Guru Pradosh Vrat 2026: साल के पहले दिन रखा जाएगा गुरु प्रदोष व्रत...ऐसे करें भोलेनाथ की पूजा और जरूर पढ़ें ये व्रत कथा

Guru Pradosh Vrat 2026: नए साल का पहला बहुत ही खास होने वाला है क्योंकि पहले दिन गुरु प्रदोष व्रत रखा जाएगा जो कि देवो के देव महादेव को समर्पित है.

Published date india.com Published: December 31, 2025 12:21 PM IST
Guru Pradosh Vrat 2026: साल के पहले दिन रखा जाएगा गुरु प्रदोष व्रत...ऐसे करें भोलेनाथ की पूजा और जरूर पढ़ें ये व्रत कथा

Guru Pradosh Vrat 2026: साल 2026 आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बहुत ही खास होने वाला है क्योंकि नए साल की शुरुआत भगवान शिव के साथ होगी. वैदिक पंचांग के अनुसार नए साल के पहले दिन यानि 1 जनवरी 2026 को साल का पहला प्रदोष व्रत रखा जाएगा और यह व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है. इस दिन गुरुवार पड़ रहा है और इसलिए इसे गुरु प्रदोष व्रत नाम दिया है. गुरु प्रदोष व्रत के दिन व्रत रखने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं. साल के पहले दिन गुरु प्रदोष व्रत रखने पूजा करने से पूरे साल भोलेनाथ की कृपा बनी रहेगी. आइए जानते हैं कैसे करें प्रदोष व्रत की पूजा?

गुरु प्रदोष व्रत पूजा विधि

बता दें कि प्रदोष व्रत की पूजा प्रदोष काल यानि सूर्यास्त के बाद की जाती है. कहते हैं कि प्रदोष काल में भगवान शिव प्रसन्न मुद्रा में होते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं. ऐसे में उनका विधि-विधान से पूजन अवश्य करें. प्रदोष व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें और हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प करें. फिर मंदिर स्वच्छ करें और भगवान शिव का पूजन करें. दिनभर व्रत रखें और शाम के समय यानि प्रदोष काल में भगवान शिव को बेलपत्र, भांग, धतूरा, गंगाजल, दूध, दीप और फूल चढ़ाएं. इसके बाद घी का दीपक जलाएं और प्रदोष व्रत कथा पढ़ें. फिर भगवान शिव की आरती करें और अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत खोलें.

गुरु प्रदोष व्रत कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन समय में एक गांव में एक ब्राह्मणी रहा करती थी, जो कि पति की मृत्यु के बाद अपना पालन-पोषण भिक्षा मांगकर करती थी. एक दिन जब वह भिक्षा मांग कर लौट रही थी, तो रास्ते में उसे दो बच्चे मिले. जिन्हें वह अपने घर ले आई और उनका पालन-पोषण किया. जब वे दोनों बालक बड़े हुए तो ब्राह्मणी दोनों बालक को लेकर ऋषि शांडिल्य के आश्रम चली गई. जहां ऋषि शांडिल्य ने अपने तपोबल से बालकों के बारे में पता कर कहा-हे देवी! ये दोनों बालक विदर्भ राज के राजकुमार हैं. गंदर्भ नरेश के आक्रमण से इनके पिता का राज-पाठ छीन गया है.

इसके बाद ब्राह्मणी और दोनों राजकुमारों ने विधि-विधान से प्रदोष व्रत किया. एक दिन बड़े राजकुमार की मुलाकात अंशुमती से हुई, दोनों को एक-दूसरे से प्रेम हो गया. अंशुमती के पिता ने राजकुमार की सहमति से दोनों की शादी कर दी. फिर दोनों राजकुमार ने गंदर्भ पर हमला किया और उनकी जीत हुई. बता दें कि इस युद्ध में अंशुमती के पिता ने राजकुमारों की मदद की थी. दोनों राजकुमारों को अपना सिंहासन वापस मिल गया और गरीब ब्राम्हणी को भी एक खास स्थान दिया गया, जिससे उनके सारे दुख खत्म हो गए. राज-पाठ वापस मिलने का कारण प्रदोष व्रत था, जिससे उन्हें संपत्ति मिली और जीवन में खुशहाली आई.

डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. India.Com इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें.

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