नई दिल्‍ली: देश और विदेश के हिंदू शुक्रवार 23 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा मनाएंगे. हिंदू कैलेंडर के हिसाब से कार्तिक आठवां महीना है और इसे सबसे पवित्र महीना भी माना जाता है. कार्तिक महीने का महत्‍व इसलिए भी ज्‍यादा है क्‍योंकि इस माह में भगवान विष्‍णु और भगवान शिव की पूजा की जाती है. कार्तिक महीने में पवित्र स्‍नान की शुरुआत शरद पूर्णिमा के दिन से शुरू होती है और कार्तिक पूर्णिमा के दिन खत्‍म होती है. कार्तिक पूर्णिमा को देश के अलग-अलग हिस्‍सों में देवा दिवाली, त्रिपुरारी पूर्णिमा या त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. Also Read - Guru Nanak Jayanti 2018: जब अमीर सेठ की रोटी से खून और मजदूर की बासी रोटी से निकली दूध की धार !

मुहूर्त
कार्तिक पूर्णिमा के दिन कई त्‍योहारों का अंत भी होता है. इससे इसका महत्‍व और भी बढ़ जाता है. इस साल पूर्णिमा मुहूर्त 22 नवंबर को दिन में 12 बजकर 53 मिनट से शुरू होगा. यह 23 नवंबर को 11 बजकर 9 मिनट पर समाप्‍त होगा. Also Read - Kartik Purnima 2018: गंगा-गंडक संगम पर लाखों श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी

महत्‍व
कार्तिक पूर्णिमा का त्‍योहार पांच दिनों तक मनाया जाता है. इसकी शुरुआत प्रबोधिनी एकादशी के दिन होती है जो महीने का 11वां दिन होता है. त्‍योहार कार्तिक पूर्णिमा के दिन खत्‍म होता है, जो इस महीने की शुक्‍ल पक्ष का 15वां दिन होता है.

पौराणिक कथाएं
कार्तिक पूर्णिमा के बारे में माना जाता है कि इसकी शुरुआत तब हुई थी जब भगवान शिव ने राक्षसों के राजा त्रिपुरासुर का वध किया था. इसीलिए इसे त्रिपुरी पूर्णिमा या त्रिपुरारी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. कहा जाता है कि त्रिपुरासुर ने देवताओं को पराजित कर उनके राज्‍य छीन लिए थे. उसकी मृत्‍यु के बाद देवताओं में उललास का संचार हुआ, इसलिए देव दिवाली कहा गया. देवताओं ने स्‍वर्ग में दीये जलाए. आज भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन मंदिरों में और गंगा नदी के घाटों पर दीये प्रज्‍वलित किए जाते हैं.

पूजा विधि
इस दिन गंगा स्‍नान बेहद महत्‍वपूर्ण माना जाता है. इस दिन लोग व्रत रखते हैं और भगवान शिव का रुद्र अभिषेक किया जाता है. इस प्रक्रिया में भगवान को दूध और शहद से स्‍नान कराया जाता है. अधिकांश हिंदू इस महीने में मांसाहारी भोजन का त्‍याग कर देते हैं.

पांच दिनों तक चलने वाले त्‍योहार के दौरान श्रद्धालु पूरे दिन में केवल एक बार अन्‍न ग्रहण करते हैं. इसे हबिशा कहा जाता है. इस दिन मंदिरों में एक खास तरह का प्रसाद तैयार किया जाता है, जिसे अन्‍नकूट कहते हैं. घरों में लोग गेहूं के आटे का प्रसाद तैयार किया जाता है.