लखनऊ/देहरादून: विश्व प्रसिद्ध बद्रीनाथ धाम के कपाट इस साल 10 मई 2019 को सुबह सवा चार बजे खोल दिए जाएंगे. नरेंद्रनगर में वसंत पंचमी पर राजपुरोहितों ने इसकी घोषणा की. श्रद्धालु 10 मई 2019 से भगवान बदरीनाथ के दर्शन कर पाएंगे. बता दें कि चारों धाम (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम) उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित होने के कारण सर्दियों में भारी बर्फवारी की चपेट में रहते हैं और इसलिए उन्हें श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए बंद कर दिया जाता है.

बद्रीनाथ या बद्रीनारायण मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है, जो कि उत्तराखंड में चमोली जिले के बद्रीनाथ शहर में स्थित है. बद्रीनाथ मंदिर, चारधाम यात्रा का महत्‍वपूर्ण पड़ाव है. मान्‍यता है कि केदारनाथ धाम, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम की यात्रा के बाद अगर आपने बद्रीनाथ धाम की यात्रा नहीं की तो आपकी चारधाम यात्रा अधूरी मानी जाती है. सर्दियों में मंदिर के कपाट बंद होने के बाद दोबारा अप्रैल—मई में श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं. हर साल अप्रैल-मई से अक्टूबर-नवंबर तक चलने वाली चारधाम यात्रा को गढ़वाल हिमालय की आर्थिकी की रीढ़ माना जाता है.

बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास
बद्रीनाथ मंदिर अलकनंदा नदी के बाएं तट पर नर और नारायण नामक दो पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित है. ये पंच-बदरी में से एक बद्री हैं. उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार और पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से और हिन्दू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं. यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बद्रीनाथ को समर्पित है. ऋषिकेश से यह 214 किलोमीटर की दुरी पर उत्तर दिशा में स्थित है. मन्दिर के नाम पर ही इसके इर्द-गिर्द बसे नगर को भी बद्रीनाथ ही कहा जाता है. भौगोलिक दृष्टि से यह स्थान हिमालय पर्वतमाला के ऊँचे शिखरों के मध्य, गढ़वाल क्षेत्र में, समुद्र तल से 3,133 मीटर (10,279 फ़ीट) की ऊँचाई पर स्थित है. बद्रीनाथ मन्दिर में भगवान विष्णु के एक रूप ‘बद्रीनारायण’ की पूजा होती है. यहां उनकी 1 मीटर (3.3 फीट) लंबी शालिग्राम से निर्मित मूर्ति है जिसके बारे में मान्यता है कि इसे आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में समीपस्थ नारद कुण्ड से निकालकर स्थापित किया था. इस मूर्ति को कई हिंदुओं द्वारा विष्णु के आठ स्वयं व्यक्त क्षेत्रों (स्वयं प्रकट हुई प्रतिमाओं) में से एक माना जाता है.

बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना
पौराणिक कथा के अनुसार यह स्थान भगवान शिव भूमि( केदार भूमि ) के रूप में व्यवस्थित था. भगवान विष्णु अपने ध्यानयोग के लिए एक स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा के पास शिवभूमि का स्थान बहुत भा गया. उन्होंने वर्तमान चरणपादुका स्थल पर (नीलकंठ पर्वत के पास) ऋषि गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के पास बालक रूप धारण किया और रोने लगे. उनके रोने की आवाज़ सुनकर माता पार्वती और शिवजी उस बालक के पास आये. और उस बालक से पूछा कि तुम्हे क्या चाहिए. तो बालक ने ध्यानयोग करने के लिए शिवभूमि (केदार भूमि) का स्थान मांग लिया. इस तरह से रूप बदल कर भगवान विष्णु ने शिव पार्वती से शिवभूमि (केदार भूमि) को अपने ध्यानयोग करने हेतु प्राप्त कर लिया. यही पवित्र स्थान आज बद्रीविशाल के नाम से भी जाना जाता है.

कैसे पड़ा बद्रीनाथ मंदिर का नाम
इसके पीछे एक रोचक कथा है, मान्‍यता है कि एक बार देवी लक्ष्मी, भगवान विष्णु से रूठकर मायके चले गयी. तब भगवान विष्णु देवी लक्ष्मी को मनाने के लिए तपस्या करने लगे. जब देवी लक्ष्मी की नाराजगी दूर हुई. तो देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु को ढूंढते हुए उस जगह पहुँच गई. जहाँ भगवान विष्णु तपस्या कर रहे थे. उस समय उस स्थान पर बदरी (बेड) का वन था. बेड के पेड़ में बैठकर भगवान विष्णु ने तपस्या की थी. इसलिए लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु को ‘बद्रीनाथ’ नाम दिया.

बद्रीनाथ के अन्य धार्मिक स्थल
1. अलकनंदा के तट पर स्थित अद्भुत गर्म झरना जिसे ‘तप्त कुंड’ कहा जाता है.
2. एक समतल चबूतरा जिसे ‘ब्रह्म कपाल’ कहा जाता है.
3. पौराणिक कथाओं में उल्लेखित एक ‘सांप’ शिला है.
4. शेषनाग की कथित छाप वाला एक शिलाखंड ‘शेषनेत्र’ है.
5. भगवान विष्णु के पैरों के निशान हैं- ‘चरणपादुका’.
6. बद्रीनाथ से नजर आने वाला बर्फ़ से ढका ऊंचा शिखर नीलकंठ, जो ‘गढ़वाल क्वीन’ के नाम से जाना जाता है.

कैसे जाएं बद्रीनाथ धाम
बद्रीनाथ जाने के लिए तीन ओर से रास्ता है. रानीखेत से, कोटद्वार होकर पौड़ी (गढ़वाल) से ओर हरिद्वार होकर देवप्रयाग से. ये तीनों रास्ते कर्णप्रयाग में मिल जाते है. राष्ट्रीय राजमार्ग 7 बद्रीनाथ से होकर गुजरता है. यह राजमार्ग पंजाब के फाजिल्का नगर से शुरू होकर भटिण्डा और पटियाला से होता हुआ हरियाणा के पंचकुला, हिमाचल प्रदेश के पाओंटा साहिब और उत्तराखण्ड के देहरादून, ऋषिकेश, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, चमोली और जोशीमठ इत्यादि नगरों से होते हुए बद्रीनाथ पहुंचता है, और यहां से आगे बढ़ते हुए भारत-चीन सीमा पर स्थित ग्राम माणा में पहुंचकर समाप्त हो जाता है. केदारनाथ की ओर से भी गौरीकुंड से गुप्तकाशी, चोक्ता (चोटवा), गोपेश्वर और जोशीमठ होते हुए सड़क मार्ग को लगभग 221 किमी की दूरी तय कर बद्रीनाथ मन्दिर तक पहुंचा जा सकता है.