
Anjali Karmakar
अंजलि कर्मकार 12 साल से जर्नलिज्म की फील्ड में एक्टिव हैं. उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया है. यहीं से मास कॉम में मास्टर्स की डिग्री ली ... और पढ़ें
यूएस फर्स्ट, टैरिफ, वर्ल्ड पीस, शांति का नोबेल, वेनेजुएला, कोलंबिया, ग्रीनलैंड और अब बोर्ड ऑफ पीस. देश-दुनिया की राजनीति में थोड़ी-बहुत दिलचस्पी रखने वाले लोगों को इन शब्दों से ही पता चल जाता है कि इनका कनेक्शन किससे है? दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) जैसे विश्व सुधार के मिशन पर चल रहे हैं. वेनेजुएला और कोलंबिया में जो हुआ, उसे पूरी दुनिया ने देखा. अब डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को लेकर मोलभाव चल रहा है. ग्रीनलैंड को लेकर जिस तरह से ट्रंप धमकी दे रहे हैं, उससे आगे क्या होना है… इसकी एक धुंधली ही सही,लेकिन एक तस्वीर जरूर निकल रही है. इन सबके बीच ट्रंप वर्ल्ड पीस की बात भी कर रहे हैं.
डोनाल्ड ट्रंप ने स्विट्जरलैंड के दावोस में गाजा बोर्ड ऑफ पीस को लॉन्च कर दिया है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप की नई बोर्ड ऑफ पीस के लिए साइनिंग सेरेमनी में 20 से भी कम देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए. इस बोर्ड ऑफ पीस को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं. आइए समझते हैं कि जब दुनिया में शांति की स्थापना के लिए पहले से संयुक्त राष्ट्र का अस्तित्व है. फिर शांति के लिए किसी नए बोर्ड की जरूरत क्यों पड़ी? कहीं इसे UN का रिप्लेसमेंट बनाने का इरादा तो नहीं है? बोर्ड ऑफ पीस में 3 साल से जंग लड़ रहे रूस और पाकिस्तान जैसे आतंकियों के पनाहगार की मौजदूगी क्यों है? क्या खुद जंग लड़ने वाले और आतंकियों को फंडिंग करने वाले शांति ला सकते हैं?
बोर्ड ऑफ पीस क्या है?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंब ने सबसे पहले सितंबर 2025 में गाजा युद्ध खत्म करने की योजना पेश करते हुए इस बोर्ड का प्रस्ताव रखा था. तब अमेरिका ने करीब 60 देशों को इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता भेजा है. बाद में बताया गया कि बोर्ड की भूमिका सिर्फ गाजा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह ग्लोबल लेवल पर संघर्षों को सुलझाने और दुनिया में शांति कायम करने का काम करेगा.
UN के रहते शांति के लिए बोर्ड ऑफ पीस क्यों?
असल में UN की नींव ही तो शांति की स्थापना के लिए रखी गई थी. 1910 और 1950 के बीच दुनिया ने दो विश्वयुद्ध की भीषण त्रासदी देखी. इसमें हजारों लोगों की मौत हुई. कई देशों को भारी आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा. 1945 में जब द्वितीय विश्व युद्ध खत्म हुआ, तब दुनियाभर के देशों ने अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ाने के उद्देश्य से एक संगठन बनाने की तैयारी की.24 अक्टूबर 1945 को नतीजे के रूप में यूनाइटेड नेशंस सामने आया था.
UN के 193 सदस्य देश
आज UN का हेडक्वार्टर न्यूयॉर्क में है. इसके 193 सदस्य देश हैं. अलग-अलग काम के लिए UN के सेक्शन बने हैं. जैसे-जनरल असेंबली, सिक्योरिटी काउंसिल, इकोनॉमिक एंड सोशल काउंसिल, ट्रस्टीशिप काउंसिल, इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस और यूएन सेक्रेटेरिएट.
UN के लिए ट्रंप का बोर्ड ऑफ पीस कितनी बड़ी चुनौती?
‘शांति बोर्ड’ की परिकल्पना शुरू में विश्व के नेताओं के एक छोटे समूह के रूप में की गई थी, जो सीजफायर की देखरेख करता. लेकिन, ट्रंप ने इसे लेकर अपने और भी इरादे जाहिर किए हैं. ट्रंप ने इस बोर्ड में संयुक्त राष्ट्र के कुछ कामों को ट्रांसफर करने की बात कही है. हालांकि, ट्रंप ने कहा कि जब ये बोर्ड पूरी तरह बन जाएगा, तब यह बड़े फैसले ले सकेगा और जो भी काम होगा, वह UN के सहयोग से किया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि UN में बहुत क्षमता है, लेकिन उसका अब तक पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया है. ये बयान इस बात का संकेत है कि आने वाले कुछ सालों में UN का अस्तित्व ही खतरे में पड़ने वाला है.
फिलहाल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के 5 स्थायी सदस्यों में से अमेरिका के अलावा किसी भी देश ने अभी तक इस बोर्ड में शामिल होने की पुष्टि नहीं की है.
बोर्ड ऑफ पीस के मेंबर?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद को ही बोर्ड ऑफ पीस का प्रेसिडेंट बनाया है. अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो, अमेरिका के स्पेशल एंबेसेडर स्टीव विटकॉफ, ट्रंप के दामाद और एडवाइजर जैरेड कुश्नर, पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के CEO मार्क रोवन, वर्ल्ड बैंक के चेयरमैन अजय बंगा, अमेरिका के डिप्टी NSA रॉबर्ट गेब्रियल इसके मेंबर बनाए गए हैं.
खरीदी जा सकेगी बोर्ड की मेंबरशिप
बोर्ड ऑफ पीस को लेकर’ब्लूमबर्ग न्यूज’ ने अपनी एक रिपोर्ट में हैरान करने वाली जानकारी दी है. रिपोर्ट के मुताबिक, बोर्ड की परमानेंट मेंबरशिप खरीदी जा सकेगी. बोर्ड के ड्राफ्ट चार्टर में कहा गया है कि देशों को परमानेंट मेंबरशिप पाने के लिए पहले साल में $1 बिलियन (1 अरब डॉलर) की फीस देनी होगी. सामान्य सदस्यता 3 साल की होगी, जिसे बाद में रिन्यू किया जा सकता है. ड्राफ्ट के मुताबिक, अगर कोई देश चार्टर लागू होने के पहले साल में $1 बिलियन से ज्यादा कैश फॉर्म में देता है, तो उसकी 3 साल की समय सीमा लागू नहीं होगी. उसे परमानेंट मेंबरशिप मिल जाएगी. अब परमानेंट मेंबर को UN सिक्योरिटी काउंसिल के 5 स्थायी सदस्यों जैसे Veto Power मिलेंगे या नहीं, ड्राफ्ट में इसका जिक्र नहीं है.
यूरोप का ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस से किनारा
हैरानी वाली बात ये है कि ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस से यूरोप के कई देश और NATO के मेंबर किनारा कर चुके हैं. नॉर्वे और स्वीडन ने बुधवार को कहा कि वे आमंत्रण स्वीकार नहीं करेंगे.फ्रांस और इटली ने भी बोर्ड में शामिल होने से मना कर दिया है. दोनों ने इस बात पर जोर दिया था कि हालांकि वह गाजा शांति योजना का समर्थन करता है, लेकिन उसे चिंता है कि बोर्ड संघर्षों के समाधान के मुख्य मंच के रूप में संयुक्त राष्ट्र की जगह लेने का प्रयास कर सकता है.
अमेरिका और इजरायल की खूब बनती है. इजरायल भी 2023 से गाजा में फिलीस्तियों पर मिलिट्री एक्शन कर रहा है. हथियारों और फंड की मदद अमेरिका से हो रही है. फिर भी इजरायल के PM बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप के पीस बोर्ड को लेकर नाराजगी जाहिर की है.
बोर्ड में शामिल होंगे ये 8 इस्लामिक देश
गाजा ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में 8 इस्लामिक देश शामिल होंगे. इनके नाम कतर, तुर्किये, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) हैं. इन देशों के विदेश मंत्रियों ने कतर की राजधानी दोहा में जॉइंट स्टेटमेंट जारी करके इसका ऐलान किया है.
गाजा पीस बोर्ड को रूस 1 अरब डॉलर देगा
यूक्रेन में 2022 से मिलिट्री ऑपरेशन कर रहे रूस ने गाजा पीस बोर्ड को 1 अरब डॉलर देने की पेशकश की है. राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि भले ही बोर्ड में उनकी भागीदारी पर आखिरी फैसला लिया जाना बाकी है, लेकिन 1 अरब डॉलर देने का फैसला लिया जा चुका है. पुतिन ने कहा कि ये रकम उस रूसी प्रॉपर्टी से ली जा सकती है, जिसे अमेरिका ने पिछली सरकार के दौरान फ्रीज कर दिया था.
बता दें कि 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे. इन्हीं प्रतिबंधों के तहत अमेरिका और यूरोप में रूस के सेंट्रल बैंक और सरकारी फंड से जुड़ी अरबों डॉलर की संपत्तियों को फ्रीज कर दिया गया था.
पाकिस्तान ने बोर्ड ऑफ पीस में ली दिलचस्पी
ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस को लेकर एक और बात खटकती है. पाकिस्तान आतंकियों के लिए सॉफ्ट कॉर्नर रखता है, ये बात पूरी दुनिया जानती है. भारत में अब तक जितने आतंकी हमले हुए हैं, उनमें पाकिस्तान का हाथ रहता है. अपनी जमीं पर पाकिस्तान आतंकियों का पनाहगार है. वो आतंकी संगठनों को फंडिंग भी करता है. ऐसे में बोर्ड ऑफ पीस में पाकिस्तान की दिलचस्पी क्यों है और ट्रंप इसे बोर्ड में क्यों शामिल कर रहे हैं, ये अपने आप में बड़ा सवाल है.
भारत चुप क्यों?
ट्रंप भारत को अमेरिका को सबसे अच्छे दोस्तों में शुमार करते हैं. दूसरी ओर टैरिफ भी लगाते हैं. बहरहाल, ट्रंप ने बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के लिए भारत को भी न्योता दिया है. शुरुआत से ही भारत के इस बोर्ड में शामिल नहीं होने के कयास लगाए जा रहे थे. भारत ने अभी तक आधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं दिया है. लेकिन, इस चु्प्पी का अर्थ समझा जा सकता है.
भारत संयुक्त राष्ट्र के महत्वपूर्ण साझीदारों में एक है. भारत संयुक्त राष्ट्र के हर अभियान में शामिल रहता है, संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर भारत ग्लोबल साउथ की आवाज बनकर बोलता है. भारत जब UN में बोलता है,तो पूरी दुनिया सुनती है. ऐसे में साफ है कि भारत ऐसे किसी बोर्ड को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर अपनी सहमति नहीं देगा, जो संयुक्त राष्ट्र को रिप्लेस करे या उसके अस्तित्व को ही मिटा दे.
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