Hal Shashthi 2019 का व्रत संतान की लंबी उम्र की कामना से किया जाता है. इसे हल षष्‍ठी, हल छठ भी कहा जाता है. वास्‍तव में ये दिन बलराम जयंती का है.

हल षष्‍ठी 21 अगस्‍त को है. हर साल भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को ये व्रत किया जाता है. भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से ठीक दो दिन पूर्व उनके बड़े भाई बलराम जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है.

व्रत कथा
एक नगर में एक ग्वालिन गर्भवती थी. उसका प्रसवकाल नजदीक था, लेकिन दूध-दही खराब न हो जाए, इसलिए वह उसको बेचने चल दी. कुछ दूर पहुंचने पर ही उसे प्रसव पीड़ा हुई और उसने झरबेरी की ओट में एक बच्चे को जन्म दिया.

उस दिन हल षष्ठी थी. थोड़ी देर विश्राम करने के बाद वह बच्चे को वहीं छोड़ दूध-दही बेचने चली गई. गाय-भैंस के मिश्रित दूध को केवल भैंस का दूध बताकर उसने गांव वालों को छल कर दूध बेच दिया. इससे व्रत करने वालों का व्रत भंग हो गया.

इस पाप के कारण झरबेरी के नीचे स्थित पड़े उसके बच्चे को किसान का हल लग गया. दुखी किसान ने झरबेरी के कांटों से ही बच्चे के चिरे हुए पेट में टांकें लगाए और चला गया.

ग्वालिन लौटी तो बच्चे की ऐसी दशा देख कर उसे अपना पाप याद आ गया. उसने तत्काल प्रायश्चित किया और गांव में घूम कर अपनी ठगी की बात बताई और उसके कारण खुद को मिली सजा के बारे में सबको बताया. उसके सच बोलने पर सभी ग्रामीण महिलाओं ने उसे क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया. इस प्रकार ग्वालिन जब लौट कर खेत के पास आई तो उसने देखा कि उसका मृत पुत्र तो खेल रहा था.

शाम के समय इस विधि से करें पूजा
शाम के समय छोटा सा तालाब बनाया जाता है. अगर तालाब बनाने का विकल्‍प ना हो तो किसी बड़े आकार के बर्तन, टब में पानी भरकर उसे तालाब माना जाता है.

झरबेरी, पलाश की टहनियों व कांस की डाल को एकसाथ बांधने के बाद चना, गेहूं, जौ, धान, अरहर, मूंग, मक्का व महुआ को बांस की टोकनी या फिर चुकड़ी में भरकर दूध-दही, गंगा जल अर्पित करते हुए षष्ठी देवी की पूजा की जाती है.
जमीन को साफ कर वहां पूजा की चौकी बनाई जाती है. फिर कच्चे जनेउ का सूत हरछठ को पहनाया जाता है.

पूजन में गेहूं, चना, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा और जौ यानी सात प्रकार के अनाज का भुना हुआ लावा चढ़ाया जाता है. पूजा के बाद कथा सुनी जाती है