होली का आगाज हो चुका है. आज विश्‍वप्रसिद्ध लट्ठमार होली है. जी हां, वही होली जिसमें महिलाएं लाठियों से पीटकर पुरुषों संग होली खेलती हैं.

हर साल इस होली को देखने दुनिया भर से लोग आते हैं. ये होली बरसाना में खेली जाती है. इसमें होली के रंग, गीत, नाच-गाना और लाठियां होती हैं.

पुरानी पंरपरा
इस होली को भगवान कृष्ण के समय से मनाया जा रहा है. मान्यता है कि भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ राधा और उनकी सखियों के साथ होली खेलने पहुंच जाते थे और उनके बीच खूब हंसी-ठिठोली होती थी.

इस दौरान राधा और उनकी सखियां ग्वाल बालों पर डंडे बरसाया करती थीं. ऐसे में लाठी-डंडों की मार से बचने के लिए ग्वाल वृंद भी ढ़ालों का प्रयोग किया करते थे जो धीरे-धीरे होली की परंपरा बन गई। मथुरा-व़ंदावन, नंदगांव और बरसाने में आज भी इस परंपरा का निर्वहन उसी रूप में किया जाता है और लट्ठमार होली मनायी जाती है.

अब क्‍या होता है
होली के गीतों के बीच बरसाना की हुरियारिन, नंदगांव से आए हुरियारों पर लाठियां बरसाती हैं. इसका बचाव करने के लिए हुरियारे ढाल से अपना बचाव करते हैं.

इस होली को खेलने के लिए नंदगाव से बूढ़े, युवा, बच्चे आते है. औरतें हाथ में ली हुई लाठियों से उन्हें पीटना शुरू कर देती हैं और वो खुद को बचाते भागते हैं. ये सब बहुत मस्तीभरा होता है.

धर्म की और खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.