Bakrid 2018: 22 अगस्त को बकरीद है. हज यात्रा भी इसी बीच होती है. हज लंबी और कठिन प्रक्रिया है. ऐसी रस्में होती हैं, जो क्रमबद्ध तरीके से पूरी की जाती है. अगर इन रस्मों में से एक भी पूरी न की जाए तो हज यात्रा भी पूरी नहीं होती है. हज के लिए अहम पांच पड़ाव होते हैं. बकरीद के मौके पर India.com हज यात्रा के बारे में बता रहा है.Also Read - भारत में 2022 में हज प्रक्रिया 100 फीसदी डिजिटल होगी, ऑनलाइन बुकिंग केंद्र शुरू

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उमरा के बाद हज यात्री पहले दिन सुबह (फज्र) की नमाज पढ़ कर मक्का से 5 किलोमीटर दूर मीना पहुंचते हैं. यहां हाजियों को अहराम पहनना होता है. यह एक खास लिबास होता है, जिसे पहन कर ही हज यात्रा करनी होती है. लिबास पूरा सफेद होता, जो सिला हुआ नहीं होता है. हज यात्रा के दौरान पुरुष सिले हुए कपड़े नहीं पहन सकते. मीना में हाजी पूरा दिन बिताते हैं, और यहां बाकी की चार नमाजें अदा करते हैं.

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दूसरा दिन

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दूसरे दिन यात्री मीना से लगभग 10 किलोमीटर दूर अराफात की पहाड़ी से पहुंचते हैं. यहां नमाज अदा करते हैं. अराफात की पहाड़ी पर जाना जरूरी है. नहीं तो हज अधूरा माना जाता है. यहां पहुंच जायरीन तिलाबत करते हैं. अराफात की पहाड़ी को जबाल अल-रहम भी कहा जाता है. पैगंबर हजरत मुहम्मद ने अपना आखिरी प्रवचन इसी पहाड़ी पर दिया था. सूरज ढलने के बाद हाजी अराफात की पहाड़ी व मीना के बीच स्थित मुजदलफा जाते हैं. यहां हाजी आधी रात तक रहते हैं. जायरीन यहां से शैतान को मारने के लिए पत्थर जमा करते चलते हैं. जो शैतान को मारने के लिए होते हैं.

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तीसरा दिन

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तीसरे दिन को बकरीद होती है. इस दिन कुर्बानी होती है, लेकिन इससे पहले यात्री मीना जाकर शैतान को तीन बार पत्थर मरते हैं. ये पत्थर जमराहे उकवा, जमराहे वुस्ता व जमराहे उला जगहों पर बने तीन अलग-अलग स्तंभों पर मारे जाते हैं. इन्हीं तीनों जगहों पर हजरत इब्राहीम ने शैतान को तब कंकर मारे थे, जब उसने उन्हें बेटे की कुर्बानी देने जाते समय रोकने की कोशिश की थी. इसीलिए तीनों जगहों पर स्तंभ बनाए गए हैं. और हाजी इन खंभों को शैतान का प्रतीक मान पत्थर बरसाते हैं. इन दिन हाजी केवल सबसे बड़े स्तंभ को ही पत्थर मारते हैं. पत्थर मारने की रस्म अगले दिनों में दो बार और करनी होती है. तीसरे दिन कुर्बानी के बाद हज यात्री अपने बाल पूरी तरह कटवाते हैं, जबकि महिलाएं भी बाल बिलकुल छोटे करा देती हैं. इन रस्मों के बाद मक्का जाकर हज यात्री काबा के सात बार चक्कर लगाते हैं.

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चौथा दिन

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चौथे दिन एक बार फिर पत्थर मारने की रस्म होती है. चौथे दिन पूरे समय यही रस्म होती है. हाजी एक बार फिर मीना पहुंच जमराहे उकवा, जमराहे वुस्ता व जमराहे उला जगहों पर बने स्तंभों को पत्थर मारते हैं. ये स्तंभ शैतान का प्रतीक माने जाते हैं. पत्थर सात-सात बार मारे मारे जाते हैं.

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पांचवा दिन

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अगले यानी पांचवे दिन भी ये रस्म होती है फिर दिन ढलने से पहले जायरीन (हाजी) मक्का के लिए रवाना हो जाते हैं. आखिरी दिन हाजी फिर से तवाफ़ की रस्म निभाते हैं. और इसी के साथ हज यात्रा पूरी हो जाती है. तवाफ़ यानी काबे की सात चक्कर (परिक्रमा) लगाई जाती है. इस रस्म के पूरा होते ही हज यात्रा पूरी मान ली जाती है.

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