लिव-इन-रिलेशनशिप में क्या हैं आपके अधिकार? बच्चे को मिलेगा पिता की प्रॉपर्टी में हक? समझ लें ये बातें

लिव-इन में रहने वाले कपल की जिंदगी में उनके माता-पिता समेत कोई दखल नहीं कर सकता है. भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 21 के तहत लिव-इन जोड़ों को जीवन का अधिकार है.

Published date india.com Published: August 7, 2025 9:57 PM IST
लिव-इन-रिलेशनशिप में क्या हैं आपके अधिकार? बच्चे को मिलेगा पिता की प्रॉपर्टी में हक? समझ लें ये बातें
2010 में लिव इन रिलेशनशिप को लेकर सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला आया था.

भारत में लिव-इन रिलेशनशिप गैर कानूनी नहीं है. कपल किसी भी जेंडर का हो सकता है, लेकिन उनकी उम्र 18 साल से ज्यादा होनी चाहिए. बिना किसी दबाव के दोनों की आपसी सहमति होनी चाहिए. लिव-इन में रहने वाले कपल की जिंदगी में उनके माता-पिता समेत कोई दखल नहीं कर सकता है. भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 21 के तहत लिव-इन जोड़ों को जीवन का अधिकार है.

आइए समझते हैं भारत में लिव इन कपल को मिले हैं कौन से अधिकार? उत्तराखंड ने UCC में इसे क्यों शामिल किया? क्या लिव इन रिलेशन में पैदा हुए बच्चे को पिता की संपत्ति में बराबर का हक मिलता है:-

लिव इन रिलेशन को लेकर क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट?

2010 में लिव इन रिलेशनशिप को लेकर सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला आया था. डी. वेलुसामी VS डी. पचैअम्माल के मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर कोई महिला लंबे समय से रिलेशनशिप में साथ रह रही है, तो वह हिंदू मैरिज एक्ट के मुताबिक CRPC-125 में क्लेम कर सकती है. क्रिमिनल लॉ में बदलाव के बाद अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के सेक्शन 144 में मेंटेनेंस के प्रावधान आते हैं. इसके साथ ही घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 की धारा 2 (F) में भी लिव इन रिलेशन को जोड़ा गया था. यानी लिव इन में रह रहे जोड़े भी घरेलू हिंसा की रिपोर्ट दर्ज करा सकते हैं. लिव इन रिलेशन के लिए एक कपल को पति-पत्नी की तरह एक साथ रहना होगा, लेकिन इसके लिए कोई टाइम लिमिट नहीं है.

उत्तराखंड सरकार ने UCC में लिव-इन-रिलेशनशिप को लेकर किए ये प्रावधान?

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  • उत्तराखंड की बीजेपी सरकार यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी UCC लागू करने वाला देश का पहला राज्य है.
  • उत्तराखंड सरकार ने अपने UCC में लिव-इन-रिलेशनशिप को मैरिज की तरह ही ट्रीट किया है.
  • उत्तराखंड में रह रहे किसी भी राज्य के युवाओं को लिव-इन में रहने के लिए रजिस्ट्रार के सामने स्टेटमेंट देना जरूरी होगा.
  • इसके साथ ही अगर उत्तराखंड राज्य का कोई युवा राज्य के बाहर लिव-इन में रहता है, तो उसे उस राज्य में रजिस्ट्रार के सामने इसका स्टेटमेंट पेश करना होगा.
  • अगर लिव-इन में रहते हुए बच्चे का जन्म होता है, तो उस बच्चे को वैध संतान माना जाएगा.
  • रजिस्‍टर्ड लिव-इन पार्टनर्स को रिलेशन खत्‍म करने के लिए भी रजिस्‍ट्रार से अनुमति लेनी होगी.
  • लिव-इन पार्टनर्स के आवेदन की जांच करने के बाद रजिस्‍ट्रार इसे टर्मिनेट करेंगे.
  • इसमें लड़की को मेंटेनेंस मांगने का भी अधिकार होगा, जिसके लिए लड़की अदालत में अपील कर सकेगी.

क्या लिव इन रिलेशन के दौरान पैदा हुए बच्चे को पिता की संपत्ति में हक मिलेगा?
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत ऐसे बच्चों को पिता की स्व-अर्जित संपत्ति पर अधिकार हो सकता है. अगर संपत्ति पूर्वजों से विरासत में मिली हो, तो बच्चा उसके हिस्से के लिए भी दावेदारी पेश कर सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि अगर लिव-इन रिलेशनशिप लंबे समय तक स्थायी और सार्वजनिक रूप से मान्य रही है, तो उसमें पैदा हुए बच्चे को वैध माना जाएगा. ऐसे में वह बच्चा पिता की संपत्ति में हकदार हो सकता है, लेकिन यह अधिकार संपत्ति के प्रकार और परिस्थितियों पर निर्भर करता है.

लिव-इन-रिलेशनशिप में पार्टनर्स को इन चुनौतियों का करना पड़ता है सामना

  • भारत में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले कपल को सामाजिक और कानूनी दोनों तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.
  • समाज में लिव-इन रिलेशनशिप को आज भी पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया जाता है. ऐसे में पार्टनर्स को कई बार फैमली, दोस्तों और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है.
  • लिव-इन पार्टनर्स को विवाहित जोड़ों के समान उतने कानूनी अधिकार नहीं हैं. अलग होने की स्थिति में वे संपत्ति के अधिकार, विरासत या भरण-पोषण के हकदार नहीं हो सकते हैं.
  • लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े शादीशुदा जोड़ों की तरह सोशल सिक्योरिटी जैसे हेल्थ इंश्योरेंस, पेंशन या अन्य बेनिफिट के हकदार नहीं हैं.

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