नई दिल्ली. पितरों के श्राद्ध-पक्ष का समापन और दुर्गा पूजा के आने से एक दिन पहले आकाशवाणी (All India Radio) पर अलसुबह 4 बजे आपने एक आवाज सुनी होगी. महिषासुर-मर्दनी की स्तुति में किया जाने वाला यह पाठ महालया के अवसर पर होता है. रेडियो सुनने वाली पीढ़ी इस आवाज को खूब अच्छी तरह पहचानती है. हमें और आपको भी यह आवाज पहचाननी चाहिए. यह सुमधुर आवाज है वीरेंद्र कृष्ण भद्र (Veerendra Krishna Bhadra) की. पिछले करीबन 86 वर्षों से यह आवाज हर महालया (Mahalaya) को गूंजती है. वहीं, करीब 50 वर्षों से आकाशवाणी के जरिए इसे देश के कोने-कोने में सुना जा रहा है. पश्चिम बंगाल में तो वीरेंद्र कृष्ण भद्र की महिषासुर-मर्दनी का पाठ सुने बिना दुर्गा पूजा की शुरुआत होना संभव ही नहीं है. लोग महालया के दिन सुबह 4 बजे ही उठ जाते हैं और अपने-अपने रेडियो सेट खोलकर बैठ जाते हैं. वीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज में रिकॉर्ड किया गया 90 मिनट का यह रेडियो-ड्रामा, मां दुर्गा की आराधना का सबसे विलक्षण पाठ माना जाता है. मंगलवार की सुबह 4 बजे एक बार फिर यह आवाज रेडियो से गूंजने वाली है. इस बार आप भी महिषासुर-मर्दनी का यह पाठ सुनना न भूलें. Also Read - बंगाल: 'महालया' के अवसर पर लाखों लोगों ने किया ‘तर्पण’, अधिमास के चलते एक महीने बाद होगी दुर्गा पूजा

Also Read - Durga Puja 2020 Date: इस दिन से शुरू हो रही है दुर्गा पूजा, यहां जानें डेट्स

Also Read - Mahalaya 2020 : महालया अमावस्या आज मां दुर्गा की होगी पूजा, 17 अक्टूबर से शुरू होगी नवरात्रि

1931 में पहली बार अस्तित्व में आया यह नाटक

बंगाल में काली कृष्ण भद्र के परिवार में जन्म लेने वाले वीरेंद्र कृष्ण भद्र को बचपन से ही संगीत और नाटकों से लगाव था. खासकर धार्मिक कथानकों का नाटकीय रूपांतरण करने में उन्हें महारथ हासिल थी. बंगाल और वहां के लोगों की उत्सवधर्मिता विख्यात है. साथ ही वहां होने वाले उत्सवों में संगीत और नाटकों के प्रचलन की परंपरा सदियों पुरानी है. ऐसे ही माहौल में पले-बढ़े वीरेंद्र कृष्ण भद्र ने वर्ष 1931 में मां दुर्गा की आराधना के अवसर पर एक म्यूजिकल-ड्रामा रिकॉर्ड किया. प्रख्यात संगीतकार पंकज मल्लिक के निर्देशन में रिकॉर्ड किया गया यह ड्रामा देखते ही देखते मशहूर हो गया. इसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि दुर्गा पूजा के मौके पर हर ऑल इंडिया रेडियो से इसका लाइव-प्रसारण होने लगा. वीरेंद्र कृष्ण भद्र और उनकी टीम की प्रस्तुति को सुनते हुए आपको ऐसा अनुभव होगा कि आप भक्ति के सागर में गोते लगा रहे हों. मां दुर्गा की कथा, स्तुति और श्लोकों से सजा यह कार्यक्रम बांग्ला और संस्कृत भाषा में है. कोरस में आती आवाजें, दुर्गा सप्तशती के श्लोकों का गान और बीच-बीच में रोमांचित कर देने वाली वीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज, महालया का सुंदर पाठ आपको मां दुर्गा की भक्ति से भर देगा.

Sharadiya Navratri 2018: कलश स्‍थापना विधि और शुभ मुहूर्त

Sharadiya Navratri 2018: कलश स्‍थापना विधि और शुभ मुहूर्त

1966 से रिकॉर्डिंग का किया जा रहा प्रसारण

तकरीबन 3 दशकों तक आकाशवाणी से हर दुर्गा पूजा के मौके पर लाइव प्रसारित किया जाने वाला महिषासुर-मर्दनी कार्यक्रम को वर्ष 1966 में रिकॉर्ड करने की योजना बनी. इसी साल औपचारिक तौर पर वीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज को इस म्यूजिकल ड्रामे के रूप में सदियों तक सुरक्षित रखे जाने के लिए रिकॉर्ड कर लिया गया. तब से हर साल महालया के दिन प्रसारित किया जाने वाला यह रिकॉर्डेड कार्यक्रम, अब दुर्गा पूजा के औपचारिक शुरुआत की पहचान बन चुका है. वीरेंद्र कृष्ण भद्र की मृत्यु के बाद कई अन्य कलाकारों ने भी महिषासुर-मर्दनी का पाठ करने की कोशिश की, लेकिन न तो सफल हुए और न ही उन्हें लोगों की सराहना मिली. उल्टा, भद्र की आवाज की नकल करने को लेकर तीखी आलोचना की गई. बंगाली सिनेमा के मशहूर कलाकार उत्तम कुमार ने भी 70 के दशक में महिषासुर-मर्दनी का पाठ अपनी आवाज में रिकॉर्ड कराया था, लेकिन उनका पाठ किसी को पसंद नहीं आया. और तो और इसके लिए उत्तम कुमार को बंगालियों के बीच ही आलोचना का सामना करना पड़ा.

Mahishasur-Mardani

महालया के अवसर पर ही क्यों होता है पाठ

हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार, दुर्गा पूजा से पहले के 15 दिनों में पितृपक्ष यानी पितरों के श्राद्ध का पखवाड़ा होता है. भाद्रपद यानी भादो मास की अमावस्या का पूरा 15 दिन पितरों के श्राद्ध के रूप में समर्पित होता है. अमावस्या की समाप्ति और दुर्गा पूजा के शुरू होने से पहले महालया होता है. संस्कृत में महालया शब्द का आशय उत्सवों की शुरुआत है. संस्कतृ के ‘मह’ शब्द का अर्थ उत्सव होता है और ‘आलय’ का तात्पर्य ‘घर’ है. यानी महालया को उत्सवों की शुरुआत के तौर पर भी मान्यता प्राप्त है. धर्मशास्त्र के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान लोगों को अपने पितरों का श्राद्ध करना पड़ता है. ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान सभी पितर पिंडदान लेने के लिए धरती पर आते हैं. इस दौरान अगर उनके वंशज उन्हें पिंडदान नहीं देते तो वे नाराज हो जाते हैं. पितृपक्ष की समाप्ति और महालया की शुरुआत के बाद आमतौर पर माना जाता है कि पितर धरती से वापस चले गए. लेकिन शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख है कि कार्तिक कृष्णपक्ष अमावस्या के दिन भी पितरों को पिंडदान किया जा सकता है. कार्तिक कृष्णपक्ष की अमावस्या के दिन ही दीपावली मनाई जाती है. अगर इस आखिरी दिन भी कोई वंशज अपने पितर को पिंडदान नहीं देता है, तो उसे पितरों की नाराजगी का सामना करना पड़ता है. यही वजह है कि महालया के दिन को उत्सवों की शुरुआत मानते हुए पवित्र माना जाता है.

दुर्गा पूजा से जुड़ी खबरों के लिए पढ़ते रहें India.com