Holi 2020: होली हिंदुओं के प्रमुख त्‍योहारों में से एक है. सालों से ये पर्व इसी उत्‍साह से मनाया जा रहा है. रंगों के इस पर्व को रंग पंचमी भी कहा जाता है. Also Read - नताशा ने हार्दिक पांड्या संग ससुराल में जमकर खेली होली,भज्‍जी-धवन भी होली के रंग में आए नजर

होली से एक दिन पहले छोटी होली मनाई जाती है. इस दिन होलिका दहन किया जाता है, पूजन होता है. इसी दिन किसान फसल के नये दाने अग्नि को चढ़ाते हैं. Also Read - VIDEO: मुंबई में होलिका की जगह जलाया गया कोरोनासुर का पुतला, लोग बोले- 'दूर भागेगा Virus'

सालों से इस त्‍योहार को मनाने के तरीके बदलते रहे हैं. पर क्‍या आप जानते हैं कि होली मनाने की शुरुआत कैसे हुई? Also Read - Happy Holi 2020 Wishes In Hindi: होली पर हिंदी में भेजें ये शुभकामना संदेश, दें रंगपर्व की बधाई

इस त्‍योहार को लेकर कई तरह की मान्‍यताएं प्रचलित हैं. इसी तरह इसे मनाने को लेकर कई कथाएं कही जाती हैं.

पहली कथा

 

शिव पुराण में इसका वर्णन है. इस कथा के अनुसार, शिव जी अपनी तपस्या में लीन थे. पार्वती जी शिव से विवाह करने के लिए कठोर तप कर रही थीं. शिव-पार्वती के विवाह में इंद्र का स्वार्थ छिपा था क्योंकि ताड़कासुर का वध शिव-पार्वती के पुत्र के द्वारा होना था. इसी कारण इंद्र ने शिव जी की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा परन्तु शिव जी ने क्रोधित होकर कामदेव को भस्म कर दिया. लेकिन शिव जी की तपस्या भंग हो गई थी. बाद में देवताओं ने शिव जी को पार्वती से विवाह के लिए राजी किया था. इस कथा के आधार पर होली को सच्चे प्रेम की विजय के उत्सव के रूप में मनाया जाता है.

दूसरी कथा

 

वासुदेव और देवकी के विवाह के बाद कंस जब देवकी को विदा कर रहा था तब आकाशवाणी द्वारा उसे पता चला कि वसुदेव और देवकी का आठवां पुत्र उसकी मृत्यु का कारण बनेगा. तभी कंस ने उन दोनों को कारागार में डाल दिया. देवकी के 6 पुत्रों को कंस ने मार दिया था और सातवें पुत्र थे शेषनाग के अवतार बलराम. उनके अंश को जन्म से पूर्व ही वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया गया था. फिर श्रीकृष्ण का अवतार आठवें पुत्र के रूप में हुआ. उसी समय वसुदेव ने रात में ही श्रीकृष्ण को गोकुल में नंद और यशोदा के यहां पहुंचा दिया. उनकी नवजात कन्या को अपने साथ ले आए. परन्तु कंस उस कन्या का वध नहीं कर सका और फिर से आकाशवाणी हुई कि कंस को मारने वाले ने तो गोकुल में जन्म ले लिया है. इस कारण कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए उस दिन गोकुल में जन्मे सभी शिशुओं की हत्या करने का काम राक्षसी पूतना को सौंपा गया था. वह सुंदर नारी का रूप बनाकर शिशुओं को विष का स्तनपान कराने गई लेकिन श्रीकृष्ण ने राक्षसी पूतना का वध कर दिया. उस दिन फाल्गुन पूर्णिमा थी. अत: बुराई का अंत हुआ और इस खुशी में होली का त्यौहार मनाया जाने लगा.

तीसरी कथा

 

राधा-कृष्ण के पवित्र प्रेम से जुड़ा है होली का त्यौहार. श्रीकृष्ण लीला का एक अंग बसंत में एक-दूसरे पर रंग डालना भी माना गया है. इसलिए मथुरा-वृंदावन की होली राधा-कृष्ण के प्रेम रंग में डूबी होती है. बरसाने और नंदगांव में लठमार होली खेली जाती है.

चौथी कथा

 

ये सबसे प्रचलित कथा है. प्रह्लाद और होलिका से जुड़ी कथा. इसमें हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को भक्त विष्णु प्रह्लाद का अंत करने के लिए अग्नि में प्रवेश करा दिया था. परन्तु होलिका का वरदान निष्फल सिद्ध हुआ और वह स्वयं उस आग में जल कर मर गई. इसी प्रकार अहंकार की, बुराई की हार हुई और प्रह्लाद की इसी जीत की खुशी में होली का त्यौहार मनाया जाने लगा.

पांचवी कथा

 

एक पृथु राजा था, उसके समय में एक ढुंढी नाम की राक्षसी थी. वह नवजात शिशुओं को खा जाती थी क्योंकि उसको वरदान प्राप्त था कि कोई भी देवता, मानव, अस्त्र या शस्त्र उसे नहीं मार सकेगा. इसी कारण रजा की प्रजा बहुत परेशान थी. और तो और ना ही उस पर सर्दी, गर्मी और वर्षा का कोई असर होगा. तभी राजा के राजपुरोहित ने एक मार्ग बताया उस राक्षसी को खत्म करने के लिए. फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन जब न अधिक सर्दी होगी और गर्मी, क्षेत्र के सभी बच्चे एक-एक लकड़ी एक जगह पर रखेंगे और जलाएंगे, मंत्र पढ़ेंगे और अग्रि की परिक्रमा करेंगे तो राक्षसी मर जाएगी. इतने बच्चों को राक्षसी ढुंढी एक साथ देखकर उनके नजदीक आ गई और उसका मंत्रों के प्रभाव से वहीं विनाश हो गया. तब से भी होली का त्यौहार मनाया जाने लगा.

धर्म की और खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.