Kalashtami 2020: कालाष्‍टमी पर व्रत किया जाता है. हर महीने कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी व्रत किया जाता है. मान्यता है कि भगवान शिव इसी दिन भैरव के रूप में प्रकट हुए थे. Also Read - Kalashtami 2021 Date: 4 फरवरी को मनाई जाएगी कालाष्टमी, जानें शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि

Kalashtami 2020 Date

इस बार कालाष्‍टमी 15 फरवरी, शनिवार को है. इस दिन मां दुर्गा की पूजा भी की जाती है. Also Read - Kalashtami 2020: कालाष्टमी पर जानें समय और पूजा की विधि

व्रत कथा

शिव पुराण में ये कथा कही गई है. इसके अनुसार, Also Read - Kalashtami 2019: कालाष्‍टमी तिथि, व्रत विधि, महत्‍व, कथा, कैसे करें पूजन...

देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु जी से बारी-बारी पूछा कि ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ कौन है. जवाब में दोनों ने स्वयं को सर्व शक्तिमान और श्रेष्ठ बताया, जिसके बाद दोनों में युद्ध होने लगा. इससे घबराकर देवताओं ने वेदशास्त्रों से इसका जवाब मांगा. उन्‍होंने बताया कि जिनके भीतर पूरा जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है वह कोई और नहीं बल्कि भगवान शिव ही हैं.

ब्रह्मा जी यह मानने को तैयार नहीं थे और उन्होंने भगवान शिव के बारे में अपशब्द कह दिए, इससे वेद व्यथित हो गए. इसी बीच दिव्यज्योति के रूप में भगवान शिव प्रकट हो गए. ब्रह्मा जी आत्मप्रशंसा करते रहे और भगवान शिव को कह दिया कि तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो और ज्यादा रुदन करने के कारण मैंने तुम्हारा नाम ‘रुद्र’ रख दिया, तुम्हें तो मेरी सेवा करनी चाहिए.

इस पर भगवान शिव नाराज हो गए और क्रोध में उन्होंने भैरव को उत्पन्न किया. भगवान शंकर ने भैरव को आदेश दिया कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो. यह बात सुनकर भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा के वही 5वां सिर काट दिया, जो भगवान शिव को अपशब्ध कह रहा था.

इसके बाद भगवान शंकर ने भैरव को काशी जाने के लिए कहा और ब्रह्म हत्या से मुक्ति प्राप्त करने का रास्ता बताया. भगवान शंकर ने उन्हें काशी का कोतवाल बना दिया, आज भी काशी में भैरव कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं. विश्वनाथ के दर्शन से पहले इनका दर्शन होता है, अन्यथा विश्वनाथ का दर्शन अधूरा माना जाता है.

मान्यताएं

ऐसा कहा जाता है कि इस दिन भैरव जी की पूजा से भूत, पिशाच दूर रहते हैं. सभी कष्ट दूर होते हैं. रुके हुए कार्य बनते जाते हैं.

पूजन विधि

कालाष्टमी व्रत की पूजा रात में की जाती है. भैरव जी की पूजा कर उन्हें जल अर्पित किया जाता है. भैरव कथा का पाठ करना चाहिए. साथ ही भगवान शिव-पार्वती जी की पूजा की जाती है.

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