Explainer: PoK में चुनाव या पॉलिटिकल मैनेजमेंट? 30 मौतों के बाद उठे बड़े सवाल, पाकिस्तान पर क्यों बढ़ा दबाव
PoK में विरोध का सबसे बड़ा कारण चुनावी व्यवस्था को लेकर लंबे समय से चली आ रही असंतुष्टि है. प्रदर्शनकारियों और कई विपक्षी दलों का आरोप है कि यहां चुनाव सिर्फ औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह गए हैं, जबकि असली नियंत्रण इस्लामाबाद के हाथ में रहता है.
PoK के 45 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव मूल रूप से 27 जुलाई को होने थे, लेकिन लगातार तनाव के कारण चुनाव तीन चरणों में कराने का फैसला लिया गया. (PTI)
- PoK में पहले फेज की वोटिंग में 19 लोगों की मौत
- शरणार्थियों के लिए रिजर्व 12 सीटों पर मचा है बवाल
- JAAC ने सरकार के साथ बातचीत फेल होने पर निकाला मार्च
- भारत ने PoK में हो रहे चुनावों को मानने से किया इनकार
पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (PoK) एक बार फिर हिंसा और राजनीतिक उथल-पुथल का केंद्र बन गया है. यहां विधानसभा चुनावों के बीच चुनावी धांधली के आरोपों को लेकर शुरू हुए विरोध प्रदर्शन देखते ही देखते खूनी झड़पों में बदल गए. सुरक्षा बलों की फायरिंग और हिंसक टकराव में कम से कम 30 लोगों की मौत हुई है, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि चुनाव पहले से तय थे. स्थानीय लोगों की लोकतांत्रिक आवाज को दबाने के लिए प्रशासन ने बल प्रयोग किया. दूसरी ओर, पाकिस्तान के अधिकारियों का कहना है कि प्रदर्शन हिंसक हो गए थे और सुरक्षा बलों ने आत्मरक्षा में कार्रवाई की. इस पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ पाकिस्तान के सामने राजनीतिक और सुरक्षा चुनौती खड़ी कर दी है, बल्कि एक बार फिर PoK में लोकतांत्रिक प्रक्रिया, प्रशासनिक नियंत्रण और मानवाधिकारों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
27 जुलाई को मीरपुर डिवीजन में वोटिंग हो चुकी है. 2 अगस्त को मुजफ्फराबाद डिवीजन और शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों पर वोटिंग होनी है. 10 अगस्त को पुंछ डिवीजन में मतदान होगा. आइए समझते हैं पीओके में चुनाव को लेकर भारत का रुख क्या है? 12 शरणार्थी सीटों का विवाद क्या है? चुनाव में धांधली के आरोप क्यों लग रहे हैं?
सीटों का गणित?
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में कुल 53 सीटें हैं. इनमें से 45 सीटों पर सीधा चुनाव होता है. 33 सीटों लोकल वोटर्स के लिए हैं. 12 सीटें कश्मीरी शरणार्थियों के लिए हैं. इसके अलावा 8 रिजर्व सीटें हैं. ये सीटें महिलाओं, टेक्नोक्रेट्स, उलेमा या मशायख और दूसरे वर्गों के लिए रिजर्व हैं. सबसे बड़ा विवाद विधानसभा की 53 सीटों में से 12 आरक्षित सीटों को लेकर है. ये सीटें शरणार्थियों के लिए रिजर्व हैं.
PoK की 12 शरणार्थी सीटों का विवाद क्या है?
12 सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए हैं, जो 1947 और उसके बाद जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान चले गए थे. स्थानीय संगठनों का आरोप है कि इन 12 सीटों के जरिए इस्लामाबाद चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है, इसलिए यह मुद्दा मौजूदा चुनावों का सबसे बड़ा विवाद बन गया है. इन सीटों के वोटर्स PoK में नहीं, बल्कि पाकिस्तान के पंजाब, खैबर पख्तूनख्वा और अन्य हिस्सों में रहते हैं. इस बार इन 12 सीटों पर करीब 6 लाख वोटर्स हैं.
तीन बड़ी पार्टियों के इर्द-गिर्द घूमती है PoK की राजनीति
PoK की राजनीति मुख्य रूप से तीन बड़ी पार्टियों के इर्द-गिर्द घूमती है. पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) का नेतृत्व बिलावल भुट्टो जरदारी कर रहे हैं. विधानसभा में यह प्रमुख विपक्षी दल मानी जाती है. पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) का नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ करते हैं. ये अभी पाकिस्तान की सत्तारूढ़ पार्टी है. PoK में भी इसका मजबूत राजनीतिक आधार माना जाता है. पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के संस्थापक इमरान खान हैं. इस पार्टी पर पाकिस्तान में कई तरह की कानूनी और राजनीतिक पाबंदियां लगी हैं. बावजूद इसके इस पार्टी के कई उम्मीदवार निर्दलीय के रूप में चुनावी मैदान में उतरे हैं.
आखिर लोग चुनाव प्रक्रिया के खिलाफ सड़कों पर क्यों उतरे?
PoK में विरोध का सबसे बड़ा कारण चुनावी व्यवस्था को लेकर लंबे समय से चली आ रही असंतुष्टि है. प्रदर्शनकारियों और कई विपक्षी दलों का आरोप है कि यहां चुनाव सिर्फ औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह गए हैं, जबकि असली नियंत्रण इस्लामाबाद के हाथ में रहता है.
इसके अलावा चुनाव में धांधली के आरोप भी लगातार लगाए जाते रहे हैं. विपक्षी दलों और स्थानीय संगठनों ने बैलेट बॉक्स कब्जाने, पहले से तैयार काउंटिंग दस्तावेज रखने और संघीय एजेंसियों के दखल जैसे आरोप लगाए हैं. प्रदर्शनकारियों का दावा है कि चुनाव के नतीजे पहले ही तय कर लिया गया है. वोटिंग सिर्फ औपचारिकता भर के लिए है.
'निष्ठा शपथ' को लेकर भी विवाद
एक और विवादित व्यवस्था उम्मीदवारों के लिए अनिवार्य 'निष्ठा शपथ' है. चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार को PoK के पाकिस्तान में विलय के समर्थन की शपथ लेनी होती है. आलोचकों का कहना है कि इससे आत्मनिर्णय या किसी वैकल्पिक राजनीतिक विचार रखने वाले उम्मीदवार चुनाव लड़ने से बाहर हो जाते हैं. मतदाताओं के सामने वास्तविक विकल्प नहीं बचता.
आर्थिक नाराजगी ने आंदोलन को और तेज किया
चुनावी विवाद के साथ-साथ आर्थिक समस्याओं ने भी लोगों के गुस्से को बढ़ाया. महंगी बिजली, गेहूं के आटे जैसी जरूरी वस्तुओं की बढ़ती कीमतें और संसाधनों के कथित दोहन को लेकर पहले से असंतोष था. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उनकी समस्याओं का समाधान करने के बजाय प्रशासन ने आंदोलनकारी संगठनों पर कार्रवाई की.
ज्वॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) जैसे संगठनों पर सख्ती और आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत कार्रवाई ने स्थानीय लोगों के गुस्से को और बढ़ा दिया. यही वजह रही कि चुनावी विरोध धीरे-धीरे व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदल गया.
प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें क्या हैं?
आंदोलनकारियों की मांगें सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं हैं. उनकी प्रमुख मांगों में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, चुनावी प्रक्रिया की समीक्षा, 12 आरक्षित सीटों की व्यवस्था समाप्त करना, स्थानीय प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए चुनावी सुधार, गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों की रिहाई और सुरक्षा बलों की कार्रवाई की निष्पक्ष जांच शामिल हैं. फायरिंग में मारे गए लोगों के लिए न्याय और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी आंदोलन का प्रमुख मुद्दा बन चुकी है.
सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत क्यों विफल रही?
प्रदर्शनकारियों और प्रशासन के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका. बताया गया कि सरकार ने 12 आरक्षित सीटों की व्यवस्था में बदलाव या चुनाव प्रक्रिया रोकने जैसी प्रमुख मांगों पर सहमति नहीं दी. चुनावी सुधारों को लेकर भी कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला. इसके बाद JAAC ने अपना लॉन्ग मार्च जारी रखने का फैसला किया. जैसे-जैसे सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ी और झड़पें तेज हुईं, दोनों पक्षों के बीच भरोसा पूरी तरह टूट गया और हिंसा फैलती चली गई.
दो जिलों में चुनाव क्यों टालने पड़े?
लगातार विरोध प्रदर्शन, कर्फ्यू और सुरक्षा स्थिति बिगड़ने के कारण चुनाव आयोग को पूंछ और सुधनोती जिलों में मतदान टालना पड़ा. चुनाव अधिकारियों के मुताबिक, कई पोलिंग कर्मचारी मतदान केंद्रों तक नहीं पहुंच सके, क्योंकि सड़कें बंद थीं. आवाजाही पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. कुछ क्षेत्रों में लगातार हिंसा और सुरक्षा अभियान चलने से सामान्य चुनाव कराना संभव नहीं रहा. सुधनोती की एक सीट पर एक निर्दलीय उम्मीदवार की मौत के बाद वहां अलग से चुनाव कराने का फैसला भी लिया गया.
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पाकिस्तान के लिए क्यों बढ़ सकती हैं मुश्किलें?
- विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम से पाकिस्तान को कई मोर्चों पर चुनौती का सामना करना पड़ सकता है. स्थानीय जनता का प्रशासन पर भरोसा और कमजोर हो सकता है.
- अगर बड़ी संख्या में लोग चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष नहीं मानते, तो नई सरकार की वैधता पर भी सवाल उठेंगे.
- बढ़ती सुरक्षा तैनाती और हिंसा से पूरा क्षेत्र और अधिक सैन्यीकृत हो सकता है. इससे विरोध प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था की समस्या लंबी खिंच सकती है.
- संघीय राजनीति पर भी इसका असर पड़ सकता है. प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के बीच चुनावी धांधली को लेकर आरोप-प्रत्यारोप की बात कही गई है.
- इसके अलावा PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान में समान मुद्दों पर विरोध की आवाजें तेज होने की आशंका भी जताई जा रही है.
भारत ने पहले क्या-क्या आपत्तियां उठाई हैं?
भारत लगातार यह कहता रहा है कि पूरा जम्मू-कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी शामिल है, भारत का अभिन्न हिस्सा है. भारत ने PoK में होने वाले चुनावों को कई बार कॉस्मेटिक एक्सरसाइज बताते हुए कहा है कि इससे क्षेत्र की कानूनी स्थिति नहीं बदलती. भारत का आरोप रहा है कि पाकिस्तान वहां वास्तविक लोकतांत्रिक अधिकार सुनिश्चित करने में विफल रहा है. राजनीतिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं.
भारत ने यह भी आरोप लगाया है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में आतंकवादी ढांचे सक्रिय रहे हैं. चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) जैसी परियोजनाएं भारत की संप्रभुता का उल्लंघन करती हैं. साथ ही, भारत ने PoK में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और बल प्रयोग पर भी चिंता जताई है. फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह संकट केवल चुनाव तक सीमित रहेगा या फिर PoK में केंद्र और स्थानीय जनता के बीच भरोसे की खाई आने वाले समय में और गहरी होगी.
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