Explainer: न्यूक्लियर प्रोग्राम से लेकर लेबनान की सुरक्षा तक... ईरान-अमेरिका के बीच आखिर किन मुद्दों पर फंसी है शांति की बात?

Written By: Anjali Karmakar Updated by: Anjali Karmakar
Updated Date:June 22, 2026 11:26 PM IST

ईरान के साथ जंग शुरू होने के 110 दिनों बाद 18 जून 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पीस डील पर साइन कर दिए हैं. इस जंग में दुनिया को लाखों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.

  • 28 फरवरी से चल रही US-इजरायल और ईरान की जंग.
  • इजरायल के पास इंटरसेप्टर्स और हथियारों की भारी कमी.
  • इजरायल में PM नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के 3 मामले दर्ज.
  • ईरान जंग में अब तक 7 हजार से ज्यादा मौतें, 55000 घायल.

अमेरिका और ईरान के बीच जंग खत्म करने के लिए अंतरिम समझौते (पीस डील) पर 18 जून 2026 को साइन हो चुके हैं. इस पीस डील के कायम रहने की गारंटी पाकिस्तान ने ली है. ईरान समर्थित लेबनान के संगठन हिजबुल्लाह के ठिकानों पर इजरायली हमलों के बीच शांति के लिए बातचीत भी चल रही है. रविवार (22 जून 2026) को स्विटजरलैंड के जेनेवा में ईरान और अमेरिका के बीच जंग खत्म करने को लेकर पहली बार बात हुई.

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स्विटजरलैंड में हुई पहले दिन की बातचीत पॉजिटिव रही. अमेरिका ने ईरानी तेल के निर्यात पर 60 दिनों की अस्थायी छूट दे दी है. यानी ईरान 21 अगस्त से तमाम देशों को अपने पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट बेचकर कमाई कर सकता है. दूसरी ओर, ईरान ने इंटरनेशनल न्यूक्लियर एनर्जी एजेंसी की निगरानी पर सहमति जताई है, लेकिन अंतिम समझौते तक पहुंचने का रास्ता अभी आसान नहीं दिख रहा. अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की दिशा में तरक्की जरूर हुई है, लेकिन दोनों देशों के बीच कई ऐसे मुद्दे हैं; जिन पर अब भी गहरे मतभेद बने हुए हैं. आइए जानते हैं ये मुद्दे कौन से हैं? बतौर गारंटर पाकिस्तान का क्या रोल है? अगर डील टूट गई तो क्या होगा?

ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम का क्या होगा?

  • ईरान और अमेरिका के बीच मतभेद का सबसे बड़ा मुद्दा ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम है. अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम एनरिचमेंट पूरी तरह बंद करे. वह अपने पास मौजूद हाई क्वालिटी का एनरिच्ड यूरेनियम अमेरिका को सौंप दे.इस मुद्दे पर अमेरिका का तर्क है कि इससे ईरान के लिए न्यूक्लियर हथियार बनाना मुश्किल हो जाएगा.
  • दूसरी ओर,ईरान का कहना है कि एक संप्रभु देश होने के नाते न्यूक्लियर एनर्जी और साइंटिफिक रिसर्च के लिए यूरेनियम एनरिचमेंट करना उसका अधिकार है. वह इसे पूरी तरह छोड़ने को तैयार नहीं है. यही मुद्दा दोनों देशों के बीच जंग खत्म करने को लेकर सबसे बड़ी बाधा मानी जा रहा है.

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आर्थिक प्रतिबंध

  • ईरान और अमेरिका के बीच दूसरा बड़ा विवाद आर्थिक प्रतिबंधों को लेकर है. ईरान चाहता है कि अमेरिका उस पर लगे तेल, बैंकिंग और व्यापार संबंधी सभी प्रतिबंध हटा दे. इससे ईरान की अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी.
  • अमेरिका फिलहाल फेजफाइज पाबंदियों को हटाने के पक्ष में है.सोमवार (22 जून 2026) को अमेरिका ने ईरान के कच्चा तेल और पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट पर लगी पाबंदियों को 60 दिनों के लिए हटा दिया है.
  • अमेरिकी राष्ट्रपति चाहता है कि पहले ईरान अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करे. इसलिए उसे एक साथ राहत नहीं दी जा रही है. जबकि ईरान अपने पर लगी पाबंदियों में एक साथ ढील चाहता है, ताकि इकोनॉमी में फ्लो आए. ऐसे में स्थायी राहत को लेकर दोनों पक्षों में सहमति नहीं बन पाई है.

बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम

  • तीसरा विवाद ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम को लेकर है. अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी लंबी दूरी की मिसाइलों के डेवलपमेंट और तैनाती पर सीमाएं मंजूर करे. अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि न्यूक्लियर प्रोग्राम के साथ मिसाइल क्षमता को बढ़ाना क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है.
  • वहीं, ईरान का कहना है कि उसकी मिसाइलें सिर्फ रक्षा के लिए हैं. वह इस मुद्दे पर बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेगा.

IAEA की निगरानी

  • अमेरिका चाहता है कि इंटरनेशनल न्यूक्लियर एनर्जी एजेंसी(IAEA) को ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों तक व्यापक पहुंच मिले, ताकि इनपर निगरानी रखी जा सके.
  • ईरान इसके लिए कतई राजी नहीं है. ईरान ने निरीक्षकों की वापसी पर सहमति तो दी है, लेकिन निगरानी की सीमा और शर्तों पर अभी बातचीत जारी है.

होर्मुज स्ट्रेट का कंट्रोल

  • फारस की खाड़ी और होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है. यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में से एक है. अमेरिका चाहता है कि यहां जहाजों की आवाजाही बिना किसी बाधा के जारी रहे, जबकि ईरान इसे अपनी रणनीतिक सुरक्षा से जोड़कर देखता है.
  • ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट पर अपने कंट्रोल और यहां से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूली की शर्त रखी है. अमेरिका इसके लिए तैयार नहीं है.

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लेबनान में सुरक्षा

  • अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी स्थायी शांति समझौते में लेबनान सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक माना जाता है. इसकी वजह है कि लेबनान में ईरान समर्थित संगठन हिजबुल्लाह का मजबूत प्रभाव है. इजरायल इसे अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है.
  • अमेरिका का मानना है कि अगर ईरान के साथ लॉन्ग टर्म समझौता होना है, तो सिर्फ न्यूक्लियर प्रोग्राम पर सहमति काफी नहीं होगी.अमेरिका चाहता है कि लेबनान से इजरायल पर रॉकेट और मिसाइल हमलों का खतरा कम हो. हिजबुल्लाह की सैन्य क्षमता पर नियंत्रण लगे.लेबनान की सरकार और सेना को मजबूत किया जाए.इजरायल-लेबनान सीमा पर स्थिरता बनी रहे.
  • ईरान का नजरिया बिल्कुल अलग है. ईरान हिजबुल्लाह लेबनान का वैध राजनीतिक और प्रतिरोधी संगठन है. इजरायल की सैन्य कार्रवाई और कब्जे की नीतियों के खिलाफ हिजबुल्लाह जरूरी सुरक्षा कवच है.ईरान का कहना है कि लेबनान के आंतरिक मामलों में बाहरी दखल नहीं होना चाहिए.क्षेत्रीय सुरक्षा सिर्फ ईरान पर दबाव डालकर हासिल नहीं की जा सकती.
  • ईरान का दावा है कि हिजबुल्लाह ने कई बार इजरायली हमलों के खिलाफ लेबनान की रक्षा की है, इसलिए उसे पूरी तरह कमजोर करने की मांग स्वीकार्य नहीं है.
  • इजरायल इस पूरे समीकरण का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है.इजरायल का आरोप है कि ईरान हिजबुल्लाह को हथियार, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता देता है. लेबनान में हजारों रॉकेट और मिसाइलें इजरायल की ओर तैनात हैं. अगर ईरान पर प्रतिबंध हटते हैं तो उसका कुछ आर्थिक लाभ हिजबुल्लाह तक पहुंच सकता है.
  • इसी वजह से इजरायल लगातार अमेरिका पर दबाव बना रहा है कि ईरान के साथ किसी भी समझौते में हिजबुल्लाह और क्षेत्रीय सुरक्षा को शामिल किया जाए. वहीं, ईरान लेबनान को साथ लेकर चलने पर जोर दे रहा है.

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अगर डील टूट गई तो क्या होगा?

अगर अमेरिका या ईरान में से कोई भी पक्ष समझौते की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो सबसे पहले क्षेत्रीय तनाव फिर बढ़ सकता है. इससे कच्चे तेल के मार्केट में उथल-पुथल मच सकती है. ग्लोबल इकोनॉमी पर असर पड़ेगा. आखिर में महंगाई बढ़ेगा. यानी आम आदमी पर असर पड़ना तय है.

डील को बनाए रखना पाकिस्तान के लिए भी चुनौती

ईरान-अमेरिका के बीच शांति समझौता पाकिस्तान के लिए भी एक बड़ी परीक्षा है. अगर वह दोनों पक्षों के बीच भरोसा बनाए रखने में सफल रहता है, तो उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति मजबूत हो सकती है. लेकिन, अगर समझौता फेल हो जाता है, तो आलोचक यह सवाल उठाएंगे कि क्या आतंकियों का पनाहगार पाकिस्तान वास्तव में शांति प्रक्रिया का भरोसेमंद गारंटर था?

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