Asha Bhosle Spiritual Beliefs: अकेलेपन का दौर...सुरों की रानी के जीवन में जब 'अंधेरा' छाया, तब आस्था ने दिखाई थी राह

Asha Bhosle Spiritual Beliefs: आशा भोंसले जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि आस्था कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि वह मानसिक शक्ति है जो आपको दोबारा उठने की ताकत देती है. 'चलो बुलावा आया है' गाने वाली आशा जी को आज बेशक ईश्वर ने बुला लिया है लेकिन वो अपनी आवाज की मधुरता के साथ सदा लोगो के दिल में जिंदा हैं.

Published date india.com Updated: April 12, 2026 7:05 PM IST
Asha Bhosle Spiritual Beliefs: अकेलेपन का दौर...सुरों की रानी के जीवन में जब 'अंधेरा' छाया, तब आस्था ने दिखाई थी राह
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Singer Asha Bhosle Passes Away: आशा भोंसले जी की जादुई आवाज़ ने दुनिया को झूमने पर मजबूर किया, लेकिन उनके अपने जीवन में कई ऐसे मोड़ आए जहां सन्नाटा पसर गया था. एक कलाकार के तौर पर उन्होंने जितनी शोहरत देखी, एक इंसान के तौर पर उन्होंने उससे कहीं गहरे घाव सहे लेकिन इन घावों को भरने का काम किया अध्यात्म और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास ने.

व्यक्तिगत त्रासदी: आशा जी ने अपने जीवन में वो दुख झेला जो किसी भी माता-पिता के लिए सबसे भयानक होता है यानि अपने बच्चों को खुद से पहले जाते देखना. 2012 में उनकी बेटी वर्षा और फिर 2015 में बेटे आनंद का निधन उनके लिए किसी वज्रपात से कम नहीं था.

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अध्यात्म का सहारा: ऐसे समय में आशा जी ने खुद को पूरी तरह ईश्वर को सौंप दिया था. वो मानती हैं कि जीवन में जो कुछ भी होता है, वह प्रारब्ध  का हिस्सा है. इस आध्यात्मिक समझ ने उन्हें उस डिपरेशन से बाहर निकाला जो उन्हें भीतर ही भीतर खा रहा था.

संगीत,साधना और मेडीटेशन :आशा जी के लिए संगीत केवल एक पेशा नहीं, बल्कि उनकी साधना था उन्होंने कई बार कहा है कि जब वे तानपुरा लेकर बैठती हैं, तो उन्हें दुनिया का कोई दुख याद नहीं रहता था.

भजन का असर: जब वे ‘तोरा मन दर्पण कहलाए’ या ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम’ गाती थीं, तो वे केवल सुर नहीं लगातीं, बल्कि एक प्रार्थना करती थीं. यह संगीत ही था जिसने उनके एकांत और अकेलेपन को बदल दिया.

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मंगेशी मंदिर, जड़ों की ओर वापसी: जब भी आशा जी मानसिक रूप से टूटने लगती थीं, वे अपनी आध्यात्मिक जड़ों की ओर लौट जाती थीं. गोवा का मंगेशी मंदिर उनके परिवार की आस्था का केंद्र था जहां जाकर वो सूकून महसूस करती थी. ये बात उन्होंने अपने कई इन्टरव्यू में कही थी. मंदिर की घंटियों और वहां की शांत फिज़ा में उन्हें वह सुकून मिलता था, जो बड़े-बड़े अवॉर्ड्स और तालियों की गड़गड़ाहट में भी नहीं था. भगवान शिव (मंगेश) के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा ने उन्हें यह सिखाया कि जो आया है, उसे जाना है, बस बीच का समय सेवा और प्रेम में बिताना है.

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अकेलेपन को आस्था से जीता: पचपन साल की उम्र के बाद, जब इंसान को साथ की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, आशा जी ने कई करीबियों को खोया. आर.डी. बर्मन (पंचम दा) के जाने के बाद उनका अकेलापन और बढ़ गया.

ईश्वर से संवाद: उन्होंने भगवान को अपना सखा बना लिया था वे अक्सर कहती हैं कि मैं भगवान से बातें करती हूं, अपनी शिकायतें भी उन्हें सुनाती हूं और सुकून भी उन्हीं से मांगती हूं. इस संवाद ने उन्हें कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वे अकेली हैं.

90 की उम्र में भी जिंदादिली का आध्यात्मिक राज

आज आशा जी हमारे बीच नहीं लेकिन 90 साल से अधिक की उम्र में भी आशा जी के चेहरे पर जो चमक और आवाज़ में जो खनक रही, उसका राज उनकी आस्था ही थी. वो मानती थीं कि शिकायत करने से बेहतर शुक्रगुजार होना है. अध्यात्म ने उन्हें सिखाया कि पुरानी यादों के बोझ को ढोने के बजाय, वर्तमान पल को उत्सव की तरह जीना चाहिए.

डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. India.Com इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें. 

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