Chhath Puja 2018: उत्तर भारत में धूमधाम से मनाया जाने वाले छठ बिहार का सबसे बड़ा त्योहार है. करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए ये पर्व नई उम्मीदें लेकर आता है. छठ को सिर्फ पर्व ही नहीं बल्‍क‍ि इसे महापर्व कहा जाता है. छठ का पर्व चार दिन मनाया जाता है. कार्त‍िक मास के शुक्‍ल पक्ष कर चतुर्थी को यह पर्व शुरू होकर सप्‍तमी तक मनाया जाता है. चतुर्थी के दिन नहाय खाय का नियम होता है. दूसरे दिन खरना और तीसरे दिन सांध्‍य अर्घ्‍य दिया जाता है तथा चौथे दिन सुबह अर्घ्‍य दिया जाता है.

छठ का पर्व दरअसल, सूर्य पूजन का व्रत है. चार दिनों तक सूर्य की उपासना की जाती है और उनकी कृपा का वरदान मांगा जाता है. छठ का व्रत जीवन में सुख और समृद्ध‍ि के लिए और संतान व पति की लंबी आयु के लिए किया जाता है.

दिवाली के ठीक 6 दिन बाद कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को सूर्य षष्ठी का व्रत करने का विधान है. इस दिन भगवान सूर्य और छठी देवी की पूजा की जाती है. इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे तक व्रत रखते हैं. इस दौरान वे पानी तक नहीं पीते हैं.

Chhath Puja 2018: छठ पर्व में हर दिन का होता है खास महत्व, जानिये महत्‍व

इस बार छठ पूजा नहाय खाय 11 नवंबर से शुरू है. इसके बाद 12 नवंबर को खरना, 13 नवंबर को सांझ का अर्ध्य और 14 नवंबर को सूर्य को सुबह का अर्ध्य के साथ ये त्योहार संपन्न होगा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पर्व को मनाने को लेकर 4 तरह की कहानियां प्रसिद्ध हैं.

छठ पूजा के पीछे ये है कहानी

छठ पर्व कैसे शुरू हुआ इसके पीछे कई सारी कहानियां प्रचलित हैं. पुराण में छठ पूजा के पीछे की कहानी राजा प्रियंवद को लेकर है. बहुत समय पहले की बात है राजा प्रियवंद और रानी मालिनी की कोई संतान नहीं थी. महर्षि कश्यप के निर्देश पर इस दंपति ने यज्ञ किया, जिसके चलते उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई. दुर्भाग्य से यह उनका बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ.

इस घटना से विचलित राजा-रानी प्राण छोड़ने के लिए आतुर होने लगे. उसी समय भगवान की भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं. उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं. उन्होंने बताया कि उनकी पूजा करने से संतान सुख की प्राप्ति होगी. राजा प्रियंवद और रानी मालती ने देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई. कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी और तभी से छठ पूजा होती है.

कर्ण को मिला था भगवान सूर्य से वरदान

एक मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी. कहते हैं कि छठ पूजा की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी. कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और वो रोज घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे. सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने. आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है.

द्रौपदी ने भी किया था यह व्रत

छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है. इस कथा के मुताबिक जब पांडव अपना सारा राजपाठ जुए में हार गए तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था. इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया था. लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है. इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई.

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