लखनऊ : सेवइयों में लिपटी मोहब्बत की मिठास का त्योहार ईद-उल-फितर भूख-प्यास सहन करके एक महीने तक सिर्फ खुदा को याद करने वाले रोजेदारों को अल्लाह का इनाम है. मुसलमानों का सबसे बड़ा त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व न सिर्फ हमारे समाज को जोड़ने का मजबूत सूत्र है, बल्कि यह इस्लाम के प्रेम और सौहार्दभरे संदेश को भी पुरअसर ढंग से फैलाता है. ईद-उल-फित्र रमजान के महीने में कड़ी आजमाइश के बाद रोजेदार को अल्लाह की तरफ से मिलने वाला रूहानी इनाम है. ईद समाजी तालमेल और मोहब्बत का मजबूत धागा है, यह त्योहार इस्लाम धर्म की परंपराओं का आईना है. एक रोजेदार के लिए इसकी अहमियत का अंदाजा अल्लाह के प्रति उसकी कृतज्ञता से लगाया जा सकता है.

रमजान में छोड़ी गई बुराइयों को दोबारा जिंदगी में न आएं
‘मीठी ईद‘ भी कहा जाने वाला यह पर्व खासतौर पर भारतीय समाज के ताने-बाने और उसकी भाईचारे की सदियों पुरानी परंपरा का वाहक है. इस दिन विभिन्न धर्मों के लोग गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं और ईद की सेवइयां अमूमन उनकी तल्खी और कड़वाहट को मिठास में बदल देती हैं. ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली का कहना है कि ईद बेशक रोजेदारों को अल्लाह का इनाम है. लेकिन मुसलमानों के लिये यह भी जरूरी है कि वे रमजान में छोड़ी गई बुराइयों को दोबारा अपनी जिंदगी में न आने दें. यह रमजान और इस्लाम की रूह से जुड़ी बात है. उन्होंने कहा कि ईद हमें न सिर्फ भाईचारे का पैगाम देती है बल्कि इसमें समाज को जोड़ने की मूल भावना के साथ-साथ इसे अमली जामा पहनाने का रास्ता भी नजर आता है.

ईद का लाभ समाज के हर तबके को
दुनिया में चांद देखकर रोजा रहने और चांद देखकर ईद मनाने की पुरानी परंपरा है और आज के हाईटेक युग में तमाम बहस-मुबाहिसे के बावजूद यह रिवाज कायम है. व्यापक रूप से देखा जाए तो रमजान और उसके बाद ईद व्यक्ति को एक इंसान के रूप में सामाजिक जिम्मेदारियों को अनिवार्य रूप से निभाने का दायित्व भी सौंपती है. देश के प्रमुख इस्लामी शोध संस्थान दारुल मुसन्निफीन आजमगढ़ के प्रमुख मौलाना इश्तियाक अहमद ज़िल्ली ने बताया कि रमजान में हर सक्षम मुसलमान को अपनी कुल संपत्ति के ढाई प्रतिशत हिस्से के बराबर की रकम निकालकर उसे ज़कात के रूप में गरीबों में बांटना होता है. इससे समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी का निर्वहन तो होता ही है, साथ ही गरीब रोजेदार भी अल्लाह के इनामरूपी त्योहार को मना पाते हैं. व्यापक रूप से देखें तो ईद की वजह से समाज के लगभग हर वर्ग को किसी न किसी तरह से फायदा होता है. चाहे वह वित्तीय लाभ हो या फिर सामाजिक फायदा हो.

गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक है ईद
भारत में ईद का त्योहार यहां की गंगा-जमुनी तहजीब के साथ मिलकर उसे और खुशनुमा बनाता है. हर धर्म और वर्ग के लोग इस दिन को तहेदिल से मनाते हैं. ईद के दिन सेवइयों या शीर-खुरमे से मुंह मीठा करने के बाद छोटे-बड़े, अपने-पराए, दोस्त-दुश्मन गले मिलते हैं तो चारों तरफ मोहब्बत ही मोहब्बत नजर आती है. एक पवित्र खुशी से दमकते सभी चेहरे इंसानियत का पैगाम माहौल में फैला देते हैं. कुरान शरीफ के मुताबिक पैगम्बर-ए-इस्लाम मुहम्मद साहब ने कहा है कि जब अहले ईमान रमजान के पवित्र महीने के एहतेराम से फारिग हो जाते हैं और रोजों-नमाजों तथा उसके तमाम कामों को पूरा कर लेते हैं तो अल्लाह एक दिन अपने इबादत करने वाले बंदों को बख्शीश व इनाम से नवाजता है. इसलिए इस दिन को ‘ईद‘ कहते हैं और इसी बख्शीश व इनाम के दिन को ईद-उल-फित्र का नाम देते हैं.

चांद रात का पूरे साल रहता है इंतजार
रमजान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है. इस पूरे माह में रोजे रखे जाते हैं. इस महीने के खत्म होते ही 10वां माह शव्वाल शुरू होता है. इस माह की पहली चांद रात ईद की चांद रात होती है. इस रात का इंतजार वर्षभर खास वजह से होता है, क्योंकि इस रात को दिखने वाले चांद से ही इस्लाम के बड़े त्योहार ईद-उल-फित्र का ऐलान होता है. जमाना चाहे जितना बदल जाए, लेकिन ईद जैसा त्योहार हम सभी को अपनी जड़ों की तरफ वापस खींच लाता है और यह अहसास कराता है कि पूरी मानव जाति एक है और इंसानियत ही उसका मजहब है.