Ganga Dussehra 2018: हिन्दू समाज में गंगा दशहरा पर्व का खास महत्व है. यह हर साल ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाई जाती है. इस साल गंगा दशहरा, मलमास जिसे कई लोग अधिकमास भी कहते हैं, महीने में आया है. ऐसी मान्यता है कि राजा भागीरथ के कठिन तप के बाद ही धरती पर मां गंगा का अवतरण हुआ था. आज के दिन गंगा स्नान करने से सभी पाप मां गंगा हर लेती हैं.

गंगा स्नान शुभ मुहूर्त

ऋषि स्नान : प्रात: काल 4:15 से सुबह 5:25 बजे
सामान्य स्नान : सुबह से शाम तक

गंगा दशहरा का महत्व: 

ज्योतिष गुरुओं के अनुसार गंगा इतनी पवित्र नदी है कि आज कि दिन इसमें स्नान मात्र करने से 10 तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं. दस पापों को हरने के कारण ही इसे गंगा दशहरा कहा जाता है. इसमें 3 कायिक पाप होते हैं, 4 वाचिक और 3 मानसिक पाप होते हैं. कायिक पाप का अर्थ होता है काया यानी हमारे शरीर से जुड़े पाप. वाचिक यानी वाणी संबंधी पाप और मानसिक पाप यानी जो आप अपनी सोच और मानसिकता से करते हैं.

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ऐसी मान्यता है कि आज के दिन गंगा स्नान और गंगा पूजन करने वाले व्यक्ति के ना केवल पाप नष्ट होते हैं, बल्कि उसकी मन की मुराद भी पूरी हो जाती है. जिन लोगों को संतान नहीं है, उन्हें संतान सुख प्राप्त होता है.

क्यों मनाया जाता है गंगा दशहरा का पर्व:

हिन्दू पुराणों में ऐसा उल्लेख है कि भागीरथ को अपने पूर्वजों की अस्थियां किसी निर्मल जल में विसर्जित करनी थी. इसलिए उन्होंने भगवान शंकर की घोर तपस्या की और मां गंगा को धरती पर लाने में कामयाब हुए. लेकिन मां गंगा का भाव इतना तेज था कि यदि वह धरती पर सीधे उतर जातीं तो समस्त धरती वासी उनके जल में समाहित हो जाते. इसलिए मां गंगा ने भागीरथ को कहा कि यदि भगवान शिव मुझे अपनी जटाओं में समा कर पृथ्वी पर मेरी धारा प्रवाह कर दें तो यह संभव हो सकता है.

भागीरथ ने भगवान शंकर की तपस्या की. भगवान शंकर के प्रसन्न होने पर भागीरथ ने उनसे सारी बात बताई और भगवान शिव से गंगा को अपनी जटाओं में समाहित करने के लिए प्रार्थना की. इसके बाद मांं गंगा ब्रह्मा जी के कमंडल में समा गई और फिर ब्रह्मा जी ने शिव जी की जटाओं में गंगा को प्रवाहित कर दिया, जिसके बाद शिव ने गंगा की एक चोटी सी धारा पृथ्वी की ओर प्रवाहित कर दी. भागीरथ के कठिन तप के कारण मां गंगा का धरती पर अवतरण हुआ इसलिए उन्हें भागीरथी के नाम से भी जाना जाता है. जिस दिन मां गंगा धरती पर उतरीं वह ज्येष्ठ शुक्ल दशमी थी. इसलिए हर साल इस तिथि को गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाता है.

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गंगा दशहरा व्रत कथा, यहां पढ़ें:

एक बार महाराज सगर ने व्यापक यज्ञ किया. उस यज्ञ की रक्षा का भार उनके पौत्र अंशुमान ने संभाला. इंद्र ने सगर के यज्ञीय अश्व का अपहरण कर लिया. यह यज्ञ के लिए विघ्न था. परिणाम स्‍वरूप अंशुमान ने सगर की साठ हजार प्रजा लेकर अश्व को खोजना शुरू कर दिया. सारा भूमंडल खोज लिया पर अश्व नहीं मिला.

फिर अश्व को पाताल लोक में खोजने के लिए पृथ्वी को खोदा गया. खुदाई पर उन्होंने देखा कि साक्षात्‌ भगवान ‘महर्षि कपिल’ के रूप में तपस्या कर रहे हैं. उन्हीं के पास महाराज सगर का अश्व घास चर रहा है. प्रजा उन्हें देखकर ‘चोर-चोर’ चिल्लाने लगी और इस तरह महर्षि कपिल की समाधि टूट गई. महर्षि ने अपने आग्नेय नेत्र खोले और सारी प्रजा भस्म हो गई. इन मृत लोगों के उद्धार के लिए ही महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने कठोर तप किया था.

भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनसे वर मांगने को कहा तो भगीरथ ने ‘गंगा’ की मांग की. इस पर ब्रह्मा ने कहा- ‘राजन! तुम गंगा का पृथ्वी पर अवतरण तो चाहते हो? परंतु क्या तुमने पृथ्वी से पूछा है कि वह गंगा के भार तथा वेग को संभाल पाएगी? मेरा विचार है कि गंगा के वेग को संभालने की शक्ति केवल भगवान शंकर में है. इसलिए उचित यह होगा कि गंगा का भार एवं वेग संभालने के लिए भगवान शिव का अनुग्रह प्राप्त कर लिया जाए.’

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महाराज भगीरथ ने वैसे ही किया. उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने गंगा की धारा को अपने कमंडल से छोड़ा. तब भगवान शिव ने गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेटकर जटाएं बांध लीं. इसका परिणाम यह हुआ कि गंगा को जटाओं से बाहर निकलने का पथ नहीं मिल सका. महाराज भगीरथ ने भगवान शिव की आराधना में घोर तप शुरू किया. तब कहीं भगवान शिव ने गंगा की धारा को मुक्त करने का वरदान दिया. इस प्रकार शिवजी की जटाओं से छूट कर गंगाजी हिमालय की घाटियों में कल-कल निनाद करके मैदान की ओर मुड़ी.

इस प्रकार भगीरथ पृथ्वी पर गंगा का वरण करके बड़े भाग्यशाली हुए. उन्होंने जनमानस को अपने पुण्य से उपकृत कर दिया. युगों-युगों तक बहने वाली गंगा की धारा महाराज भगीरथ की कष्टमयी साधना की गाथा कहती है. गंगा प्राणीमात्र को जीवनदान ही नहीं देती, मुक्ति भी देती है. इसी कारण भारत तथा विदेशों तक में गंगा की महिमा गाई जाती है.