पूरे देश में और नेपाल में आज भाई दूज का त्योहार मनाया जा रहा है. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को यह त्योहार मनाया जाता है. वहीं आज के ही दिन चित्रगुप्त की पूजा भी होती है. कलम के आराध्य देव भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विशेष महत्व है. नई बहियों पर ‘श्री’ लिखकर काम शुरू किया जाता है. हर साल कार्तिक शुक्ल द्वितीया को चित्रगुप्त का पूजन लेखनी के रूप में किया जाता है. चित्रगुप्त पूजा के मौके पर भगवान को अपनी आमदनी और खर्चों का ब्योरा दिया जाता है. घर की महिलाएं गोधन कूटती है. इसके बाद महिलाएं भी इस पूजा में शामिल होती हैं. ऐसी मान्यता है कि भगवान चित्रगुप्त पाप पुण्य का लेखा जोखा रखते हैं. भैया दूज के दिन चित्रगुप्त पूजा के साथ लेखनी, दवात और पुस्तकों की पूजा भी की जाती है.

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चित्रगुप्त पूजन का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त
प्रातः 06 बजकर 51 मिनट से 09 बजकर 10 मिनट तक
दोपहर 01 बजे से 2 बजकर 32 मिनट तक.

क्या है पूजन विधि
स्नान करके परिवार पूजा के लिए बैठता है. भगवान चित्रगुप्त की मूर्ति के सामने पूजा की थाल सजाई जाती है. एक थाल में अछत, पुष्प, रोली, हल्दी, चंदन, गुड़, दही, इत्र इत्यादि पूजन सामग्री रखकर एक सादे पन्ने पर भगवान चित्रगुप्त की तस्वीर बनाते हैं. परिवार का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति उस पर ॐ चित्रगुप्ताय नमः फिर राम राम राम राम राम राम लिख कर पूरे पन्ने को भर देता है. इसी को अन्य सदस्य दोहराते हैं. इसके बाद हवन और भगवान चित्रगुप्त की आरती होती है.

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इस पूजा का खास महत्व कायस्थों में माना जाता है क्योंकि कायस्थों की उत्पत्ति चित्रगुप्त से मानी जाती है. इसके लिए उनके लिए यह पूजन काफी विशेष माना जाता है. मान्यता के मुताबिक महाभारत में शर-शैया पर पड़े पितामह भीष्म ने भगवान चित्रगुप्त का विधिवत पूजन किया था जिससे उन्हें मुक्ति मिल सके. इसके लिए यह पूजन बल, बुद्धि, साहस और शौर्य के लिए काफी अहम माना जाता है. वहीं पुराणों और ग्रंथों में इस पूजन के बिना की गई कोई भी पूजा अधूरी मानी गई है.

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माना जाता है कि कोई भी कायस्थ दिवाली से कलम स्पर्श नहीं करता है. चित्रगुप्त भगवान के पूजन के पश्चात ही वह कलम स्पर्श करेगा. श्री चित्रगुप्त के वंश में स्वामी विवेकानंद, महर्षि महेश योगी, राजेन्द्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, फिराक गोरखपुरी, अमिताभ बच्चन और हजारों महान हस्तियां इसी वंश से आती हैं.

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