गुरु नानक गुरुपर्व या गुरु नानक जयंती भारत के साथ ही दुनिया के अन्य हिस्सों में 23 नवंबर यानी शुक्रवार को मनाया जाएगा. सिखों के पहले गुरु नानक जी की जयंती को गुरु पर्व या गुरु नानक जयंती के रूप में मनाया जाता है. 15 अप्रैल 1469 को तलवंडी नामक स्थान पर जन्में गुरु नानक का जन्मदिन हिंदू पंचांग के हिसाब से कार्तिक महीने की पूर्णिमा के दिन पड़ता है. इस साल गुरुनानक की 549वीं जयंती है. हिन्दू पंचांग के अनुसार गुरु नानक जयंती की तिथि बदलती रहती है. पूर्णामा तिथि इस साल 22 नवंबर को 12.53 पीएम से शुरू हो रही है जो 23 नवंबर को 11.09 मिनट तक चलेगी. Also Read - Guru Nanak Jayanti 2018: जब अमीर सेठ की रोटी से खून और मजदूर की बासी रोटी से निकली दूध की धार !

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गुरुनानक पर्व को गुरु के पवित्र दिन के रूप में मनाया जाता है. इस दिन उनके अनुयायी उनकी बताई गई शिक्षा को याद करते हैं और उसपर चलने के वादे करते हैं. वासना, लालच, लगाव, क्रोध और गर्व. गुरुनानक की शिक्षाएं उनके समय के धार्मिक प्रथाओं के विपरीत थीं. बाद में वे सिखों की पवित्र पुस्तक गुरु ग्रंथ साहिब का हिस्सा बन गईं. गुरुनानक जयंती पर गुरुद्वारों में दो दिन का अखंड पाठ होता है. गुरु ग्रंथ साहिब का बिना रुके 48 घंटे तक पाठ होता है. Also Read - इस हफ्ते तीन दिन बंद रहेेंगे बैंक, जानिए आपके शहर में किस-किस दिन है छुट्टी

गुरुपर्व के एक दिन पहले नगरकीर्तन का आयोजन किया जाता है. जुलुस में पीछे पीछे अनुयायी होते हैं जो कीर्तनी और भजन गाते हुए आगे बढ़ते हैं. पर्व वाले दिन गुरुनानक जयंती का उत्सव सुबह 3 बजे से ही शुरू हो जाता है. सुबह 3 से 6 बजे तक के समय को अमृतबेला कहा जाता है. जिसे भजन और ध्यान के पाठ के लिए उपयुक्त माना जाता है. इसके बाद कथा और कीर्तन का आयोजन होता है.

अमृतसर के गोल्डन टेंपल में इस पर्व पर होने वाला आयोजन महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दिन गुरु का लंगर की विशेष व्यवस्था होती है. इस दिन यहां आने वाले हर व्यक्ति को गुरु का लंगर दिया जाता है. यह शाकाहारी भोजन होता है. कड़ा प्रसाद को इस दिन बांटने के लिए विशेष तौर पर तैयार किया जाता है. इसे आटे, चानी और देसी घी में बनाया जाता है. ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रसाद बांटने के लिए एक बड़े कहाड़े में बनाया जाता है. सिख धर्म में भोजन कराने को सेवा के रूप में देखा जाता है.

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