नई दिल्ली: आज यानी 25 दिसंबर का दिन हर साल बीबी हरशरण कौर के शहीदी दिवस के रूप में नाया जाता है. वह एक बलिदानी स्त्री थीं जिंहोंने चमकौर के युद्ध में मृत सैनिकों का अंतिम संस्कार किया था. बीबा हरशरण कौर ने भी गुरु गोबिंद सिंह का नेतृत्व किया था. वह आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है. बता दें कि इस युद्ध में सिंहो के अलावा गुरु गोविंद सिंह के दो बेटों को भी शहीदी प्राप्त हुई.

चमकौर का युद्ध 1704 में 21, 22, और 23 दिसम्बर को गुरु गोविंद सिंह और मुगलों की सेना के बीच पंजाब के चमकौर में लड़ा गया था. गुरु गोबिंद सिंह जी 20 दिसम्बर की रात आनंद पुर साहिब छोड़ कर 21 दिसम्बर की शाम को चमकौर पहुंचे थे, और उनके पीछे मुगलों की एक विशाल सेना जिसका नेतृत्व वजीर खां कर रहा था, भी 22 दिसम्बर की सुबह तक चमकौर पहुँच गयी थी. वजीर खां गुरु गोबिंद सिंह को जीवित या मृत पकड़ना चाहता था. चमकौर के इस युद्ध में गुरु गोबिंद सिंह की सेना में केवल उनके दो बड़े साहिबजादे अजीत सिंह एवं जुझार सिंह और 40 अन्य सिंह थे. इन 43 लोगों ने मिलकर ही वजीर खां की आधी से ज्यादा सेना का विनाश कर दिया था.

युद्ध के बाद आस पास के सभी गांवों में दुश्मनों ने झूठी खबर दे दी थी कि गुरु गोबिंद सिंह जी इस युद्ध में मारे गए हैं और मुग़लों और हिन्दू पहाड़ी राजाओं के द्वारा लोगों को भाई सँगत सिंह जी का कटा हुआ सिर दिखाया गया ! साथ में कहा कि मैदान पर शहीद हुए सिंहो का कोई भी अंतिम संस्कार नहीं करेगा! सैनिक गांव गांव जा कर लोगो को डरा रहे थे ताकि कोई किले के पास भी न जा सके ! ऐसे समय में गांव खरूंड की रहने वाली और खुद को श्री गुरु गोविन्द सिंह जी बेटी मानने वाली बीबी हरशरण कौर ने हिम्मत दिखाते हुए अपनी मां से चमकौर के किले में जाकर अपने शहीद हुए सिंहो का अंतिम संस्कार करने की अनुमति मांगी. मां का आशीर्वाद पाकर मात्र 16 साल की छोटी सी उम्र में बीबी हरशरण कौर निकल गई. युद्ध क्षेत्र में पहुंच उन्हें हर ओर खामोशी सुनाई दी. बीबी हरशरण कौर बचते बचाते किसी तरह से चमकौर के किले में प्रवेश कर गयी. अंदर का नज़ारा बेहद खतरनाक था! यहाँ वहां सभी जगहों पर लाशों के ढेर लगे हुए थे. वहां उन्होंने जैसे -तैसे सिख शहीदों के शवों का पता लगाकर उन्हें इकट्ठा किया. जैसे जैसे किसी भी सिंह का मृत शरीर मिलता बीबी हरशरण कौर की आँखों से आंसू की नदी बस बहती जा रही थी! इसके बाद उन्होंने लकड़ियां इकट्ठ करके सभी शहीदों का सामूहिक अंतिम संस्कार किया. आग की लपटें महल की दीवारों से भी ऊंची उठ रही थी. यह देखकर मुगल सैनिक घबरा गए और आग वाली जगह पर भागते हुए पहुंचे. जहां उन्होंने देखा बीबी हरशरण कौर वहीँ पर बैठ कर कीर्तन सोहिले के पाठ का उचारण कर रही थी. सैनिकों ने बीबी हरशरण कौर को पकड़ना चाहा पर उन्होंने सैनिकों पर हमला कर दिया. इस लड़ाी में खई सौनिक मर गए और कई को गंभीर चोटें आई. आखिर में वह भी युद्ध भूमि में शहीद हो गई. सैनिकों ने उन्हें उठाकर जिंदा जलती हुई चिता मं फेंक दिया.