
Anjali Karmakar
अंजलि कर्मकार 12 साल से जर्नलिज्म की फील्ड में एक्टिव हैं. उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया है. यहीं से मास कॉम में मास्टर्स की डिग्री ली ... और पढ़ें
भारत 26 जनवरी को अपना 77वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है. हर साल इस खास मौके पर दिल्ली के कर्तव्य पथ पर गणतंत्र दिवस की खास परेड होती है. गणतंत्र दिवस की परेड देश की सैन्य ताकत, सांस्कृतिक विरासत और एकता की झलक दिखाती है. करीब से इस परेड को देखना अलग ही अनुभव देता है. गणतंत्र दिवस हो या 15 अगस्त को मनाया जाने वाला स्वतंत्रता दिवस… इन राष्ट्रीय पर्व की शुरुआत राष्ट्रीय ध्वज के साथ ही होती है. लेकिन, इन दोनों दिनों के जश्न में कुछ चीजें एकदम अलग होती हैं. स्वतंत्रता दिवस का समारोह लाल किले पर होता है. प्रधानंत्री ध्वजारोहण करते हैं. वहीं, गणतंत्र दिवस की परेड कर्तव्य पथ (राजपथ)पर होती है. इस मौके पर राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं.
आइए समझते हैं गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस समारोह कुछ चीजें अलग क्यों होती हैं? गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं, इसे ध्वजारोहण क्यों नहीं कहा जाता? हमारे राष्ट्रीय चिह्न, राष्ट्रीय प्रतीक, राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को लेकर क्या नियम हैं? इनकी अनदेखी पर क्या कार्रवाई हो सकती है:-
गणतंत्र का क्या मतलब होता है?
गणतंत्र (Republic) का मतलब एक ऐसा देश होता है, जहां जनता सर्वोच्च होती है. अपने प्रतिनिधियों को चुनकर शासन करती है, न कि कोई राजा या वंशानुगत शासक होता है. इसका शाब्दिक अर्थ ‘जनता का शासन’ है. इसमें देश का प्रमुख (राष्ट्रपति) जनता की ओर से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है, जो कानून के शासन और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है.
26 जनवरी को ही क्यों मनाया जाता है गणतंत्र दिवस?
26 जनवरी 1950 को अंग्रेजों के बनाए गए गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 की जगह भारत का संविधान लागू हुआ था. भारत का संविधान वैसे तो 26 नवंबर 1949 को ही बनकर तैयार हो गया था. इसे संविधान सभा की मंजूरी भी मिल गई थी, लेकिन इसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था. दरअसल, 26 जनवरी 1930 को कांग्रेस ने देश की पूर्ण आजादी या पूर्ण स्वराज का नारा दिया था. इसी की याद में संविधान को लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 तक इंतजार किया गया. इसलिए इसे गणतंत्र दिवस के तौर पर मनाया जाता है.
26 जनवरी को राष्ट्रपति क्यों फहराते हैं झंडा?
चूंकि इस दिन भारत का संविधान लागू हुआ था और राष्ट्रपति का पद अस्तित्व में आया था. इसलिए इस दिन राष्ट्रपति तिरंगा फहराते हैं, जबकि 15 अगस्त को यह जिम्मेदारी प्रधानमंत्री निभाते हैं.
राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं,ध्वजारोहण क्यों नहीं करते?
ध्वजारोहण’ और ‘झंडा फहराना’ एक ही बात नहीं हैं? सुनने में भले ही ये शब्द एक जैसे लगते हों, लेकिन दोनों का मतलब, तरीका और ऐतिहासिक महत्व अलग है.26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस के दिन झंडा खंभे के ऊपर ही बंधा रहता है. इसे ऊपर ले जाने की जरूरत नहीं होती, बल्कि राष्ट्रपति सिर्फ रस्सी खींचकर उसे खोल देते हैं. इससे तिरंगा लहराने लगता है. इसे झंडा फहराना (Flag Unfurling) कहते हैं. इसका मतलब है कि भारत पहले से ही एक स्वतंत्र राष्ट्र था और अब वह अपना संविधान लागू कर एक गणराज्य बन रहा है. गणतंत्र दिवस पर झंडा देश के राष्ट्रपति फहराते हैं. संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति देश के पहले नागरिक और संवैधानिक प्रमुख होते हैं.
वहीं, 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस के दिन तिरंगा झंडा खंभे के नीचे बंधा होता है. प्रधानमंत्री रस्सी खींचकर इसे नीचे से ऊपर ले जाते हैं और फिर खोलकर फहराते हैं. इसे अंग्रेजी में ‘Hoisting’ कहा जाता है. नीचे से ऊपर ले जाकर झंडा फहराना इस बात का प्रतीक है कि भारत ने 200 वर्षों की गुलामी के बाद एक नए स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में जन्म लिया और अपना गौरव हासिल किया. स्वतंत्रता दिवस पर देश का नेतृत्व प्रधानमंत्री करते हैं, क्योंकि उस समय तक भारत का संविधान लागू नहीं हुआ था और प्रधानमंत्री ही देश के राजनीतिक प्रमुख थे.
कर्तव्य पथ पर ही क्यों होता है समारोह?
एक और बड़ा अंतर समारोह के स्थान का है. 15 अगस्त का कार्यक्रम ऐतिहासिक लाल किले पर आयोजित होता है, जहां से प्रधानमंत्री देश को संबोधित करते हैं. वहीं, 26 जनवरी का मुख्य समारोह कर्तव्य पथ पर होता है, जहां देश अपनी सैन्य शक्ति और सांस्कृतिक झांकियों का प्रदर्शन करता है.
देश की एकता और अखंडता के प्रतीक होते हैं राष्ट्रीय चिह्न
हर देश का अपना राष्ट्रीय झंडा, प्रतीक और राष्ट्रगान होता है. ये उस राष्ट्र की एकता और अखंडता का प्रतीक माना जाता है. बाकी देशों की तरह भारत का भी राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्र चिह्न, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत है. ये हमारे देश की आन-बान और शान है.
क्या है कानून?
भारत में राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय प्रतीकों, राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत का अपमान करना राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत संगीन अपराध है. ऐसे अपराधों के लिए कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है. कुछ मामलों में देशद्रोह का केस भी चलाया जा सकता है.
कविगुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने लिखा राष्ट्रगान
जन-गण-मन.. देश का राष्ट्रगान है. कविगुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने इस गाने को लिखा था. 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे पारित कर देश का राष्ट्रगान घोषित किया था. राष्ट्रीय पर्व यानी स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त), गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) और गांधी जयंती (2 अक्टूबर) को समारोह में राष्ट्रगान गाने का नियम है. इसके अलावा स्कूल-कॉलेज के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत भी राष्ट्रगान से की जाती है. पहले मूवी थियेटर में भी फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाया जाता है. लेकिन इसे अब बंद कर दिया गया है.
राष्ट्रगान गाने के नियम?
राष्ट्रगान को गाने के लिए कुछ नियम बनाए गए है. राष्ट्रगान में 5 पैरा आता है, जिन्हें 52 सेकंड में गाया जाता है. इसे गाते वक्त मौजूद लोगों को इसके सम्मान में अपनी जगह पर सीधे खड़ा होना जरूरी है. अगर ऐसा नहीं किया, तो इसे राष्ट्रगान का अपमान माना जाता है. इसेक लिए सजा का प्रावधान है.
राष्ट्रगान का अपमान करने पर कितनी सजा और जुर्माना?
राष्ट्रगान का अपमान करने पर राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 के तहत कानूनी कार्यवाही होती है. राष्ट्रगान को जानबूझकर रोकने या फिर राष्ट्रगान गाने के लिए जमा हुए समूह के लिए बाधा खड़ी करने पर मैक्सिमम 3 साल की सजा दी जा सकती है. इसके साथ ही जुर्माने और सजा, दोनों भी हो सकते हैं. मामले की गंभीरता के आधार पर सजा ज्यादा भी हो सकती है. राष्ट्रगान के दौरान सम्मानजनक मुद्रा में खड़े रहना जरूरी है और उस वक्त किसी भी तरह का शोरगुल या अव्यवहार नहीं करना चाहिए.
राष्ट्रीय ध्वज को लेकर क्या है कानून
देश में राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय प्रतीक और राष्ट्रगान का सम्मान बनाए रखने के लिए भारतीय ध्वज संहिता, 2002 और राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 लागू हैं. ये कानून राष्ट्रीय प्रतीक और तिरंगे के सही इस्तेमाल, प्रदर्शन और सम्मान के नियम निर्धारित करते हैं. अगर कोई इससे छेड़छाड़ करता है, तो उसकी यह गलती भारी पड़ सकती है.
तिरंगे के साथ ऐसा किया, तो जाएंगे जेल
तिरंगे का अपमान कई तरीकों से हो सकता है. अगर कोई व्यक्ति तिरंगे को जानबूझकर फाड़ता है, जलाता है, जमीन पर गिराता है, उस पर कुछ लिखता है या इसका अनुचित इस्तेमाल करता है, तो इसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान है. इसके अलावा तिरंगे का इस्तेमाल कपड़े, पर्दे, मेजपोश या सजावट के लिए नहीं किया जा सकता. तिरंगे को उल्टा फहराना, कटा-फटा या मैला झंडा फहराना और इसे किसी अन्य झंडे के नीचे फहराना भी नियमों का उल्लंघन है.
कितनी सजा का प्रावधान?
जो कोई भी व्यक्ति पब्लिक प्लेस या किसी दूसरी जगह पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे या उससे संबंधित राष्ट्रीय प्रतीक को विकृत, नष्ट करता है या रौंदता है. या मौखिक या लिखित शब्दों से तिरंगे का अपमान करता है, तो उसे मैक्सिमम 3 साल की जेल हो सकती है. इसके अलावा 5 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.
राष्ट्रीय प्रतीक
राष्ट्रीय प्रतीक हमारी पहचान के तत्वों का एक समूह हैं. ये भारत की विरासत के महत्व को दर्शाते हैं. भारत का राष्ट्रीय चिह्न अशोक स्तंभ है. इसे भारत सरकार ने 26 जनवरी 1950 को अपनाया गया था. राष्ट्रीय प्रतीक अशोक चिह्न सारनाथ (वाराणसी के पास) में सम्राट अशोक के सिंह स्तंभ के आधार पर तैयार किया गया है. सारनाथ में जो ये अशोक स्तंभ रखा है, वो 7 फुट से ज्यादा ऊंची है. उसमें दहाड़ते हुए एक जैसे शेर चारों दिशाओं में स्तंभ के ऊपर बैठे हैं. ये स्तंभ ताकत, साहस, गर्व और आत्मविश्वास को भी जाहिर करता है. राष्ट्रीय प्रतीक के नीचे ‘सत्यमेव जयते’ का आदर्श वाक्य अंकित है. यह प्रतीक भारत गणराज्य की एक आधिकारिक मुहर है. भारत सरकार के सभी ऑफिशियल लेटर्स और सरकारी दस्तावेजों में इसका इस्तेमाल होता है.
राष्ट्रीय प्रतीक के अपमान पर कितनी सजा का प्रावधान?
राष्ट्रीय प्रतीक अशोक चिह्न के अपमान या तोड़फोड़ पर कोई विशेष सजा निर्धारित नहीं है, बल्कि यह भारतीय ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीक अधिनियम के अंतर्गत आता है. इसमें अनुचित इस्तेमाल या अपमान के लिए 2 साल तक की कैद और 5 हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है.
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