ईरान पर 'मिलिट्री एक्शन' का दंभ भरने वाले ट्रंप क्या सच में करेंगे हमला? जानिये अमेरिका के लिए क्यों है यह 'कांटों' भरा फैसला! Explained

Iran Protest: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई की धमकी दी है. हालांकि यह आसान फैसला नहीं है और इसे लेकर अमेरिका को कई परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.

Published date india.com Updated: January 14, 2026 6:47 PM IST
Iran Protests

Iran Protest: वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को बंदी बनाने के बाद से डोनाल्ड ट्रंप काफी उत्साहित हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति अब ईरान में मिलिट्री एक्शन की भी धमकी दे रहे हैं. ईरान में बीते 15 दिनों से सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं. विरोध-प्रदर्शनों की शुरुआत 28 दिसंबर को राजधानी तेहरान से हुई थी और अब तक करीब 2,500 लोगों की जानें जा चुकी हैं. इस्लामिक देश ईरान के धार्मिक शासक सालों में विरोध का सामना कर रहे हैं. इस बार ईरान में विरोध प्रदर्शन की शुरुआत बढ़ती महंगाई और गिरती अर्थव्यवस्था से हुई. सबसे पहले व्यापारी वर्ग के लोग सड़कों पर उतरे और फिर धीरे-धीरे आम लोग इससे जुड़ते गए और इसने उग्र रूप अख्तियार कर लिया.

ईरानी शासन ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए बेहद सख्त रुख अपनाया और सुरक्षाबलों ने उनके ऊपर सीधे गोलियां चलाई. कहा तो यह भी जा रहा है कि ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई ने खुद ही प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाने के आदेश दिए थे. ईरान को लेकर ट्रंप बार-बार बयान दे रहे हैं. उन्होंने मिलिट्री एक्शन की भी धमकी दी है. ट्रंप की धमकी के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ईरान में अमेरिकी दखलंदाजी ठीक रहेगी क्योंकि इस क्षेत्र में पहले उठाये गए अमेरिकी कदम शायद ही सफल रहे हैं.

दांव उल्टा पड़ने का भी डर!

राष्ट्रपति ट्रंप की आक्रामक बयानबाजी के बावजूद पेंटागन ने इस क्षेत्र में कोई भी एयरक्राफ्ट करियर तैनात नहीं किया है. अमेरिका के खाड़ी सहयोगी जो पिछले साल इजरायल के साथ 12 दिन के युद्ध के दौरान ईरानी हवाई हमलों से अब तक उबर नहीं पाए हैं उन्होंने भी ईरान पर अमेरिकी हमले की मेजबानी में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है. विशेषज्ञों का भी यह भी मानना ​​है कि कोई भी अमेरिकी सैन्य हमला शायद सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई और ईरानी सरकार को घरेलू समर्थन जुटाने, आंतरिक विरोध प्रदर्शनों को नाजायज ठहराने और बाहरी खतरे के खिलाफ क्षेत्रीय गठबंधनों को मजबूत करने में मदद करेगा.

अब तक कोई सैन्य तैनाती नहीं

ट्रंप ने ईरानी शासन के खिलाफ सैन्य हस्तक्षेप की बात की है, लेकिन इस क्षेत्र में कोई सैन्य तैनाती नहीं हुई है. ‘द गार्जियन’ ने बताया है कि वास्तव में, पिछले कुछ महीनों में सैनिकों की संख्या में कमी आई है, जिससे सैन्य विकल्प और कम हो गए हैं. अक्टूबर के बाद से अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में कोई भी एयरक्राफ्ट कैरियर तैनात नहीं किया है. गर्मियों में USS गेराल्ड आर फोर्ड को कैरेबियन भेजा गया था और पतझड़ में USS निमित्ज़ को अमेरिकी पश्चिमी तट पर एक बंदरगाह पर ले जाया गया था. इसका मतलब यह है कि ईरानी ठिकानों पर, और शायद सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई पर कोई भी हवाई या मिसाइल हमला मिडिल ईस्ट में अमेरिकी और सहयोगी एयरबेस से ही करना होगा या उसमें उनका इस्तेमाल करना होगा.

इन देशों से लेनी पड़ेगी मदद

ऐसे मामले में अमेरिका को कतर, बहरीन, इराक, यूएई, ओमान और सऊदी अरब जैसे देशों में बेस इस्तेमाल करने की इजाज़त लेनी होगी (शायद साइप्रस में यूके के अक्रोटिरी बेस का भी) और उन्हें और उनके मेजबान देशों को जवाबी कार्रवाई से बचाना होगा. दूसरा विकल्प जून में फोर्डो की भूमिगत ईरानी परमाणु साइट पर B-2 बॉम्बिंग मिशन जैसा हमला हो सकता है, लेकिन किसी शहरी, ज्यादा आबादी वाली जगह पर ऐसा हमला खतरनाक साबित हो सकता है.

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ईरान भी तैयार!

भले ही अमेरिका मिडिल ईस्ट में अपने संसाधनों का इस्तेमाल न करे, लेकिन अगर देश पर हमला होता है तो ईरानी नेताओं ने उसके बेस और जहाजों पर हमला करने की धमकी दी है. हालांकि इजराइल के साथ 12 दिन के युद्ध में ईरान की सैन्य क्षमताएं बुरी तरह कमजोर हो गई थीं, लेकिन खबरों के मुताबिक तेहरान ने सीमित मिसाइल क्षमता बनाए रखी है. ईरान की मुख्य लॉन्च साइटें पहाड़ों में दबी हुई हैं, जिन्हें तेहरान फिर से बना रहा है. ‘द गार्जियन’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के पास लगभग 2,000 भारी बैलिस्टिक मिसाइलें हैं जो बड़ी संख्या में लॉन्च की जाएं तो अमेरिकी और इजराइली हवाई सुरक्षा को चकमा दे सकती हैं.

बम गिराएं या नहीं?

दूसरी समस्या जिसका सामना अमेरिका कर रहा है, वह है हमले के लिए लक्ष्यों की पहचान करना. ईरानी शासन द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली सैन्य और नागरिक साइटों की पहचान करना मुश्किल नहीं होगा, लेकिन विरोध प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों पर शासन की खूनी कार्रवाई पूरे देश में हो रही है. भले ही साइटों की पहचान कर ली जाए, लेकिन लक्ष्य की सटीकता सुनिश्चित करना हमेशा एक चुनौती होती है और शहरी इलाकों में नागरिकों की मौत एक बड़ा जोखिम होगा.

पासा पलट सकता है ईरान!

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि ईरानी शासन 1953 के अमेरिकी तख्तापलट से लेकर अमेरिकी दखलंदाजी के लंबे इतिहास को देखते हुए किसी भी अमेरिकी हमले का इस्तेमाल अपने बचे हुए समर्थन को एकजुट करने के लिए आसानी से कर सकता है. खामेनेई शासन इस समय आम लोगों के बीच अलोकप्रिय हो सकता है, लेकिन सरकार कमजोर नहीं दिखती, क्योंकि वह जून में इजराइल के लगातार हमले से पहले ही बच चुकी है. रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टीट्यूट थिंक टैंक की एक वरिष्ठ सहयोगी रोक्सेन फरमानफरमाइयन के हवाले से ‘द गार्जियन’ ने बताया, ‘ईरान में स्पष्ट रूप से एक एकजुट सरकार है और वह दिखा रही है कि वह खतरे में नहीं है.

अमेरिका खमेनेई पर सीधे हमले पर भी विचार कर सकता है, लेकिन किसी दूसरे देश के नेता को मारने से कई कानूनी दिक्कतें खड़ी हो जाएंगी और लगातार मिलिट्री जवाब मिल सकता है. साथ ही, इस बात की भी संभावना कम है कि इससे सत्ता में बदलाव होगा, क्योंकि ईरानी नेता ने अपनी जगह लेने के लिए तीन सीनियर मौलवियों को शॉर्टलिस्ट भी किया हुआ है.

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