नई दिल्ली: भैरव हिन्दुओं के एक देवता हैं जो शिव के रूप हैं. भैरव एक हिंदू देवता हैं जिन्हें हिंदुओं द्वारा पूजा जाता है. शैव धर्म में, वह शिव के विनाश से जुड़ा एक उग्र रूप है. आमतौर पर हिंदू धर्म में, भैरव को दंडपाणि भी कहा जाता है (जैसा कि वह पापियों को दंड देने के लिए एक छड़ी या डंडा रखते हैं) और स्वस्वा का अर्थ है “जिसका वाहन (सवारी) कुत्ता है”. हर वर्ष मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को काल भैरव जयंती मनाई जाती है. मान्यता है कि इस तिथि पर भगवान काल भैरव का जन्म हुआ था. इस साल कालभैरव जयंती 7 दिसंबर को मनाई जाएगी. Also Read - Kaal Bhairav Jayanti 2020: काल भैरव जयंती के दिन करें ये उपाय, बरसेगी विशेष कृपा

कैसे हुई थी काल भैरव की उत्पत्ति Also Read - Kaal Bhairav Jayanti 2020: जानें आखिर क्यों भगवान भैरव ने काट दिया था ब्रह्मा जी का सिर, ये है पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के मुताबिक, कहा जाता है कि काल भैरव शिव के क्रोध के कारण उत्पन्न हुए थे. एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश में इस बात को लेकर काफी बहस हो गई कि उन तीनों में कौन ज्यादा श्रेष्ठ है. तब बातों ही बातों में ब्रह्मा जी ने भगवान शिव की निंदा की तो इससे शिव शंकर क्रोधित हो गए और उनके रौद्र रूप के चलते काल भैरव की उत्पत्ति हुई.

गुस्से में काटा था ब्रह्मा जी का सिर

काल भैरव भगवान श्व के स्वरूप माने जाते हैं. ऐसे में जब ब्रह्मा जी ने शिव जी की निंदा की थी काल भैरव ने वहीं सिर काट दिया था. लेकिन इससे उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप लग गया जिससे बचने के लिए भगवान शिव ने एक उपाय सुझाया. उन्होंने काल भैरव को पृथ्वी लोक पर भेजा और कहा कि जहां भी यह सिर खुद हाथ से गिर जाएगा वहीं उन पर चढ़ा यह पाप मिट जाएगा. जहां वो सिर हाथ से गिरा था वो जगह काशी थी जो शिव की स्थली मानी जाती है. यही कारण है कि आज भी काशी जाने वाला हर श्रद्धालु या पर्यटक काशी विश्वनाथ के साथ साथ काल भैरव के दर्शन भी अवश्य रूप से करता है. और उनका आशीर्वाद प्राप्त करता है.