Explainer: होर्मुज छोड़ खार्ग को क्यों हथियाना चाहते हैं ट्रंप? क्या US कर सकता है वेनेजुएला जैसा अटैक? समझिए आज की रात ईरान पर कितनी भारी
ईरान का खार्ग आइलैंड दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल रूट में से एक है. दुनिया का करीब 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है. अगर इस इलाके में हमला होता है या जहाजों की आवाजाही रुकती है, तो पूरी दुनिया में तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है.
दुनिया के लिए चोकपॉइंट बने होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने की ट्रंप की जिद अब सनक में बदल गई है. (AI जेनरेटेड इमेज)
- 28 फरवरी 2026 से चल रही ईरान जंग.
- खार्ग आइलैंड को कहते हैं ईरान का दिल.
- US के हमलों को बाद होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह बंद.
- नेतन्याहू नहीं चाहते अमेरिका और ईरान की हो डील.
US-Iran War: मिडिल ईस्ट में फिर से जंग शुरू हो गई है. अमेरिका-इजरायल सीजफायर तोड़ते हुए ईरान पर ड्रोन और मिसाइलें गिरा रहे हैं. ईरान भी पूरी ताकत के साथ इन हमलों का जवाब दे रहा है. इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को फिर से धमकी दी है. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका गुरुवार रात ईरान पर बड़ा हमला करेगा. उनका दावा है कि ईरान की ज्यादातर सैन्य ताकत पहले ही कमजोर हो चुकी है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आज की रात ईरान का दिल कहे जाने वाले खार्ग आइलैंड को तबाह करने की धमकी दे डाली है. ट्रंप ने यह भी कहा कि आने वाले दिनों में अमेरिका ईरान के सबसे बड़े ऑयल एक्सपोर्ट सेंटर खार्ग आइलैंड और दूसरे अहम तेल-गैस ठिकानों पर वेनेजुएला के जैसे कब्जा करेगा. वहीं, ईरान ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि अगर उसके तेल और गैस ठिकानों पर हमला हुआ, तो पूरे इलाके में तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित हो सकती है.
आइए जानते हैं आखिर होर्मुज छोड़कर खार्ग को क्यों हथियाना चाहते हैं ट्रंप? ईरान का दिल क्यों कहलाता है खार्ग? क्या अमेरिका ईरान के खार्ग पर वेनेजुएला जैसा कब्जा कर सकेगा? ट्रंप की धमकी के बाद आज की रात ईरान पर कितनी भारी?
ईरान का दिल है खार्ग आईलैंड
मिडिल ईस्ट में इजरायल-अमेरिका और ईरान की जंग हवाई हमले के बाद जमीनी हमलों में तब्दील होती दिख रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर दबाव बनाने के लिए अपने सैनिक भेज दिए हैं. दुनिया के लिए चोकपॉइंट बने होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने की ट्रंप की जिद अब सनक में बदल गई है. ट्रंप ने ईरान के 'दिल' पर वार करने की बात कही है. खार्ग आइलैंड को ईरान का दिल कहा जाता है. ट्रंप ने कहा कि उन्हें खार्ग पर कब्जा करके खुशी मिलेगी. आपको जानकर हैरानी होगी कि ईरान जिस खार्ग आइलैंड को अपना दिल कहता है और इसे लेकर इतराता है, उसपर कभी एक छोटे से देश का कब्जा था. अब ट्रंप इसे हड़पने की फिराक में हैं.
खार्ग की पोजिशन?
ईरान के दक्षिण तट से करीब 25 किलोमीटर दूर एक छोटा सा आइलैंड है. इसका नाम खार्ग है. ये आइलैंड स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बेहद करीब है. एकमात्र इस जगह पर ही अमेरिका और इजरायल ने अटैक नहीं किया है.इस आइलैंड पर करीब 3 करोड़ बैरल तेल स्टोर करने की क्षमता है. फिलहाल अनुमान है कि यहां करीब 1.8 करोड़ बैरल तेल स्टोरेज में मौजूद है. ये सामान्य हालात में 10 से 12 दिन के निर्यात के बराबर है.
खार्ग आईलैंड पर पहले किसका था कब्जा?
खार्ग आईलैंड (Kharg Island) पर ईरान से पहले 18वीं शताब्दी के मध्य में डच (Netherlands/Dutch) औपनिवेशिक ताकतों का कब्जा था. 1752-1753 के आसपास डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने वहां एक किला बनाया था. इसे बाद में 1766 में स्थानीय फारसी गवर्नर मीर मुहन्ना ने हराकर डच लोगों को वहां से खदेड़ दिया था. मुख्य रूप से 1753 से 1766 तक फारसी गवर्नर मीर मुहन्ना और डच सेना के बीच लड़ाई चली. मुहन्ना ने डच सेना को हरा दिया और उन्हें खार्ग से खदेड़ दिया. इसके बाद खार्ग पर फारस (ईरान) का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हुआ. 20वीं सदी (रेजा शाह पहलवी के समय) में इस आइलैंड को तेल निर्यात टर्मिनल के रूप में विकसित किया गया.
ईरान इस आइलैंड से कैसे करता है तेल का निर्यात?
ईरान के बड़े तेल क्षेत्र जैसे अहवाज, मरून और गचसरान से पाइपलाइन सीधे खार्ग आइलैंड तक आती हैं. यहां तेल को बड़े स्टोरेज टैंकों में रखा जाता है. फिर टैंकर जहाजों में भरकर दुनिया के अलग-अलग देशों में भेजा जाता है. 15 से 20 फरवरी के बीच तेल निर्यात 30 लाख बैरल प्रतिदिन से ज्यादा हो गया था, जो सामान्य से लगभग तीन गुना था.
कैसी है खार्ग आइलैंड की सुरक्षा?
खार्ग आइलैंड की सुरक्षा पुरानी हॉक सरफेस टू एयर मिसाइल बैटरी और कोस्टल एंटी-शिप मिसाइलों से होती है. आइलैंड पर मॉडर्न S-300 एयर डिफेंस सिस्टम की तैनाती नहीं है. साफ है कि खार्ग ऐसी जगह नहीं है, जहां पहुंचा नहीं जा सकता है. अमेरिका और इजरायल की हवाई ताकत ऐसी है कि अगर वह लोडिंग जेटी पर स्ट्राइक करें, तो एक रात में इसे तबाह कर देंगे. ईरान सरकार का रेवेन्यू खत्म हो जाएगा. लेकिन, वहां अटैक के ऐसे नतीजे होंगे, जिन्हें खुद अमेरिका और इजरायल तक संभाल नहीं पाएंगे.
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क्या खार्ग आइलैंड पर इससे पहले हमला हुआ था?
खार्ग आइलैंड पहले भी कई बार रणनीतिक चर्चा का हिस्सा रहा है. 1980 के दशक में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के समय ईरान की कुछ अन्य ऑयल फेसिलिटी पर हमला किया था, लेकिन खार्ग आइलैंड को निशाना नहीं बनाया गया. फिर, 2023 ईरान-इराक वॉर के दौरान इराकी हमलों में इस आइलैंड के तेल टर्मिनल को भारी नुकसान पहुंचा था. बाद में ईरान ने इसे दोबारा बना लिया.
खार्ग को लेकर ट्रंप का क्या है प्लान?
वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन इस बात पर विचार कर रहा है कि अगर खार्ग आइलैंड के तेल टर्मिनल को तबाह कर दिया जाए या उस पर कब्जा कर लिया जाए, तो ईरान की सबसे बड़ी इनकम बंद हो सकती है.
खार्ग में अमेरिका ने मिसाइल गिराये तो ईरान को कितना नुकसान?
खार्ग आइलैंड पर अमेरिकी हमले से ईरान को काफी नुकसान हो सकता है. ये आइलैंड ईरान का प्रमुख तेल निर्यात केंद्र है. यहां से देश का लगभग 90% तेल निर्यात होता है. ऐसे में अगर अमेरिका इस आईलैंड पर कब्जा कर लेता है, तो ईरान की इकोनॉमी को भारी नुकसान पहुंचेगा. इससे मिडिल ईस्ट में चल रहा संघर्ष और बढ़ सकता है.अगर अमेरिका खार्ग आईलैंड पर अटैक करता है, तो इसका असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहेगा.दुनिया का करीब 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है.ऐसे में अगर इस इलाके में हमला होता है या जहाजों की आवाजाही रुकती है, तो पूरी दुनिया में तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है.
अमेरिका को खार्ग को नुकसान पहुंचाकर कितना फायदा?
ईरान का खार्ग आइलैंड दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल रूट में से एक है.यह आईलैंड ग्लोबल एनर्जी सप्लाई चेन का एक अहम हिस्सा है. इसे नुकसान पहुंचाकर अमेरिका अपने यहां से तेल की सप्लाई करके कमाई कर सकता है. अमेरिका के कब्जे में अभी वेनेजुएला का तेल भंडार भी है. वेनेजुएला के पास दुनिया का करीब 300 प्लस अरब बैरल ऑयल रिजर्व है. अमेरिका अभी रोजाना 20 मिलियन बैरल से ज्यादा का पेट्रोलियम प्रोडक्शन कर रहा है.
अमेरिका ने जैसे वेनेजुएला के तेल पर किया कब्जा, खार्ग पर कर सकता है?
सैद्धांतिक रूप से अमेरिका खार्ग आइलैंड पर सैन्य कार्रवाई कर सकता है, लेकिन वेनेजुएला के तेल पर कंट्रोल जितना काम बेहद मुश्किल और जोखिम भरा होगा. इसके पीछे कई कारण हैं:
- पहला-खार्ग आइलैंड ईरान की तेल लाइफलाइन है. ईरान का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल निर्यात होता है. यह सिर्फ एक आर्थिक संपत्ति नहीं, बल्कि ईरान की रणनीतिक धुरी है. इस पर हमला या कब्जे की कोशिश सीधे ईरान के साथ तनाव को और बढ़ा सकती है.
- दूसरा- खार्ग आइलैंड पर किसी भी सैन्य कार्रवाई का असर तेल की वैश्विक कीमतों पर पड़ सकता है. इसका असर होर्मुज स्ट्रेट और खाड़ी देशों की सुरक्षा पर पड़ सकता है.
- तीसरा- ईरान जवाबी कार्रवाई में तेल टैंकरों और अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना सकता है.
- चौथा- किसी संप्रभु देश के क्षेत्र पर स्थायी कब्जा करना अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत बेहद विवादास्पद होगा. अमेरिका को वैश्विक स्तर पर भारी आलोचना और कूटनीतिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है.
आज की रात ईरान पर कितनी भारी ?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकी के बाद ईरान के लिए चिंता की सबसे बड़ी वजह खार्ग आइलैंड है. इस आइलैंड पर अगर किसी तरह की सैन्य कार्रवाई होती है, तो ईरान की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लग सकता है. वैश्विक तेल बाजार में भी उथल-पुथल मच सकती है. हालांकि, कई विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की कड़ी भाषा का एक उद्देश्य ईरान पर डील के लिए दबाव बनाना भी हो सकता है. क्योंकि, खार्ग आइलैंड पर स्थायी कब्जा या नियंत्रण की कोशिश सैन्य और राजनीतिक रूप से बेहद जटिल मानी जा रही है.
क्या अमेरिका और ईरान दोनों ही नहीं चाहते डील?
रिस्क एनालिस्ट टोरब्योर्न सोल्टवेड्ट का कहना है कि पीस डील को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है, लेकिन दोनों देश पहले अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं. ऐसा इसलिए, ताकि नेगोशिएशन कर पाएं. सोल्टवेड्ट के मुताबिक, अमेरिका का मानना है कि ज्यादा दबाव बनाकर वह ईरान से अपनी शर्तें मनवा सकता है. दूसरी ओर, ईरान को भरोसा है कि होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही रोककर वह दुनिया पर दबाव बना सकता है.
डील को लेकर इजरायल का क्या रूख?
इस बारे में इजरायल ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं. लेकिन, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के हाल के बयानों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो ईरान और अमेरिका के बीच कोई समझौता नहीं चाहते. इटली के प्रोफेसर लोरेन्जो कामेल ने न्यूज एजेंसी रॉयटर्स से कहा, "जब तक बेंजामिन नेतन्याहू सत्ता में हैं, तब तक अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत पूरी तरह सफल होना मुश्किल है. अक्टूबर में होने वाले इजरायली चुनाव तक नेतन्याहू युद्ध खत्म नहीं करना चाहेंगे. इसी वजह से हर कुछ दिनों या हफ्तों में हालात फिर बिगड़ सकते हैं." कामेल के मुताबिक, नेतन्याहू खुद को संकट के समय सबसे जरूरी नेता के रूप में दिखाना चाहते हैं, इसलिए यह युद्ध उनके लिए राजनीतिक रूप से भी अहम है.
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