Aja Ekadashi 2018:  साल 2018 में अजा एकादशी का पावन व्रत 6 सितंबर गुरुवार को रखा जाएगा. एकादशी तिथि 5 सितंबर को बुधवार के दिन 3 बजकर 1 मिनट से शुरू होगी और अगले दिन यानी 6 सितंबर को 12:15 बजे पर समाप्त होगी.  व्रत का पारण 7 सितंबर शुक्रवार को सुबह 6 बजकर 6 मिनट से 8 बजकर 35 मिनट तक का होगा. Also Read - Aja Ekadashi 2020 Date & Timing:15 अगस्त को है अजा एकादशी, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

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भाद्रपद कृष्णपक्ष की अजा एकादशी व्रत कथा: Also Read - Ekadashi Calendar 2020: नए साल में आएंगे 25 एकादशी व्रत, देखें पूरे साल का व्रत कैलेंडर...

अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि हे प्रभु आप मुझ अजा एकादशी के बारे में बताएं. इस पर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि अर्जुन भाद्रपद में कष्णपक्ष में आने वाली एकादशी को अजा एकादशी कहते हैं. यह एकादशी सभी पापों को नष्ट करने वाली और अत्यंत शुभ फल देने वाली है.  इसका व्रत करने वाले और भगवान विष्णु व मां लक्ष्मी की पूजा करने वाले जातकों की हर मनोकामना पूरी होती है.

श्री कष्ण ने अर्जुन से कहा कि इस व्रत को करने वाले लोगों को कैसे-कैसे फल मिले यह सुनों…

अजा एकादशी व्रत 2018: जानिये तारीख, शुभ मुहूर्त और व्रत विधि

सतयुग में सूर्यवंशी चक्रवर्ती राजा हरिश्चंद्र हुए जो बड़े सत्यवादी थे. एक बार उन्होंने अपने वचन की खातिर अपना सम्पूर्ण राज्य राजऋषि विश्वामित्र को दान कर दिया. दक्षिणा देने के लिए अपनी पत्नी एवं पुत्र को ही नहीं स्वयं तक को दास के रुप में एक चण्डाल को बेच डाला. इस विपरीत परिस्थिति में भी राजा हरिश्चंद्र ने सत्य और धर्म का रास्ता नहीं छोड़ा.

चंडाल का सेवन करते हुए एक दिन राजा यह सोचने लगे कि इस परिस्थिति से मुझे कब छुटकारा मिलेगा. वह इस प्रकार चिंतन में थे कि उनके सामने एक दिन गौतम ऋषि आ गए. राजा ने उनसे अपनी पूरी व्यथा सुनाई.

गौतम ऋषि राजा की पूरी बात सुनी और बहुत दुखी हुए. उन्होंने राजा को अजा एकादशी करने की सलाह दी. उन्होंने राजा से कहा, हे राजन- भाद्रपद में कृष्णपक्ष की एकादशी व्रत का अनुष्ठान विधि पूर्वक करो और समस्त रात्रि जागरण करके भगवान का स्मरण करो.

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इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे सभी पाप क्षय हो जाएंगे. और तुम सभी प्रकार के कष्टो से छूट जाओगे.

इस प्रकार राजा को उपदेश देकर गौतम ऋषि वहां से चले गए. गौतम ऋषि ने जिस प्रकार राजा को व्रत करने की विधि बताई थी, उसी प्रकार राजा ने व्रत का अनुष्ठान किया और सारी रात जागरण करते हुए भगवान के नाम का स्मरण करते रहे.

इस प्रकार राजा को अपना राजपाट, पत्नी और बच्चा सब वापस मिल गया और वह सुखी-सुखी जीवन व्यतीत करने लगा.

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