Barawafat/Eid Milad Un Nabi 2019: ईद, बकरीद, इन दोनों पर्वों को आमतौर पर मुस्लिमों के अलावा भी लोग जानते हैं. दावतों में शामिल होते हैं, लेकिन इन दोनों अहम पर्वों के अलावा भी एक पर्व ऐसा है, जो मुस्लिमों और इस्लाम के लिए इन दोनों से अहम और ख़ास है. ये त्यौहार बारवफ़ात (Barawafat) है. इसे ईद मीलादुन्नबी (Eid Miladunnabi) भी कहते हैं. मीलादुन्नबी का अर्थ ही ‘ईदों की ईद’ है. यूपी के लखनऊ में शिया और सुन्नी मरकज़ी चाँद कमेटियों ने चाँद देखे जाने का ऐलान कर दिया है. इस बार मीलादुन्नबी 10 नवंबर को मनाया जाएगा.

इसलिए मनाते हैं ये त्यौहार
ईद मीलादुन्नबी इस्लाम के इतिहास का सबसे अहम दिन है. इस्लाम के प्रवर्तक पैगम्बर मोहम्मद साहब का जन्म इसी दिन हुआ था. 30 अक्टूबर को इस्लामिक कलेण्डर के तीसरे माह रबी-उल-अव्वल की पहली तारीख है. और पैगंबर मोहम्मद साहब का जन्म इस तीसरे महीने के 12वें दिन हुआ था. इस तीसरे माह की आज पहली तारीख है, इस हिसाब से 10 नवम्बर को इस्लामिक कलेण्डर के तीसरे माह की 12 तारीख होगी. इस इस्लामी 12 तारीख को ही पैगम्बर का जन्म हुआ था.

पैगम्बर का शुक्रिया करते हैं अदा
इस अवसर पर पैग़म्बर मुहम्मद को याद कर उनका शुक्रिया अदा किया जाता है कि वे तमाम आलम के लिए रहमत बनकर आए थे. ईद-ए-मीलाद यानी ईदों से बड़ी ईद के दिन, तमाम उलेमा और शायर कसीदा-अल-बुरदा शरीफ़ पढ़ते हैं. इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक पैग़म्बर मुहम्मद साहब का जन्म रबीउल अव्वल महीने की 12वीं तारीख को हुआ था. हालांकि पैग़म्बर मुहम्मद का जन्मदिन इस्लाम के इतिहास में सबसे अहम दिन है. फिर भी न तो पैग़म्बर साहब ने और न ही उनकी अगली पीढ़ी ने इस दिन को मनाया. दरअसल, वे सादगी पंसद थे. उन्होंने कभी इस बात पर ज़ोर नहीं दिया कि किसी की पैदाइश पर जश्न जैसा माहौल या फिर किसी के इंतक़ाल का मातम मनाया जाए.

रात भर होती है मजलिस
कुरान के मुताबिक ईद-ए-मिलाद को मौलिद मावलिद के नाम से भी जाना जाता है. जिसका मतलब है पैगंबर के जन्म का दिन. इस त्योहार पर रात भर मजलिसें यानी सभाएं की जाती हैं. इस दौरान पैगंबर साहब की दी गयी शिक्षा को याद किया जाता है. मस्जिदों में नमाज भी अदा की जाती है.

मिलादुन्नबी और बारावफात: ये दो नाम क्यों
जानकार अब्दुल आलम इस दिन को बारावफ़ात कहने के पीछे की वजह भी बताते हैं. मीलादुन्नबी का अर्थ जन्म दिन से है, जबकि बारावफ़ात का अर्थ इंतकाल से है. अब्दुल के अनुसार, दुनिया से रुख़सत से पहले पैगम्बर बारह दिन बीमार रहे थे. 12वें दिन उनकी रुख़सती हुई थी. संयोग से ये दिन वही था जब पैगम्बर का जन्म हुआ था. वह कहते हैं कि मुस्लिम शोक नहीं मनाते क्यों इस्लाम और मुस्लिमों का मानना है कि पैगम्बर आज भी दुनिया में हैं. उनकी रूह मौजूद है. वह बताते हैं कि इसीलिए इस दिन को उनके दुनिया से रुख़सती के दिन की बजाय जन्मदिन का ही ज़िक्र होता है.

इस दिन को मनाने की शुरुआत मिस्र से 11वीं सदी में हुई. फातिमिद वंश के सुल्तानों ने इसे मनाना शुरू किया. पैग़म्बर के रुख़्सत होने के चार सदियों बाद इसे त्योहार की शक्ल दी गई. इस दिन लोग रात भर जागते हैं. मस्जिदों में पैगम्बर द्वारा दी गई शिक्षा और क़ुरआन की शिक्षा का ज़िक्र किया जाता है. मस्जिदों में तक़रीर कर पैगम्बर के रास्ते, उनके आदर्शों पर चलने की सलाह दी जाती है.

मुस्लिम इस दिन पैगम्बर को याद करते हुए जुलूस भी निकालते हैं. शर्बत बांटते हैं. मोमबत्तियां जलाकर रौशनी करते हैं.