसित करने पर ध्यान देगा. दूसरी ओर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय और द्विपक्षीय दोनों स्तरों पर संधि को पूरी तरह लागू कराने की कोशिश करेगा.

हालांकि, दोनों देशों के लिए यह भी स्पष्ट है कि सिंधु नदी प्रणाली करोड़ों लोगों की आजीविका, कृषि और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी हुई है. इसलिए किसी भी दीर्घकालिक समाधान में कानूनी दलीलों के साथ-साथ राजनीतिक इच्छाशक्ति, तकनीकी सहयोग और कूटनीतिक संवाद की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी.

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