Amalaki Ekadashi 2020: आमलकी एकादशी (Ekadashi) पर भगवान विष्‍णु (Lord Vishnu) की पूजा की जाती है. उनके पूजन से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. पुराणों में भी इस एकादशी का महत्‍व बताया गया है. हर साल होली (Holi) से चार दिन पहले ये एकादशी आती है. मान्‍यता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्‍यक्ति के सभी पाप नष्‍ट हो जाते हैं.

Amalaki Ekadashi 2020 Kab Hai

 

आमलकी एकादशी फाल्‍गुन माह के शुक्‍ल पक्ष एकादशी तिथि को आती है. इस माह आमलकी एकादशी 6 मार्च, शुक्रवार को है.

आमलकी एकादशी शुभ मुहूर्त

 

एकादशी तिथि प्रारंभ: 5 मार्च 2020 को दोपहर 1:18 बजे से
एकादशी तिथि समाप्‍त: 6 मार्च 2020 को सुबह 11:47 बजे तक.

आमलकी एकादशी का महत्‍व

 

आमलकी यानी आंवला. भगवान विष्णु ने आंवले को आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया है. इसके हर अंग में ईश्वर का स्थान माना गया है. मान्‍यता है कि आमलकी एकादशी के दिन आंवला और श्री हरि विष्‍णु की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्‍ति होती है.

पूजन विधि

 

दशमी रात से ही भगवान विष्‍णु का ध्‍यान करें. एकादशी के दिन सुबह नित्‍य कर्म से निवृत्त होकर स्‍नान करें. स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें. घर के मंदिर में विष्‍णु जी की प्रतिमा के सामने हाथ में तिल, कुश, मुद्रा और जल लेकर व्रत का संकल्‍प लें. विधि-विधान से श्री हरि का पूजन करें. श्री हरि विष्‍णु की आरती उतारें. भोग लगाएं. विष्‍णु की पूजा के बाद आंवले के वृक्ष की पूजा करें. दिन भर व्रत रखें. अगले दिन व्रत का पारण करें.

व्रत कथा

 

एक बार वैदिश नाम का नगर था, जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्ण आनंद सहित रहते थे. उस नगर में सदैव वेद ध्वनि गूंजा करती थी तथा पापी, दुराचारी तथा नास्तिक उस नगर में कोई नहीं था. उस नगर में चैतरथ नाम का चन्द्रवंशी राजा राज्य करता था. वह अत्यंत विद्वान तथा धर्मी था. उस नगर में कोई भी व्यक्ति दरिद्र व कंजूस नहीं था. सभी नगरवासी विष्णु भक्त थे और आबाल-वृद्ध स्त्री-पुरुष एकादशी का व्रत किया करते थे.

एक बार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आई. उस दिन राजा, प्रजा तथा बाल-वृद्ध सबने हर्षपूर्वक व्रत किया. राजा अपनी प्रजा के साथ मंदिर में जाकर पूर्ण कुंभ स्थापित करके धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न आदि से आंवले का पूजन करने लगे और इस प्रकार स्तुति करने लगे. इसके बाद सबने उस मंदिर में रात्रि जागरण किया.

रात के समय वहां एक बहेलिया आया, जो अत्यंत पापी और दुराचारी था. वह अपने कुटुम्ब का पालन जीव-हत्या करके किया करता था. भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल वह बहेलिया इस जागरण को देखने के लिए मंदिर के एक कोने में बैठ गया और विष्णु भगवान तथा एकादशी माहात्म्य की कथा सुनने लगा. इस प्रकार अन्य मनुष्यों की भांति उसने भी सारी रात जागकर बिता दी.

प्रात:काल होते ही सब लोग अपने घर चले गए तो बहेलिया भी अपने घर चला गया. घर जाकर उसने भोजन किया. कुछ समय बीतने के पश्चात उस बहेलिए की मृत्यु हो गई. मगर उस आमलकी एकादशी के व्रत तथा जागरण से उसने राजा विदूरथ के घर जन्म लिया और उसका नाम वसुरथ रखा गया. युवा होने पर वह चतुरंगिनी सेना सहित तथा धन-धान्य से युक्त होकर 10 हजार ग्रामों का पालन करने लगा. वह अत्यंत धार्मिक, सत्यवादी, कर्मवीर और विष्णु भक्त था. वह प्रजा का समान भाव से पालन करता था. दान देना उसका नित्य कर्तव्य था.

एक दिन राजा शिकार खेलने के लिए गया. दैवयोग से वह मार्ग भूल गया और दिशा ज्ञान न रहने के कारण उसी वन में एक वृक्ष के नीचे सो गया. थोड़ी देर बाद वहां कुछ लोग आ गए और राजा को अकेला देखकर ‘मारो, मारो…’ शब्द करते हुए राजा की ओर दौड़े. वे कहने लगे कि इसी दुष्ट राजा ने हमारे माता, पिता, पुत्र, पौत्र आदि अनेक संबंधियों को मारा है तथा देश से निकाल दिया है अत: इसको अवश्य मारना चाहिए.

ऐसा कहकर वे उस राजा को मारने दौड़े और अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र उसके ऊपर फेंके. वे सब अस्त्र-शस्त्र राजा के शरीर पर गिरते ही नष्ट हो जाते और उनका वार पुष्प के समान प्रतीत होता. अब उन लोगों के अस्त्र-शस्त्र उलटा उन्हीं पर प्रहार करने लगे जिससे वे मूर्छित होकर गिरने लगे. उसी समय राजा के शरीर से एक दिव्य स्त्री उत्पन्न हुई. वह स्त्री अत्यंत सुंदर होते हुए भी उसकी भृकुटी टेढ़ी थी, उसकी आंखों से लाल-लाल अग्नि निकल रही थी जिससे वह दूसरे काल के समान प्रतीत होती थी.

वह स्त्री उन लोगों को मारने दौड़ी और थोड़ी ही देर में उसने सबको काल का ग्रास बना दिया. जब राजा सोकर उठा तो उसने उन लोगोंको मरा हुआ देखकर कहा कि इन शत्रुओं को किसने मारा है? इस वन में मेरा कौन हितैषी रहता है? वह ऐसा विचार कर ही रहा था कि आकाशवाणी हुई, ”हे राजा! इस संसार में विष्णु भगवान के अतिरिक्त कौन तेरी सहायता कर सकता है.” इस आकाशवाणी को सुनकर राजा अपने राज्य में आ गया और सुखपूर्वक राज्य करने लगा.

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