Jaya Ekadashi 2019 इसी हफ्ते 16 फरवरी, शनिवार को है. इस एकादशी का काफी महत्‍व है. जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. Also Read - Jaya Ekadashi 2020: जया एकादशी पर करें विष्‍णुप्रिय 'श्री नारायण स्तोत्र' का पाठ, पूरी होगी हर मनोकामना

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Jaya Ekadashi 2019: कब है जया एकादशी, जानिए शुभ मुहूर्त और व्रत का महत्‍व

क्‍या है महत्‍व

इस एकादशी को करने से ब्रह्महत्या जैसे पापों से मुक्ति मिलती है. जया एकादशी के दिन व्रत कर श्री कृष्ण की आरती करने का भी विधान है. जया एकादशी का व्रत करने से घर से नकारात्‍मक ऊर्जा दूर होती है और परिवारजनों का स्वास्थ्य अच्‍छा रहता है.

पौराणिक मान्यतानुसार, माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली जया एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को नीच योनि, भूत, प्रेत, पिशाच की योनि से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाती है. उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है.

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पूजन विधि

एकादशी के दिन सुबह जल्‍दी उठना चाहिए. नित्‍य कर्मों से निवृत्‍त होकर श्री विष्णु जी ध्यान करें. व्रत का संकल्प लें. फिर धूप, दीप, चंदन, फल, तिल, एवं पंचामृत से उनकी पूजा करें.

पूरे दिन व्रत रखें. दिन में फलाहार कर सकते हैं. दूसरे दिन यानि द्वादशी को दान-पुण्य करने के बाद ही भोजन ग्रहण करें.

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जया एकादशी कथा

प्राचीन समय में देवराज इंद्र का स्वर्ग में राज था. अन्य देवगण स्वर्ग में सुखपूर्वक रहते थे. एक समय नंदन वन में उत्सव चल रहा था. और इंद्र अपनी इच्छानुसार नंदन वन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे. इस दौरान गंधर्वों में प्रसिद्ध पुष्पदंत और उसकी कन्या पुष्पवती, चित्रसेन और उसकी स्त्री मालिनी भी उपस्थित थे.

साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान और उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे. उस समय गंधर्व गायन कर रहे थे और गंधर्व कन्याएं नृत्य प्रस्तुत कर रही थीं. सभा में माल्यवान नामक एक गंधर्व और पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या का नृत्य चल रहा था. इसी बीच पुष्यवती की नज़र जैसे ही माल्यवान पर पड़ी वह उस पर मोहित हो गई और माल्यवान पर काम-बाण चलाने लगी.

पुष्यवती सभा की मर्यादा को भूलकर ऐसा नृत्य करने लगी कि माल्यवान उसकी ओर आकर्षित हो गया. माल्यवान गंधर्व कन्या की भाव-भंगिमा को देखकर सुध बुध खो बैठा और गायन की मर्यादा से भटक गया जिससे सुर -ताल उसका साथ छोड़ गए. इस पर इंद्र देव को क्रोध आ गया और दोनों को श्राप दे दिया.

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श्राप से तत्काल दोनों पिशाच बन गए और हिमालय पर्वत पर एक वृक्ष पर दोनों का निवास बन गया. यहां पिशाच योनि में इन्हें अत्यंत कष्ट भोगना पड़ रहा था. दैव्ययोग से तभी माघ मास में शुक्ल पक्ष की जया नामक एकादशी आई. माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन दोनों अत्यंत दुखी थे.

उस दिन उन्होंने केवल फलाहार पर रहकर ही दिन व्यतीत किया और सायंकाल के समय महान दु:ख से पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए. ठंड के कारण दोनों की मृत्यु हो गयी और अनजाने में जया एकादशी का व्रत हो जाने से दोनों को पिशाच योनि से मुक्ति भी मिल गई.

अब माल्यवान और पुष्पवती पहले से भी सुन्दर हो गए और स्वर्ग लोक में उन्हें वापस स्थान मिल गया. श्रीकृष्ण ने अंत में राजा युधिष्ठिर से कहा कि इस जया एकादशी के व्रत से बुरी योनि छूट जाती है. जिस मनुष्य ने इस एकादशी का व्रत किया है उसने मानो सब यज्ञ, जप, दान आदि कर लिए.

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