चारधाम यात्रा 2019: उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में स्थित केदारनाथ मन्दिर 12 ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है. यहां की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मन्दिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्‍य ही दर्शन के लिए खुलता है. पत्‍थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था. यहां स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है. आदि शंकराचार्य ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया था.

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कब खुलेंगे केदारनाथ धाम के कपाट
श्री केदारनाथ मंदिर के कपाट इस बार मई प्रथम सप्‍ताह में खोले जाएंगे. धाम के कपाट खोलने की तिथि महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर तय होती है. इस दिन श्रीकेदारनाथ जी के गद्दी स्थल श्री ओम्कारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में श्री केदारनाथ के रावल भीमाशंकर लिंग जी, स्थानीय दस्तूरदार एवं पुजारी/वेदपाठी गणों की उपस्थिति में पंचांग गणना के अनुसार मंदिर के कपाट खोले जाने का मुहूर्त निश्चित किया जाता है.

केदारनाथ मंदिर का इतिहास

12 ज्योतिर्लिंगों में से एक
कहते हैं केदारनाथ धाम की यात्रा से इंसान के सारे दुख दूर हो जाते हैं. भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित भगवान शिव का यह मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग को सर्वोच्च माना जाता है. इस धाम की यात्रा करना हर तीर्थयात्री का सपना होता है. तीन तरफ विशालकाय पहाड़ों से घिरा केदारनाथ धाम बेहद मनमोहक है. हिंदू धर्म की आस्था के अनुसार केदारनाथ धाम को ऊर्जा का बड़ा केंद्र माना जाता है. इस मंदिर का जब 6 महीनों बाद कपाट खुलता है तब भी इस मंदिर का दिया जलता रहता है. भगवान शिव का यह मंदिर 85 फुट ऊंचा, 187 फुट लंबा और 80 फुट चौड़ा है.

कई तरह की कथाएं हैं प्रचलित


केदारनाथ धाम को लेकर कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं. कहतें हैं इसी जगह पर पांडवों ने भी शिव के एक मंदिर का निर्माण करवाया था. लेकिन वक्त के साथ वह नष्ट हो हो गया था. जिसके बाद कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण आदि गुरु शंकराचार्य ने दसवीं ईसवी में करवाया था. यह मंदिर जो 400 वर्ष तक बर्फ में दबा था. यह भी कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा भोज ने भी कराया था. फिलहाल हम उन्ही बातों को बता रहें हैं जिनकी चर्चा सदियों से होती आ रही है.

यह भी मान्यता है


पुराण की कथा के अनुसार हिमालय पर्वत पर भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण ऋषि घनघोर तपस्या किया था. उनकी इस तपस्या से खुश होकर भगवान शिव प्रकट हुए और वरदान के रूप में भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में पृथ्वी पर बस गए. यह भी कहा जाता है कि यहां पशुपतिनाथ का पिछला हिस्सा विराजित है. जब महाभारत का भीषण युद्ध समाप्त हुआ तो उसके बाद पांडवों पर परिवार के लोगों की हत्या का दोष लग गया. इससे मुक्ति पाने के लिए पांडव जब शिव के पास पहुंचे तो उन्होंने बैल का रूप धर लिया. लेकिन भीम ने बैल के पैर पकड़ने की कोशिश की और फिर वो गायब हो गए. यही कारण है कि आज भी पशुपतिनाथ मंदिर में बैल के अगले और केदरनाथ में पिछले हिस्से की पूजा की जाती है.

दर्शन का समय

  • केदारनाथ जी का मन्दिर आम दर्शनार्थियों के लिए प्रात: 6:00 बजे खुलता है.
  • दोपहर तीन से पांच बजे तक विशेष पूजा होती है और उसके बाद विश्राम के लिए मन्दिर बन्द कर दिया जाता है.
  • पुन: शाम 5 बजे जनता के दर्शन हेतु मन्दिर खोला जाता है.
  • पांच मुख वाली भगवान शिव की प्रतिमा का विधिवत श्रृंगार करके 7:30 बजे से 8:30 बजे तक नियमित आरती होती है.
  • रात्रि 8:30 बजे केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मन्दिर बन्द कर दिया जाता है.
  • शीतकाल में केदारघाटी बर्फ़ से ढंक जाती है. यद्यपि केदारनाथ-मन्दिर के खोलने और बन्द करने का मुहूर्त निकाला जाता है, किन्तु यह सामान्यत: नवम्बर माह की 15 तारीख से पूर्व (वृश्चिक संक्रान्ति से दो दिन पूर्व) बन्द हो जाता है और छह माह के बाद कपाट खुलता है.
  • ऐसी स्थिति में केदारनाथ की पंचमुखी प्रतिमा को ‘उखीमठ’ में लाया जाता हैं. इसी प्रतिमा की पूजा यहां भी रावल जी करते हैं.
  • केदारनाथ में जनता शुल्क जमा कराकर रसीद प्राप्त करती है और उसके अनुसार ही वह मन्दिर की पूजा-आरती कराती है अथवा भोग-प्रसाद ग्रहण करती है.