Dev Uthani Ekadashi पर विष्‍णु भक्‍त व्रत रखते हैं. श्री हरि का पूजन करते हैं. ये एकादशी इसलिए भी खास है क्‍योंकि इस दिन से विवाह आदि मंगल कार्यों की शुरुआत हो जाती है.

माना गया है कि इस दिन भगवान विष्णु चार मास बाद जागते हैं. आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी को भगवान श्री हरि विष्णु 4 मास के लिए क्षीरसागर में शयन के लिए चले जाते हैं. इस बार 8 नवंबर, शुक्रवार को है.

व्रत कथा
एक समय की बात है. एक राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखा करते थे. यहां तक कि राज्य के पशु भी इस दिन अन्न ग्रहण नहीं करते थे. तभी उस राज्य में एक दूसरे राज्य से एक व्यक्ति आया. उसने कहा हे राजन! मुझे काम की आवश्यकता है. यदि मुझे आप नौकरी पर रख लें तो आपका बहुत आभार होगा.

राजा ने कहा ठीक, मैं तुम्हें नौकरी जरूर दूंगा, लेकिन एक शर्त माननी होगी. शर्त यह है कि इस राज्य में एकादशी व्रत करने की अनिवार्यता है, जिसका तुम्हें भी पालन करना होगा. इस दिन तुम अन्न ग्रहण नहीं कर सकते. व्यक्ति ने कहा कि मुझे आपकी शर्त मंजूर है.

कुछ दिनों बाद एकादशी आई और राज्य के सभी लोगों के साथ उस व्यक्ति ने भी एकादशी का व्रत किया. लेकिन जैसे-जैसे दिन गुजरता गया, उस व्यक्ति की भूख तेज होती चली गई. वह राजा के पास पहुंचा और राजा से कहने लगा कि हे राजन सिर्फ फल से मेरा पेट नहीं भर रहा है और मैं अन्न खाना चाहता हूं, अन्यथा मैं मर जाऊंगा.

यह सुनकर राजा ने उसे अन्न दे दिया. वह नित्य की तरह नदी पर पहुंचा और स्नान कर भोजन पकाने लगा. जब भोजन बन गया तो वह भगवान को बुलाने लगा- आओ भगवान! भोजन तैयार है.

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बुलाने पर पीताम्बर धारण किए भगवान चतुर्भुज रूप में आ पहुंचे तथा प्रेम से उसके साथ भोजन करने लगे. भोजनादि करके भगवान अंतर्धान हो गए तथा वह अपने काम पर चला गया.

अगली एकादशी को वह राजा से कहने लगा कि महाराज, मुझे दुगुना सामान दीजिए. उस दिन तो मैं भूखा ही रह गया. राजा ने कारण पूछा तो उसने बताया कि हमारे साथ भगवान भी खाते हैं. इसीलिए हम दोनों के लिए ये सामान पूरा नहीं होता.

यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ. वह बोला- मैं नहीं मान सकता कि भगवान तुम्हारे साथ खाते हैं. मैं तो इतना व्रत रखता हूं, पूजा करता हूं, पर भगवान ने मुझे कभी दर्शन नहीं दिए और तुम्हें दे दिए. ऐसा कैसे संभव है.

राजा की बात सुनकर वह बोला- महाराज! यदि विश्वास न हो तो साथ चलकर देख लें. राजा एक पेड़ के पीछे छिपकर बैठ गया. उस व्यक्ति ने भोजन बनाया तथा भगवान को शाम तक पुकारता रहा, परंतु भगवान नहीं आए. अंत में उसने कहा- हे भगवान! यदि आप नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर प्राण त्याग दूंगा.

लेकिन भगवान नहीं आए, तब वह प्राण त्यागने के उद्देश्य से नदी की तरफ बढ़ा. प्राण त्यागने का उसका दृढ़ इरादा जान शीघ्र ही भगवान ने प्रकट होकर उसे रोक लिया और साथ बैठकर भोजन करने लगे. खा-पीकर वे उसे अपने विमान में बिठाकर अपने धाम ले गए.

यह देख राजा ने सोचा कि व्रत-उपवास से तब तक कोई फायदा नहीं होता, जब तक मन शुद्ध न हो. इसलिए व्रत के साथ यह भी जरूरी है कि अपना मन शुद्ध रखा जाए. वह भी मन से व्रत-उपवास करने लगे और अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुए.

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