haridwar kumbh mela 2021: कुंभ पर्व हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुंभ पर्व स्थल प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में स्नान करते हैं. इनमें से प्रत्येक स्थान पर प्रति बारहवें वर्ष और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ भी होता है. इस बार कुंभ मेले का आयोजन हरिद्वार में हो रहा है. कुंभ मेला मकर संक्रांति से प्रारंभ होता है. जब सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशि में और वृहस्पति, मेष राशि में प्रवेश करते हैं. मकर संक्रांति के होने वाले इस योग को “कुम्भ स्नान-योग” कहते हैं और इस दिन को विशेष मंगलकारी माना जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार इस दिन खुलते हैं और इस प्रकार इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है. Also Read - Haridwar Kumbh 2021: इस बार सिर्फ 28 दिन का होगा कुंभ, होंगे चार शाही स्नान, जानें पूरा शेड्यूल

कुंभ का अर्थ है कलश. यह कलश अमृत मंथन से जुड़ा है. कुंभ पर्व के आयोजन को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से अमृत बूँदें गिरने को लेकर है. इस कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया. तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हे सारा वृतान्त सुनाया. तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी. भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए. अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इन्द्रपुत्र जयन्त अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया. उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा. तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा. Also Read - Haridwar Kumbh 2021: कुंभ में इस बार संगठित भजन-भंडारे नहीं होंगे, बुजुर्गों, प्रेग्नेंट महिलाओं, बच्चों के लिए बना ये नियम

इस परस्पर मारकाट के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत बूँदें गिरी थीं. उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की. कलह शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया. इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया. Also Read - Haridwar Kumbh Mela 2021: कल्पवास आरंभ, कुंभ के लिए कोविड-19 निगेटिव रिपोर्ट के साथ, 6 फीट दूरी, मास्क है जरूरी

जानें उन जगहों के बारे में जहां होता है कुंभ मेला

हरिद्वार- हरिद्वार का मतलब है हरि का द्वार. इस जगह पर कुंभ महापर्व में शामिल होने वाले लोगों को भगवान की विशेष कृपा मिलती है. साथ ही यहां मोक्ष की प्राप्ति होती है. राणों के अनुसार समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश को लेकर देवताओं और असुरों में छीनाझपटी होने लगी तो अमृत कलश से अमृत की कुछ बूंदें धरती पर चार स्थानों पर गिरी थीं. इनमें हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन शामिल हैं. जिन स्थानों पर अमृत की बूंदे गिरी थी, उन चारों स्थानों पर प्रत्येक 12 साल के बाद विशिष्ट ग्रह योग में कुंभ पर्व मनाया जाता है. इनमे हरिद्वार कुंभ को सबसे खास माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि हरिद्वार में जब अमृत की बूंदे गिरी थी, तब बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में विद्यमान थे. ज्योतिषाचार्य प्रतीक मिश्र पुरी का कहना है कि हरिद्वार कुंभ सबसे प्राचीन कुंभ है. क्योंकि, जब कुंभ राशि में बृहस्पति और मेष राशि में सूर्य विद्यमान थे, तब हरिद्वार ब्रह्मकुंड में अमृत की बूंद गिरी थी.