Kalashtami 2019 व्रत का काफी महत्‍व है. इसे हर महीने कष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. Also Read - Kalashtami 2021 Date: 4 फरवरी को मनाई जाएगी कालाष्टमी, जानें शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि

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कालाष्‍टमी इस माह 21 अक्‍टूबर, सोमवार को है.

महत्‍व

भगवान शिव के भैरव रूप को समर्पित है. इस दिन भोलेनाथ के भैरव रूप की पूजा की जाती है. कुछ लोग इसे कालाष्टमी व्रत कहते हैं और कुछ लोग भैरवाष्टमी. इस दिन मां दुर्गा की पूजा का भी विधान है.

व्रत कथा

शिव पुराण में ऐसा उल्लेख है कि देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु जी से बारी-बारी से पूछा कि ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ कौन हैं. इस सवाल के जवाब में दोनों ने स्वयं को सर्व शक्तिमान और श्रेष्ठ बताया. इस बात पर दोनों के बीच युद्ध होने लगा. देवताओं ने यह दृश्य देखकर वेदशास्त्रों से इसका जवाब मांगा. वेदशास्त्रों से देवताओं को उत्तर मिला कि जिनके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है अनादि अंनत और अविनाशी हो, वह कोई और नहीं बल्कि भगवान रूद्र यानी कि भोलेनाथ ही हैं.

लेकिन ब्रह्मा जी यह मानने को तैयार नहीं थे और उनके 5वें मुख ने भगवान शंकर के बारे में बुरा-भला कहना शुरू कर दिया. यह सब देखकर वेद बहुत दुखी हुए. तभी दिव्यज्योति के रूप में रूद्र प्रकट हो गए. ब्रह्मा जी रुद्र के प्रकट होने के बाद भी आत्ममुग्ध रहे और खुद की तारीफ करते रहे. रूद्र को कहा तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो और ज्यादा रुदन करने के कारण मैंने तुम्हारा नाम ‘रुद्र’ रख दिया. तुम्हें मेरी सेवा करनी चाहिए और मेरी आज्ञा का पालन करना चाहिए.

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ब्रह्मा जी की बातें सुनकर भगवान शंकर नाराज हो गए और क्रोध में ही उन्होंने भैरव को उत्पन्न किया. भगवान शंकर ने भैरव को आदेश दिया कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो. यह बात सुनकर भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा के 5वें सिर को काट दिया. ब्रह्मा के 5वें सिर ने ही भगवान शंकर के लिए अपशब्द कहा था.

इसके बाद भगवान शंकर ने भैरव को काशी जाने के लिए कहा और ब्रह्म हत्या से मुक्ति प्राप्त करने का रास्ता बताया. भगवान शंकर ने उन्हें काशी का कोतवाल बना दिया. इसलिए आज भी काशी में भैरव कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं. विश्वनाथ के दर्शन से पहले इनका दर्शन होता है. अन्यथा विश्वनाथ का दर्शन अधूरा माना जाता है.

कालाष्टमी व्रत विधि

शिव के भैरव रूप के भक्तों को भैरवनाथ की षोड्षोपचार सहित पूजन करनी चाहिए और उन्हें जल अर्पित करना चाहिए. कालाष्टमी के दिन रात में पूजा का महत्व है. इसलिए रात में भगवान शंकर के साथ मां पार्वती की भी पूजा होती है. कुछ लोग जगराता भी कराते हैं और रातभर कथा और भजन कीर्तन करते हैं. इस दिन भैरव कथा का पाठ करना चाहिए.

मध्य रात्रि होते ही शंख, नगाड़ा, घंटा आदि बजाकर भैरव जी की आरती करनी चाहिए. इस दिन भगवान भैरवनाथ का वाहन ‘श्वान’ (कुत्ता) को भोजन कराने का खास महत्व है. ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्वान को भोजन कराने से भैरव जल्दी प्रसन्न होते हैं.

– कालाष्टमी के दिन सुबह-सुबह उठकर स्नान आदि कर साफ वस्त्र पहनें.

– पितरों का तर्पण और श्राद्ध करें.

– इसके बाद भैरव जी की पूजा करें और इस मंत्र का उच्चारण करें:

अतिक्रूर महाकाय कल्पान्त दहनोपम्,

भैरव नमस्तुभ्यं अनुज्ञा दातुमर्हसि!!

– इसके बाद मन ही व्रत करने का संकल्प लें.

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