
Renu Yadav
रेनू यादव, India.Com हिंदी में असिस्टेंट न्यूज एडिटर के पद कार्यरत हैं. हिंदी पत्रकारिता में करीब 15 वर्षों के अनुभव के दौरान उन्हें टेक्नोलॉजी, धर्म, लाइफस्टाइल, हेल्थ व अन्य विषयों ... और पढ़ें
Govardhan Puja Katha: गोवर्धन पूजा को अन्नकूट भी कहा जाता है और हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष्ज्ञ महत्व माना गया है. पंचांग के अनुसार आज यानि 14 नवंबर को गोवर्धन का पर्व मनाया जाएगा. ब्रज क्षेत्र का यह पावन पर्व केवल ब्रज में ही नहीं, बल्कि देश के हर कोने में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है. इस दिन घर के आंगन में गाय के गोबर से भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है. आमतौर पर कोई पूजा-पाठ मंदिर में चौकी लगाकर किया जाता है लेकिन गोवर्धन पूजा की विधि काफी अलग होती है. आइए जानते हैं कैसे की जाती है गोवर्धन पूजा और इससे जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में.
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि सभी ब्रजवासी देवराज इंद्र की पूजा कर रहे थे. ऐसे में उन्होंने अपनी मां यशोदा से पूछा कि आखिर सभी लोग इंद्र की पूजा क्यों करते हैं? इस सवाल के जवाब में उनकी मां ने बताया कि देवराज इंद्र वर्षा करते हैं और इससे अन्न की पैदावार अच्छी होती है. साथ ही हमारी गायों को चारा भी खाने के लिए मिलता है. तब श्रीकृष्ण ने कहा कि फिर तो हम सभी को गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गायें तो वहीं पर चरती हैं.
ब्रजवासियों को श्रीकृष्ण की यह बात अच्छी लगी और उनके कहने पर इंद्र की बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे. जिसे देखकर देवराज इंद्र काफी नाराज हुए और इसे अपना अपमान समझकर मूसलाधार वर्षा करने लगे. यह देखकर सभी ब्रजवासी परेशान हो गए तब भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया. जिसके नीचे सभी ब्रजवासी और पशु भी आ गए. इसके बाद इंद्र को पता चला कि श्रीकृष्ण कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि भगवान विष्णु का ही अवतार हैं और फिर उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ. इंद्र ने श्रीकृष्ण से माफी मांगी और काफी याचना करने पर श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत नीचे रखा. तभी से हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन गोवर्धन पूजा यानि अन्नकूट का पर्व मनाया जाता है.
गोवर्धन पूजा के दिन घर के आंगन में गोबर से भगवान कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है. इस आकृति में आंख, नाक व नाभि भी बनाई जाती है. इसके चारों ओर ग्वाले, गाय व भैंस की आकृति बनाने का भी चलने है. यह प्रतिमा गोवर्धन पर्वत व ग्वालों की प्रतीक होती है. शुभ मुहूर्त के समय इस प्रतिमा का पूजन किया जाता है. पूजन के लिए रोली, चावल, खील, बताशे, जल, कच्चा दूध, पान, केसर, फूल और दीपक थाली में अवश्य रखें जाते हैं. इसके बाद घर के पुरुष गोवर्धन महाराज को रोली, चंदन व हल्दी का तिलक करते हैं और उन्हें केसर, पान, फूल अर्पित करते हैं. फिर घी का दीपक जलाते हैं.
इसके बाद हाथ में खील लेकर गोवर्धन महाराज की प्रतिमा की 7 बार परिक्रमा करते हैं और परिक्रमा करते समय थोड़ी-थोड़ी खील अर्पित करते रहते हैं. परिक्रमा पूरी होने के बाद जल अर्पित किया जाता है. बता दें कि गोवर्धन भगवान की प्रतिमा में नाभि बनाई जाती है और उस नाभि में कच्चा दूध डाला है. इस दूध को प्रसाद के तौर पर हर कोई ग्रहण करता है. पुरुषों की परिक्रमा पूरी होने के बाद महिलाएं भी उसी विधान से परिक्रमा करती हैं और जल अर्पित करती हैं. इसके बाद मंगलगान या भजन गाए जाते हैं. इस दिन पूजा में मीठे पुए बनाए जाते हैं और उनका भोग लगाया जाता है.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. India.Com इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें.
ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर पर फॉलो करें. India.Com पर विस्तार से पढ़ें Astrology की और अन्य ताजा-तरीन खबरें
By clicking “Accept All Cookies”, you agree to the storing of cookies on your device to enhance site navigation, analyze site usage, and assist in our marketing efforts Cookies Policy.