Kainchi Dham Sthapna Diwas: बाबा नीम करौली के बाद सिद्धि मां ने कैसे संभाली विरासत, अब किसके हाथ में है आश्रम की कमान?
Kainchi Dham History: कैंची धाम स्थापना दिवस आज यानि 15 जून 2026 को मनाया जा रहा है. जानें बाबा नीम करौली के बाद सिद्धि मां ने कैसे संभाली विरासत और वर्तमान में कौन चलाता है बाबा का आश्रम और क्या हैं यहां के कड़े नियम.
कैंची धाम स्थापना दिवस
Baba Neem Karoli: उत्तराखंड की सुरम्य वादियों में शिप्रा नदी के तट पर स्थित 'कैंची धाम' आज पूरी दुनिया की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है. आज यानी 15 जून 2026 को इस अलौकिक धाम का 62वां स्थापना दिवस मनाया जा रहा है. साल 1964 में आज ही के दिन परम पूज्य बाबा नीम करौली महाराज ने इस पावन आश्रम में हनुमान जी की मूर्ति की प्रतिष्ठा की थी. एप्पल के स्टीव जॉब्स से लेकर फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग और क्रिकेटर विराट कोहली जैसी वैश्विक हस्तियों के जीवन को बदलने वाले इस धाम का इतिहास जितना चमत्कारी है, उतना ही दिलचस्प इसका वर्तमान प्रबंधन भी है. भक्तों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि बाबा के जाने के बाद इस दिव्य विरासत को किसने संभाला और आज यहाँ की व्यवस्था कौन देखता है.
जब बाबा ने कहा था- 'सामने से आ रही हैं मां कात्यायनी'
साल 1973 में जब बाबा नीम करौली महाराज ने महासमाधि ली, तो देश-विदेश में फैले करोड़ों भक्तों के सामने एक बड़ा खालीपन आ गया था. ऐसे समय में बाबा की सबसे प्रिय और अनन्य शिष्या 'सिद्धि मां' आश्रम का मुख्य स्तंभ बनकर उभरीं. अल्मोड़ा में जन्मी सिद्धि मां का झुकाव बचपन से ही अध्यात्म की ओर था.
हनुमानगढ़ी मंदिर के निर्माण के दौरान जब बाबा नीम करौली की मुलाकात पहली बार सिद्धि मां से हुई थी, तब बाबा के मुख से सहसा ही निकला था कि 'सामने से कात्यायनी आ रही हैं'. बाबा उन्हें साक्षात मां कात्यायनी का अवतार मानते थे और हमेशा कहते थे, मां तू जहां रहेगी, वहां मंगल ही होगा. मान्यता है कि बाबा ने देहत्याग से पहले अपनी अलौकिक आध्यात्मिक शक्तियां सिद्धि मां को ही सौंप दी थीं.
'सुमिरन कर ले मेरे मन' और आश्रमों का विस्तार
बाबा के ब्रह्मलीन होने के बाद सिद्धि मां ने कभी खुद को 'गुरु' नहीं कहा, बल्कि हमेशा बाबा की दासी के रूप में ही सेवा की. वह मंगलवार और शनिवार को कैंची धाम में भक्तों को दर्शन देती थीं. उनके शांत स्वरूप और दिव्य आभा के सामने बड़े-बड़े दिग्गजों का सिर झुक जाता था. सिद्धि मां ने न केवल कैंची धाम की मर्यादा को अक्षुण्ण रखा, बल्कि साल 1980 में ऋषिकेश आश्रम सहित देश-विदेश में कई नए आश्रमों का निर्माण भी कराया. उनका गाया भजन "सुमिरन कर ले मेरे मन" बाबा को बेहद प्रिय था. साल 2017 में 92 वर्ष की आयु में मां के ब्रह्मलीन होने के बाद आज भी आश्रम में उनका पूजा कक्ष और दिव्य प्रतिमा मौजूद है.
वर्तमान में किसके हाथ में है कमान?
सिद्धि मां के बाद कई लोगों के मन में जिज्ञासा रहती है कि अब कैंची धाम की गद्दी पर कौन बैठता है? आपको जानकर हैरानी होगी कि कैंची धाम की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां किसी भी इंसान के लिए कोई पारंपरिक गुरु पद या गद्दी नहीं है. यहाँ सर्वोच्च स्थान सिर्फ और सिर्फ बाबा नीम करौली महाराज और पवनपुत्र हनुमान जी का ही माना जाता है.
कैंची धाम और बाबा के अन्य सभी आश्रमों की देखरेख 'श्री बाबा नीम करौली जी महाराज आश्रम ट्रस्ट' द्वारा की जाती है. इस व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने में बाबा नीम करौली महाराज के ज्येष्ठ पुत्र श्री अनेक सिंह अनेक बाबू और उनके पोते धनंजय शर्मा मुख्य भूमिका निभाते हैं. धनंजय शर्मा जी और ट्रस्ट के अन्य समर्पित सदस्य, सिद्धि मां द्वारा स्थापित किए गए कड़े नियमों और मर्यादाओं के अनुसार ही आश्रम की हर छोटी-बड़ी गतिविधि को देखते हैं.
कड़े नियम और सादगी ही है पहचान
आज के कमर्शियल युग में भी कैंची धाम अपनी शुचिता के लिए जाना जाता है. आश्रम के भीतर आज भी कैमरे और रील बनाने पर सख्त पाबंदी है ताकि वहां की आध्यात्मिक शांति भंग न हो. यहां आने वाले हर आम और खास नागरिक के लिए नियम एक समान हैं. भोजनशाला से लेकर मंदिर प्रबंधन तक, सब कुछ बिना किसी बाहरी विज्ञापन या तामझाम के, पूरी तरह से निःशुल्क और सेवा भाव से चलाया जाता है. आज स्थापना दिवस के पावन मौके पर लाखों श्रद्धालु बाबा का चमत्कारी मालपुआ प्रसाद पाकर धन्य हो रहे हैं.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. India.Com इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें.
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