
Renu Yadav
रेनू यादव, India.Com हिंदी में असिस्टेंट न्यूज एडिटर के पद कार्यरत हैं. हिंदी पत्रकारिता में करीब 15 वर्षों के अनुभव के दौरान उन्हें टेक्नोलॉजी, धर्म, लाइफस्टाइल, हेल्थ व अन्य विषयों ... और पढ़ें
Astrology: जीवन और मृत्यु का रहस्य सृष्टि के सबसे गहरे विषयों में से एक है. सनातन धर्म के ग्रंथों में स्पष्ट कहा गया है कि जन्म और मृत्यु दोनों पूर्व निर्धारित हैं, लेकिन उनके बीच का जीवन और उसकी अवधि कई सूक्ष्म कारणों से प्रभावित होती है. इसी विषय पर प्रकाश डालते हुए ज्योतिषी एवं धर्मगुरु पंडित ज्ञानेश जी बताते हैं कि ‘अल्पायु मृत्यु को केवल एक घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह कर्म, ग्रह दशाओं और जन्म कुंडली के सूक्ष्म योगों का परिणाम होती है.’
धर्म ग्रंथों जैसे गरुड़ पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण में उल्लेख मिलता है कि मनुष्य की आयु तीन प्रकार की मानी गई है:- अल्पायु, मध्यमायु और पूर्णायु
पंडित ज्ञानेश जी के अनुसार, ‘यह केवल गणना नहीं, बल्कि आत्मा के कर्मों और उसके पूर्व जन्मों के संस्कारों से जुड़ा हुआ एक गूढ़ विज्ञान है.’
ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशेष योग और ग्रह स्थितियां ऐसी मानी गई हैं, जो जीवन की आयु को प्रभावित कर सकते हैं.
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अष्टम भाव को आयु का भाव कहा जाता है. यदि यह भाव पाप ग्रहों (शनि, राहु, केतु, मंगल) से पीड़ित हो या इसका स्वामी कमजोर हो तो आयु पर प्रभाव पड़ सकता है.
ज्योतिषाचार्य कहते हैं, ‘अष्टम भाव की स्थिति ही यह संकेत देती है कि जीवन में कितनी स्थिरता और कितनी अनिश्चितता रहेगी.’
दूसरा और सातवां भाव ‘मारक स्थान’ माने जाते हैं. इनके स्वामी या इनमें बैठे पाप ग्रह यदि दशा/अंतर्दशा में सक्रिय हो जाएं तो यह जीवन के लिए चुनौतीपूर्ण समय ला सकते हैं.
लग्न (Ascendant) शरीर और जीवन शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है. यदि लग्नेश नीच, अस्त या पाप ग्रहों से ग्रसित हो तो व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता और जीवन बल कमजोर हो सकता है.
यह एक महत्वपूर्ण योग है. इसमें जन्म के समय ही ग्रहों की स्थिति कमजोर होती है. जैसे चंद्रमा, लग्न या लग्नेश पीड़ित होते हैं.
ज्योतिषी एवं धर्मगुरु पंडित ज्ञानेश जी बताते हैं, ‘बालारिष्ट दोष का प्रभाव सही उपायों और समय के साथ कम भी किया जा सकता है, इसलिए इसे अंतिम सत्य नहीं मानना चाहिए.’
सूर्य या चंद्रमा के साथ राहु-केतु का संबंध विशेषकर लग्न या अष्टम भाव में जीवन में अचानक घटनाओं और अस्थिरता को बढ़ा सकता है.
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए- हर कुंडली में दोष होना सामान्य है, लेकिन हर दोष अल्पायु नहीं देता. पंडित ज्ञानेश जी स्पष्ट करते हैं: ‘ज्योतिष संभावनाओं का विज्ञान है, निश्चित भविष्यवाणी का नहीं’ एक ही योग अलग-अलग लोगों के जीवन में अलग परिणाम दे सकता है.’
अल्पायु मृत्यु को केवल डर या अंधविश्वास के रूप में नहीं देखना चाहिए. यह विषय गहरा, संवेदनशील और आध्यात्मिक है, जिसमें कुंडली, कर्म और समय तीनों की भूमिका होती है. अंततः, जैसा कि ज्योतिषी एवं धर्मगुरु पंडित ज्ञानेश जी कहते हैं- जीवन की लंबाई नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता और कर्म ही उसे सार्थक बनाते हैं.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. India.Com इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें.
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