Bakrid 2018: 22 अगस्त यानी बुधवार को बकरीद है. सिर्फ एक दिन बचा है. ऐसे में तैयारियां जोरो पर हैं. सऊदी अरब के मक्का-मदीना में हज यात्रा भी जारी है. भारत सहित दुनिया भर से लोग यहां पहुंचे हैं. हज करने के दौरान हज यात्रियों द्वारा शैतान को पत्थर मारने की रस्म अहम रस्मों में से एक है. हज यात्री इस रस्म को पूरा करने के लिए जुटते हैं और प्रतीकात्मक स्तंभों पर पत्थर मारते हैं. मन में कई बार सवाल आता होगा कि आखिर ऐसा क्यों होता. हाजी स्तम्भ पर पत्थर मारने को आतुर क्यों रहते हैं. बकरीद के मौके पर मुस्लिमों के इस प्रमुख त्यौहार से जुड़ी अन्य जानकारी के साथ ही India.com हज के दौरान पूरी की जाने वाली इस रस्म के बारे में बता रहा… Also Read - Haj 2020: सऊदी अरब ने कहा- इस बार हज के लिए न आएं भारतीय, मोदी सरकार लौटाएगी पैसा

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बेटे को कुर्बान करने निकले हजरत इब्राहीम के बीच आया शैतान

मुफ्ती अफ्फान असदी बताते हैं कि हजरत इब्राहिम की अल्लाह ने आजमाइश (परीक्षा) के लिए हुक्म (आदेश) दिया. यह हुक्म दिया गया कि वह अपनी सबसे प्यारी चीज को अल्लाह की राह में कुर्बान करें. हजरत इब्राहीम ने सबसे प्यारे बेटे हजरत इस्माइल को ही कुर्बान करने का इरादा कर लिया. हजरत इब्राहीम को अपने बेटे से बेहद प्यार करते थे, क्योंकि अल्लाह ने उन्हें 86 साल बाद बेटा अता फरमाया था. इसके बाद वह अपने बेटे को कुर्बान करने निकल पड़े. इसी बीच रास्ते में उन्हें शैतान मिला. शैतान ने हजरत इब्राहीम को बहकाने की कोशिश की. शैतान ने कहा कि इस उम्र में वह अपने की क़ुरबानी क्यों दे रहे हैं. अगर बेटा नहीं रहा तो उनकी देखभाल कौन करेगा. हजरत सोच में पड़ गए, लेकिन उनका इरादा पक्का था. उन्होंने इरादे से डिगाने की कोशिश करने के लिए शैतान को कंकड़ मारे. उन्होंने जमराहे उकवा, जमराहे वुस्ता व जमराहे उला जगहों पर कंकड़ मारे.

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कंकड़ी मारने से भागा था शैतान, फिर आगे बढ़े थे हजरत इब्राहीम

इसके बाद शैतान भाग गया. शैतान की बात सुने बिना आगे बढ़े हजरत इब्राहीम ने बेटे की कुर्बानी देते समय हाथ रुक न जाएं, इसलिए उन्होंने आंखों पर पट्टी बांध ली. उन्होंने जैसे ही कुर्बानी के लिए हाथ चलाए और फिर आंखों पर बंधी पट्टी को हटाकर देखा तो उनके बेटा हजरत इस्माईल सही सलामत थे और रेत पर एक दुम्बा (भेड़) जिबाह (कटा) होकर पड़ा हुआ था, जबकि उनका बेटा सही सलामत था. अल्लाह ने उनको कर्तव्य की परीक्षा में पास मान लिया. और उनके बेटे हजरत इस्माइल को जीवनदान दे दिया. इस वाकये के बाद से ही कुर्बानी का सिलसिला शुरू हुआ.

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इस रस्म को सुन्नत-ए-इब्राहीमी भी कहते हैं

जिन तीन जगहों पर हजरत इब्राहीम ने शैतान को पत्थर मारे थे, उन्हीं जगहों (जमराहे उकवा, जमराहे वुस्ता व जमराहे उला) पर तीन स्तंभ बना दिए थे. इन्हीं तीन स्तंभों को शैतान का प्रतीक मान उस पर पत्थर बरसाए जाते हैं. इस रस्म को सुन्नत-ए-इब्राहीमी भी कहा जाता है. यह रस्म इस्लामिक कलेंडर के 12वां महीना धू-अल-हिज्जा की 10 से 12 हिजरी (तारीख) को की जाती है. यह रस्म हज से पांच दिन की अहम रस्मों में से एक है, जो हज हज यात्री को पूरी करनी होती है.

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