Apara Ekadashi 2020: अपरा एकादशी कल, जानें शुभ मुहूर्त, व्रत, कथा और पूजन विधि से जुड़ी सभी बातें
ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है. अपरा एकादशी का हिन्‍दू धर्म में बड़ा महत्‍व है. इस बार अपरा एकादशी 18 मई यानी सोमवार को है. इस दिन व्रत करने से सभी दुख और विघ्न दूर होते हैं. पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार इस व्रत को करने से न सिर्फ भगवान विष्‍णु बल्‍कि माता लक्ष्‍मी भी प्रसन्‍न होती हैं.

अपरा एकादशी (Apara Ekadashi 2020) की कथा

प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था. उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था. वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था. उस अवसरवादी पापी ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया. इस अकाल मृत्यु से राजा प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक उत्पात करने लगा. अकस्मात एक दिन धौम्य नामक ॠषि उधर से गुजरे. उन्होंने प्रेत को देखा और तपोबल से उसके अतीत को जान लिया. अपने तपोबल से प्रेत उत्पात का कारण समझा. ॠषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया. दयालु ॠषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए स्वयं ही अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया और उसे अगति से छुड़ाने को उसका पुण्य प्रेत को अर्पित कर दिया. इस पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई. वह ॠषि को धन्यवाद देता हुआ दिव्य देह धारण कर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चला गया.

अपरा एकादशी (Apara Ekadashi 2020) तिथि और शुभ मुहूर्त

एकादशी तिथि प्रारंभ: 17 मई 2020 को दोपहर 12 बजकर 42 मिनट से
एकादशी तिथि सामाप्‍त: 18 मई 2020 को दोपहर 03 बजकर 8 मिनट तक
पारण का समय: 19 मई 2020 को सुबह 5 बजकर 28 मिनट से सुबह 8 बजकर 12 मिनट तक

Apara Ekadashi 2020

अपरा एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की साफ-सफाई करें. इसके बाद स्‍नान करने के बाद स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें व्रत का संकल्‍प लें. अब घर के मंदिर में भगवान विष्‍णु और बलराम की प्रतिमा, फोटो या कैलेंडर के सामने दीपक जलाएं. इसके बाद विष्‍णु की प्रतिमा को अक्षत, फूल, मौसमी फल, नारियल और मेवे चढ़ाएं. विष्‍णु की पूजा करते वक्‍त तुलसी के पत्ते अवश्‍य रखें. इसके बाद धूप दिखाकर श्री हरि विष्‍णु की आरती उतारें. अब सूर्यदेव को जल अर्पित करें. एकादशी की कथा सुनें या सुनाएं. व्रत के दिन निर्जला व्रत करें. शाम के समय तुलसी के पास गाय के घी का एक दीपक जलाएं . रात के समय सोना नहीं चाहिए. भगवान का भजन-कीर्तन करना चाहिए. अगले दिन पारण के समय किसी ब्राह्मण या गरीब को यथाशक्ति भोजन कराए और दक्षिणा देकर विदा करें. इसके बाद अन्‍न और जल ग्रहण कर व्रत का पारण करें