Ashtami 2018: महागौरी मां दुर्गा का 8वां रूप हैं. अष्टमी के दिन महागौरी की पूजा की जाती है. भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए महागौरी ने कठोर तपस्या की थी. महागौरी की ये तपस्या इतनी कठोर थी कि देवी मां के शरीर का रंग काला पड़ गया था. इस तप के बाद भगवान शिव ने प्रसन्न होकर मां को स्वीकार किया और उन्हें गौर वर्ण प्रदान किया. इसी के बाद से मां का नाम महागौरी हो गया.

माता महागौरी का स्वभाव बहुत ही शांत है, इनका गौर वर्ण है और इनकी चार भुजाएं हैं. एक हाथ अभयमुद्रा में है, एक हाथ में त्रिशूल है. एक हाथ में डमरू और एक हाथ में वरमुद्रा में है. जो महिलाएं मां महागौरी का पूजन करती हैं उन्हें विशेष वरदान मां देती हैं.

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महागौरी की पूजा
महागौरी का पूजन करने से अनेक चमत्कारिक परिणाम होते हैं. जो लोग मां महागौरी का पूजन करते हैं उनके असंभव से लगने वाले कार्य भी सफल होने लगते हैं. विवाहित महिलाएं अगर मां गौरी को चुनरी अर्पित करती हैं तो उनके सुहाग की रक्षा होती है. मां बिगड़े हुए कार्यों को बना देती हैं और उनकी उपासना से फल जल्दी प्राप्त होता है. मां गौरी का पूजन करने से तकलीफ दूर होती है, अक्षय, सुख और समृधि प्राप्त होती है.

मां गौरी के सामने घी का दीपक जलाएं और उनके स्वरूप का ध्यान करें. माता को रोली, अक्षय पुष्प अर्पित करें. मां की आरती का गुणगान करें और कम से कम 8 कन्याओं को भोजन करवाएं. इस सब से मां महागौरी प्रसन्न होंगी. जो महिलाएं शादी-शुदा हैं, उनके लिए ये दिन बहुत शुभ माना जाता है. इस दिन उन्हें विशेष रूप से मां का पूजन करना चाहिए.

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अष्टमी के व्रत की विधि
दुर्गा अष्टमी के दिन कई लोग अपना व्रत पूर्ण करते हैं और अंत में छोटी कन्याओं का पूजन किया जाता है और उन्हें घर बुलाकर उन्हें भोजन करवाकर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार छोटी कन्याओं को देवी का रूप माना गया है. कन्याओं के पूजन के बाद ही नौ दिन के बाद व्रत खोला जाता है. व्रत को पूर्ण करने और मां दुर्गा का आशीर्वाद लेने के लिए कन्याओं का अष्टमी और नवमी के दिन पूजन करना आवश्यक होता है.

इस बार शारदीय नवरात्रि की अष्टमी 17 अक्टूबर 2018 बुधवार को है. इस दिन सात दिन उपवास करने वाले अपना व्रत खोलते हैं और कन्याओं का पूजन करते हैं.

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मासिक दुर्गा अष्टमी के दिन विशेष रूप से मां दुर्गा के महागौरी रूप का पूजन किया जाता है. इस दिन महागौरी के रूप की तुलना शंख, चन्द्रमा या चमेली के सफेद रंग से की जाती है. इस रूप में महागौरी एक 8 वर्ष की युवा बच्चे की तरह मासूम दिखती है इस दिन वो विशेष शांति और दया बरसाती है.

इस रूप में उनके चार हाथ में से दो हाथ आशीर्वाद और वरदान देने की मुद्रा में होते हैं तथा अन्य दो हाथ में त्रिशूल और डमरू रहता है साथ ही इस दिन देवी को सफेद या हरे रंग की साड़ी में एक बैल के ऊपर विराजित या सवार होते दिखाया गया है.

दुर्गा अष्टमी के दिन देवी दुर्गा के हथियारों की पूजा की जाती है और हथियारों के प्रदर्शन के कारण इस दिन को लोकप्रिय रूप से विराष्ट्मी के रूप में भी जाना जाता है. दुर्गा अष्टमी के दिन भक्त सुबह जल्दी से स्नान करके देवी दुर्गा से प्रार्थना करते है और पूजन के लिए लाल फूल, लाल चन्दन, दीया, धूप इत्यादि इन सामग्रियों से पूजा करते है, और देवी को अर्पण करने के लिए विशेष रूप से नैवेध को तैयार किया जाता है.

साथ ही देवी के पसंद का गुलाबी फुल, केला, नारियल, पान के पत्ते, लोंग, इलायची, सूखे मेवे इत्यादी को प्रसाद के रूप में अर्पित किया जाता है और पंचामृत भी बनाया जाता है. यह पंचामृत दही, दूध, शहद, गाय के घी और चीनी इन पांचो सामग्रियों को मिलाकर बनाया जाता है, और एक वेदी बनाकर उसपर अखंड ज्योति जलाई जाती है, और हाथों में फूल, अक्षत को लेकर इस मंत्र का जाप किया जाता है जो कि निम्नलिखित है-

“सर्व मंगलाय मांगल्ये, शिवे सर्वथा साधिके
सरन्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते”

इसके बाद आप उस फूल और अक्षत को माँ दुर्गा को समर्पित कर दें, फिर बाद में आप दुर्गा चालीसा का पाठ कर आरती करके पूजा करे.

अष्टमी का महत्व
नवरात्रों में रखे जाने वाले व्रत के अनेक फायदे होते हैं इससे शरीर संतुलित रहता है. जब मौसम बदलता है तब शरीर को संतुलित रखना आवश्यक होता है. इससे बीमारियां नहीं लगती हैं. नौ दिन के उपवास के बाद शरीर में संयम, साधना की शक्ति आ जाती है जिससे शरीर मजबूत हो जाता है. नवरात्रों में उपवास करने से मां दुर्गा प्रसन्न होकर वरदान देती हैं. दशहरे से पहले नवमी को हर कोई अपने घर में कन्या पूजन करता है, बिना कन्या पूजन के नवरात्र का व्रत अधूरा माना जाता है.

आराधना मंत्र
या देवी सर्वभूतेषु मां गौरी रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमस्तस्यै मनो नम:.

कन्या पूजन का फल
अष्टमी के दिन कन्याओं को भोजन करवाया जाता है. मान्यता है कि इस दिन 10 साल के कम उम्र की कन्याओं के पूजन और उन्हें भोजन कराने से शुभ फल मिलता है. ये कन्याएं मां दुर्गा का प्रतिनिधि मानी जाती हैं. आमतौर पर कन्याभोज में नौ कन्याओं को भोजन कराया जाता है लेकिन 5, 7 और 11 की संख्या भी शुभ मानी जाती है. घर बुलाकर पहले उनके पैर पूजे जाते हैं, फिर उन्हें भोजन कराकर पसंदीदा तोहफे दिए जाते हैं और उनसे आशीर्वाद लिया जाता है.

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