नई दिल्ली:   इस साल ईद-ए-मिलाद का पर्व 29 और 30 अक्टूबर को मनाया जा रहा है. इसे मीलाद उन नबी भी कहा जाता है. मिलाद उन नबी इस्लाम धर्म के मानने वालों के कई वर्गों में एक प्रमुख त्यौहार है. इस शब्द का मूल मौलिद है जिसका अर्थ अरबी में “जन्म” है. अरबी भाषा में ‘मौलिद-उन-नबी’ का मतलब है हज़रत मुहम्मद का जन्म दिन है. मिलाद उन नबी संसार का सबसे बड़ा जशन माना जाता है. इस दिन ईद मिलाद उन नबी की दावत का आयोजन किया जाता है. इसके साथ ही मोहम्मद साहब की याद में जुलूस भी निकाले जाते हैं. हालांकि इस साल कोरोना महामारी के कारण बड़े जुलूस या समारोह के आयोजन की संभावना कम है. Also Read - Video: ईद ए मिलादुन्नबी के जुलूस में उड़ीं कोरोना गाइड लाइंस की धज्जियां, 10 की जगह पहुंचे सैकड़ों लोग

ईद-ए-मिलाद का महत्व- Also Read - नेशनल कॉन्फ्रेंस का दावा- फारूक अब्दुल्ला को नमाज पढ़ने के लिए घर से बाहर जाने से रोका गया

ईद-ए-मिलाद को मुस्लिम समुदाय के लोग पैगंबर मोहम्मद की पुण्यतिथि के रुप में मनाते हैं. इस त्योहार को मिस्र में आधिकारिक उत्सव के तौर पर मनाया जाता था. हालांकि, बाद में 11वीं शताब्दी में यह लोकप्रिय हो गया. इस त्योहार को बाद से सुन्नी समुदाय के लोग भी ईद-ए-मिलाद का उत्सव मनाने लगे. Also Read - Eid-e-Milad: राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने देशवासियों को दी ईद- ए-मिलाद की शुभकामनाएं

ईद-ए-मिलाद का इतिहास

इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक, मोहम्मद साहब का जन्म सन् 570 में सऊदी अरब में हुआ था. इस्लाम के ज्यादातर विद्वानों का मत है कि मोहम्मद का जन्म इस्लामी पंचांग के तीसरे महीने के 12वें दिन हुआ है. अपने जीवनकाल के दौरान, मुहम्मद साहब ने इस्लाम धर्म की स्थापना की, जो अल्लाह की इबादत के लिए समर्पित था. सन् 632 में पैगंबर मोहम्मद साहब की मृत्यु के बाद, कई मुसलमानों ने विविध अनौपचारिक उत्सवों के साथ उनके जीवन और उनकी शिक्षाओं का जश्न मनाना शुरू कर दिया.