Diwali 2019 पर हर साल लोग खील-बताशे का प्रसाद मां लक्ष्‍मी को चढ़ाते हैं. किसी भी तरह के भोग में इन्‍हें सम्मिलित करना आवश्‍यक माना गया है.

धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज तक चलने वाले दिवाली के पांच दिन के त्‍योहार में दिवाली का दिन सबसे विशेष माना गया है. इस दिन भगवान गणेश और देवी लक्ष्‍मी की पूजा की जाती है.

हर साल दिवाली के दिन लोग घर सुख-समृद्धि और खुशहाली के लिए हर तरह के प्रयास करते हैं. इसमें पूजा की विशेष विधियों के अलावा प्रसाद और लक्ष्‍मी देवी के पूजन की महत्‍वता है.

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दिवाली के दिन लक्ष्मी पूजन करने का महत्‍व इसलिए है क्‍योंकि ये माना गया है कि इस दिन देवी लक्ष्‍मी धरती पर आती हैं. उनके स्वागत के लिए लोग घरों की साफ-सफाई करते हैं, उसे सजाते हैं. मां का पूजन करते हैं और उनका पसंदीदा भोग उन्‍हें अर्पण करते हैं.

खील-बताशे का महत्‍व
मां लक्ष्‍मी को खील-बताशे प्रिय हैं. दरअसल, खील धान से बनती है, जो चावल का ही एक रूप है. दिवाली आने से कुछ समय पहले ही ये फसल तैयार होती है. पुराने समय में मां लक्ष्मी को सबसे पहले इस फसल का भोग लगाया जाता था. तब से ये परंपरा चली आ रही है.

इसके अलावा एक मान्‍यता ये भी है कि खील-बताशे का रंग सफेद होता है. और मां लक्ष्‍मी को सफेद रंग की चीजें पसंद हैं. चूंकि दिवाली को धन-वैभव का त्‍योहार माना जाता है, हिंदू धर्म में धन-वैभव का देवता शुक्र माना गया है. ज्‍योतिष में सफेद और मीठी चीजों को शुक्र का प्रतीक माना गया है.

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